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MASHAALLHA KHAN

MASHAALLHA KHAN

@mashaallhakhan600196
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वक़्त जो ठहरता नहीं....

​क्या मसला है इस वक़्त का, जो कभी ठहरता नहीं,
सदियाँ गुज़र जाती हैं, पर यह कभी थकता नहीं।

​कभी धूप की चादर ओढ़ता, तो कभी छाँव बनकर ढलता है,
कैसा है यह मुसाफ़िर, जो किसी मोड़ पर रुकता नहीं।

​हो महलों की रौनक़ें, या ग़रीबों का सूना आँगन,
गुज़र जाता है हर दर से, यह किसी के लिए थमता नहीं।

​कभी घाव भर देता है तो कभी नए जख्म देता है,
निकाल देता तो है हर दर्द से मगर निशान छोड़ देता है।

​शिकवे-शिकायतें छोड़, चल इसका हाथ थाम लें ऐ 'राही',
यह वक़्त है साहब, बस एक बार मिलता है, दोबारा नहीं।

-MASHAALLHA

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## दोतरफा इश्क"

​हमे इश्क हुआ उनकी एक मुस्कुराहट पर,
हम दिल हार बैठे उनकी हर एक चाहत पर।
​जब उनकी नजरों ने हमारी नजरो से मिलकर बताया,
कि उन्हें भी मोहब्बत है हमसे बेहद और बेपनाह इस कदर...
​तब हमे अहसास होता है कि हम ही कैद नहीं है उनकी मोहब्बत मे,
वो भी गिरफ्तार हुए बैठे हैं हमारी मोहब्बत में।

​— MASHAALLAH

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वो जो चराग जलाते थे शब-भर गालिब,
अब उनकी जरूरत कहा रही ।

एक बटन दबाया और पूरा कमरा नूर ओ नूर हो गया ।

-MASHAALLHA

हर फूल गुलाब नहीं होता
हर नशा शराब नहीं होता
दिवाने डूब जाते हैं इसमे
जब इश्क का ये दरिया पार नहीं होता

-MASHAALLHA

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—हवाओ का रूख—
सभी दूर है मुझसे अभी
सभी पास होते तो क्या ?

जो दिल का हाल बताते उन्हे
तो तन्हाइयो का मलाल होता क्या ?

बुझी नहीं है चरागो की वो रोशनी
अभी थोड़ी कम है तो क्या ?

हवाओ का रूख बदलने तो दो
फिर सवेरा होने मे वक्त लगता है क्या ?

-MASHAALLHA

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रूह की ख़ुशबू -

बिना बोले जो कह दे दास्ताँ, वो बात होती है,
जो बिन देखे ही महका दे, वो एक सौगात होती है।
हज़ारों फूल खिलते हैं चमन में हुस्न की ख़ातिर,
मगर जो रूह को छू ले, वो बस ख़ुशबू की ज़ात होती है।

-MASHAALLHA

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"अब न जीत, न हार"

अब न कोई आरज़ू है बाकी, न किसी का है इन्तेज़ार।
हम ज़िन्दगी के उस दौर में आ गए हैं यार...

जहाँ दूर-दूर तक फैला है बस सुकूँ भरा नज़ारा,
न पाने की कोई हसरत बची, न खोने का मलाल।

बद्दुआएं भी अब असर नहीं करतीं हम पर,
और न काम आती है किसी की दुआ भी...

शायद किस्मत के इस खेल से आगे, बहुत आगे हैं हम,
अब न जीत की खुशी मनाते, और अब न हार की परवाह करते हैं हम।

-