नाम:-डॉ जयशंकर शुक्ल. माता-पिता:-श्रीमती राजकली शुक्ला एवं श्री सूर्य प्रताप शुक्ल. जन्म-तिथि:दो जुलाई सन् उन्नीस सौ सत्तर जन्म-स्थान:-गाँव पोस्ट-सैदाबाद, जिला-इलाहाबाद,उ.प्र.-221508. वर्तमान पता:-भवन सं-49,पथ सं.-06,बैंक कॉलोनी,मण्डोली दिल्ली-110093 शिक्षा:-एम.ए.(हिन्दी,प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति),एम.एड.,पी-एच.डी., नेट/जे.आर.एफ, साहित्यरत्न, बृत्ति: शिक्षक,राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय, राजनिवास मार्ग , दिल्ली-110054

आपकी सोच ही*
*आपको बड़ा बनाती है...!!*
*यदि हम गुलाब की तरह*
*खिलना चाहते है तो*
*काँटों के साथ तालमेल बनाके रखने की*
*कला तो सीखनी ही होगी*

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शुभ प्रभातम्.
आषाढ मास की कृष्ण पक्षीय योगिनी एकादशी के शुभ एवम् पावन अवसर पर चतुर्भुज श्री हरि भगवान विष्णु एवम् माँ भगवती लक्ष्मी से प्रार्थना है कि अपनी असीम कृपा आप पर और आपके परिवार पर बनाए रखें. आपको दिव्य, भव्य वैभव और बृहत्तर आनंद की प्राप्ति हो. घर परिवार में मांगलिक आयोजन होते रहें. आपको सदैव ईश्वर का प्रेमोपहार सहज सुलभ हो. आपका कल्याण हो. परिवार में शुभ संदेशों का अखंड क्रम बना रहे. उदारचेता प्रभु की असीम कृपा से आप निरन्तर स्वस्ति की ओर अग्रसर हों.
आपके आनंदमय, जयोतिर्मय और भक्तिमय जीवन की कामना करते हुए मैं सादर प्रणाम करता हूँ.
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय.

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#जब कोई चीज मुफ्त मिल रही हो, तो समझ लेना कि आपको इसकी कोई बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।
नोबेल विजेता डेसमंड टुटू ने एक बार कहा था कि ‘जब मिशनरी अफ्रीका आए, तो उनके पास बाईबल थी, और हमारे पास जमीन। उनहोंने कहा 'हम आपके लिए प्रार्थना करने आये हैं।’ हमने आखें बंद कर लीं,,, जब खोलीं तो हमारे हाथ में बाईबल थी, और उनके पास हमारी जमीन।’

#इसी तरह जब सोशल नैटवर्क साइट्स आईं, तो उनके पास फेसबुक और व्हाट्सएप थे, और हमारे पास आजादी और निजता थी।
उन्होंनें कहा 'ये मुफ्त है।’ हमने आखें बंद कर लीं, और जब खोलीं तो हमारे पास फेसबुक और व्हाट्सएप थे, और उनके पास हमारी आजादी और निजी जानकारियां।

वर्तमान समय में जहाँ एक तरफ़ हम सोशल साइट और इन्टरनेट की दुनिया को अत्यन्त सुरक्षित स्वरूप मानकर अपनी अति गोपनीय राज़ दफ़न कर के रखते , जहाँ समय असमय अपनी दिनचर्या, रुझान, व्यक्तिगत जीवन की घटनाये अपडेट कर रहे होते है

ठीक विपरीत उस गलियारे में झान्कने की अनुमति भी हम स्व्यम अपने फोन या लैपटॉप में install बहुत सारे apllications को दे चुके होते है और शायद उसका paasword सिर्फ़ हमारे छलावा मात्र के लिये होता है ।

#अब ये सब मिलकर हमारे फोन को खंगालते है ,और हमारी निजता को विभिन्न राजनैतिक, व्यापारिक, समाचारो को बेंचते है, जिसके आधार पर हमारी रूचि समझकर उस तरह के पोस्ट, खबर, ऑफ़र या प्रोमोशन दिखाते हुए हमे ब्रेन वाश किया जाना प्रारम्भ हो जाता है , और उन्की यह कल्पना सत्य होती जा रही है, जिससे वो किसी भी समाज को अपने विचारो से कंट्रोल कर सके ।

#किसी बडी घटना को छुपाकर किसी गाय की या बकरे की घटना मे कई दिन तक उल्झाये रख सकते है, और हम भी उस समय उनकी दर्शाई ,दिखाई गयी पटकथा के आलावा कुछ और नही देख पायेन्गे
इसी क्रम मे कभी कभी हमे लगता है की हम किसी चीज़ को हाइलाइट कर रहे है ,वायरल कर रहे है, जबकी असल मे हम बस उनके कठपुतली बने उनके अनुसार चीज़ो को समर्थित और विरोध कर रहे है वो भी आंख मून्द कर...

ध्यान रखिये जब भी कोई चीज मुफ्त होती है, तो उसकी कीमत हमें हमारी आजादी दे कर चुकानी पड़ती है।

“ज्ञान से शब्द समझ आते हैं, और अनुभव से अर्थ”

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दरअसल हम आधुनिकता, धर्म, प्रगतिशीलता, धर्मनिरपेक्षता, मानवाधिकारों आदि हर बात पर घोर चयनात्‍मक हैं। जिस चीज से हमारी दूकान चलती है उस पर बलाघात करते हैं। परंतु जिस बात का उल्लेख मात्र करने से दूकान के बैठने
का खतरा है उसे नजरअंदाज करके आगे बढ़ जाते हैं।

जिस प्रकार की त्वरित एवं सुनियोजित हिंसक प्रतिक्रिया देखने को मिली वह भयावह और भविष्य के प्रति बहुत कुछ संदेश देने वाली है। यह बर्बर मध्ययुगीन असहिष्‍णु मानसिकता का प्रतीक है। मध्ययुग में हकीकत राय, गुरु अर्जुन देव, गुरु तेग बहादुर, दारा शिकोह, सरमद, आदि की हत्‍या एक लंबी परंपरा की कडि़यॉं हैं। यह स्पष्ट है कि चाहे छद्म धर्मनिरपेक्षता हो अथवा धार्मिक ध्रुवीकरण, इससे किसी भी समुदाय का भला नहीं होने वाला है। समय की मॉंग है कि देश के दोनों प्रमुख धार्मिक समुदायों के आपसी संबंधों का पुर्नमूल्यांकन हो और वे आपस में सद्भाव से रहे। देश की खातिर सद्भाव
परमावश्‍यक है अन्यथा यह दुश्‍मनी भावी पीढि़यों को भी अशांत और हिंसक बनाएगी। प्रश्‍न यह है कि आखिर यह सब कब तक चलेगा? बस भाई-भाई का नारा पर्याप्त नहीं है। संबंधों का निर्माण परिपक्वता की ठोस नींव पर हो। साफ
शब्दों में कहे तो हिन्दु-मुस्लिम संबंध राजनीतिक नेतृत्व, संकीर्ण मानसिकता वाले तत्वों और छद्म प्रगतिशीलों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता है। क्‍योंकि वे बोधि वृक्ष नहीं बल्कि बोनसाई हैं। वे निहित स्वार्थ से प्रेरित भी हैं। राजनीतिक दल वोटबैंक के समीकरणों को साधने के लिए रस्साकशी करते हैं और छद्म बुद्धिजीवी सुकरातीय ख्याति के तलबगार हैं। दोनों समुदाय के आम लोग सच और वर्तमान यथार्थ को समझकर भविष्‍य की रूपरेखा तय करे तो देश के लिए हितकर होगा।

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सब कुछ चयनात्मक है। अनुपात, तर्क, इतिहास, किसी का लिहाज नहीं किया जाता है। बस समीकरण और संतुलन को प्रतिष्‍ठा मिलती है। हम चाहे किसी भी धर्म के अनुयायी हो अथवा पूर्णत: नास्तिक हो परंतु अपने वक्तव्‍य और आचरण से किसी को ठेस पहुँचाने का अधिकार नहीं है। लेकिन जब देवी सरस्‍वती और दुर्गा के अश्लील चित्र और बदनीयती से की गयी टिप्पणियों को प्रगतिशीलता और अभिव्यक्ति की आजादी का दर्जा मिलता है और किसी अन्य धर्म के विषय के बारे में कथन पर सुनियोजित तरीके से हिंसा होती है तो कुछ सवाल जरूर उठते हैं। बात चाहे वोट बैंक के समीकरणों की हो अथवा व्‍यापार, आयात-निर्यात, प्रवासी भारतीयों के हितों का मसला या अन्तरराष्ट्रीय संबंधों में नट संतुलन स्थापित करना, कमजोर दिल और मनोबल वाले बहुधा झुकते नजर आते हैं। किसी धर्म के बारे में अशोभनीय टिप्‍पणी समर्थन योग्य नहीं है लेकिन विदेशी दबाव के आगे घुटने टेकने की बजाय हमें स्वयं को सशक्‍त बनाना है ताकि कोई हमें ऑंख दिखाने से पहले हजार बार सोचे। अगर किसी धर्म के विषय में
की गयी असभ्य टिप्पणी निंदनीय है तो हर ऐसी हरकत को एक ही श्रेणी में रखा जाए। मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्‍यक्ति की आजादी इत्यादि चयनात्‍मक इस्तेमाल और पक्षपातपूर्ण रवैया के कारण उस सिक्‍के की भॉंति हो गए हैं जिस पर अंकित मूल्य तक पढ़ना कठिन है। कतिपय इस्लामिक देशों के द्वारा निंदा उनके संकीर्ण नजरिया परंतु अपने मजहब के बारे में एकजुटता को दर्शाता है। यह एकजुटता हिन्दू समाज में नदारद है। बेहतर होता कि इस्लामिक देश सर्वप्रथम अपने गिरेबान में झॉंक कर देखते। देखने के लिए अपने गिरेबान से अधिक उपर्युक्‍त जगह और कोई नहीं है। धार्मिक अल्‍पसंख्यकों के प्रति व्यवहार और तथाकथित ईशनिंदा कानून का इस्तेमाल, बर्बर मध्ययुगीन रिवाजों पर कायम रहना उनके समाज की विशेषता है। वे भारत और पश्चिमी देशों के समाज, कानून और सहिष्णुता से अनेक प्रकाश वर्ष पीछे हैं। कोई भी धर्म, कानून और संविधान बदलते हुए समय की कसौटी पर कसा जाना चाहिए। वैज्ञानिक नियमों के विपरीत, मानवीय आधार पर अन्यायपूर्ण आयत, श्लोक, वचन आदि अस्वीकार्य हैं। इक्कीसवीं सदी में मध्‍ययुगीन रिवाजों की गुंजाइश न होने के बावजूद उनसे चिपके रहना ऐसी सोच पर सवालिया निशान लगाता है। मार्क्‍स का ‘दास कैपिटल’ भी उत्पादन, पूँजी और समाज के विषय में अपनी उपयोगिता खो चुका है। फिर भी उसे ढ़ोते रहना उसके तथाकथित अनुयायियों के मानसिक स्‍तर का परिचायक है।

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लोककीर्ति में केवल आपका समुदाय आपको जनता है और लोकोत्तर कीर्ति में सब आप पर गौरव करते हैं।
यथा अपना जन्म दिवस तो सब मनाते हैं लेकिन श्री राम नवमी पूरी दुनिया मनाती है, श्री कृष्ण जन्माष्टमी सारा संसार मनाता है और तो और अपने अपने घर पर सब अपने नाम की पट्टिका लगाते हैं लेकिन कुछ घरों में आज भी श्री सीताराम सदन लिखा मिलता है। अस्तु! व्यवहार ही तय करता है की आपकी कीर्ति आपके घर तक ही है अथवा बाहर भी है। क्षणिक है अथवा अक्षुण्य। अपने घर में ही आदर है अथवा समाज में भी है। यह विचार बिन्दु हमें हमारे होने के अर्थ को प्रकट करता है।
🌷🙏🏻💐

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वेद वाणी 7-34-13


व्येतु दिद्युद् द्विषामशेवा युयोत विष्वग्रपस्तनूनाम्॥ ऋग्वेद ७-३४-१३॥

राष्ट्र के वीर योद्धा अपने प्रचण्ड पराक्रम एवं उन्नत सैन्य शक्ति से शत्रुओ का नाश कर राष्ट्र की प्रजा का रक्षण एवं पालन करें। हे वीर पुरुषों! अत्यधिक चमकता हुआ प्रकाश सब दिशाओं में फैले।

The brave warriors of the nation, with their mighty might and advanced military power, destroy the enemies and protect and obey the people of the nation. O brave men! The shining light spread in all directions.

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*🙏🏻शुभ प्रभात🙏🏻*
*कठिनाइयां" जब आती हैं*
*तो "कष्ट" देती हैं,*
*पर जब जाती हैं*
*तो "आत्मबल" का ऐसा उत्तम उपहार दे जाती हैं*
*जो उन "कष्टों" "दुःखों" की तुलना में "हजारों" गुणा "मूल्यवान" होता है ।*

🙏🙏🙏🙏🙏

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मजदूर दिवस के अवसर पर दुनिया के मजदूरों की दशा का सिंहावलोकन होना चाहिए। श्रमिक वर्ग मानव सभ्यता की धुरी रहे हैं। चींटियों और मधुमक्खियों में भी वे निर्माता के रुप में जाने जाते हैं। मिस्र के पिरामिड, चीन की दीवार, अमेरिका में कोलोराडो नदी पर हूवर और नील नदी पर आस्वान बाँध से लेकर तमाम मानव निर्मित कृतियाँ मजदूरों के श्रम का परिणाम हैं। 'दुनिया के मजदूरों एक हो। तुम्हारे पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के सिवा कुछ नहीं है' ऐसी गंभीर घोषणा और हर राजनीतिक दल के अतिशयोक्तिपूर्ण घोषणापत्रों के पश्चात भी कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान मजदूरों का असहाय अवस्था में पलायन दुर्भाग्यपूर्ण है। पूँजीवाद को मजदूरों का खून पीने वाला बताने वाले यह समझाने में असमर्थ है कि साम्यवादी व्यवस्था में लाखों-करोड़ों मजदूरों को उलजलूल सांस्कृतिक क्रांति इत्यादि के नाम पर क्यों मौत के घाट उतारा गया। क्यों साईबेरिया के ठंड़े बियाबान में उनका क्रूर नरसंहार हुआ? मजदूरों का कोई देश नहीं होता है कहने वाले यह नहीं बता पाते हैं कि भूतपूर्व सोवियत संघ और साम्यवादी चीन का सीमा विवाद के कारण सशस्त्र संघर्ष क्यों हुआ। वर्ण व्यवस्था में कामगार शूद्र थे। दोनों विश्व युद्धों में रूस और दुनिया के दूसरे देशों के भी सैनिक मजदूर ही थे। रणभूमि में मरने वाले भी वही थे। भारत में मजदूर संगठन तो हैं परंतु मजदूरों का कोई राजनीतिक दल नहीं है। न्यूनतम मजदूरी का प्रावधान है परंतु मजदूर दीन-हीन अवस्था में है। निराला की वह तोड़ती पत्थर वाली पंक्तियों का आज भी प्रासंगिक होना मजदूरों की दशा की वास्तविक दशा को दर्शाता है।
सामंतवाद और पूँजीवाद में अगर उनका शोषण हुआ तो साम्यवाद से भी उन्हें धोखा ही मिला है। मजदूरों का यदि कोई देश नहीं होता है तो वे किसी विचारधारा में बँधे रहने हेतु भी बाध्य नहीं है क्योंकि कोई एक विचारधारा उनके हक को दिलाने में समक्ष नहीं है। हमारे देश के पिछड़े राज्यों से अपेक्षाकृत संपन्न राज्यों में काम के लिए जाने वाले मजदूरों के प्रति हमारी गलत धारणा काफी कुछ दर्शाती है। क्यों न विचारधारा और क्रांति का मोह त्यागकर गाँव और कस्बों का विकास कुछ इस प्रकार हो कि मजदूर भाईयों को शहरों की झुग्गियों में रहने की विवशता न सहनी पड़े। गरीबी उन्मूलन मजदूरों को हक दिलाने की दिशा में सर्वप्रमुख कदम होगा। इतिहास में कदाचित पहली बार कोरोना आपदा के कारण शहरों से गाँवों की ओर कामगारों का पलायन हुआ है। आज की अर्थव्यवस्था शायद मार्क्स के 'दास कैपिटल' के सिद्धांतों से पूर्णतया समझ में न आए। पूँजी और श्रम के आपसी संबंधों और लाभांश के वितरण पर पुर्नविचार आवश्यक है। साम्यवाद की बजाय ग्रामीण क्षेत्रों का विकास मजदूरों के हित में अधिक है। शहरों की नागरिक अवसंरचना पर अनावश्यक बोझ भी समाप्त होगा।

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आप सभी को और आपके समस्त परिजनों को अक्षय तृतीया के इस अति विशिष्ट और पावन पर्व की कोटिशः शुभकामनाएँ. बहुत बहुत बधाई. ईश्वर से प्रार्थना है कि निरन्तर आप सभी के यश और श्री में वृद्धि हो. नित्यप्रति घर में मांगलिक, भक्तिमय और आनंदमय वातावरण रहे. शुभ संदेशों का अखंड क्रम बना रहे. ऐसी शुभकामनाओं के साथ मैं आप सभी को हृदय से सादर प्रणाम करता हूँ.

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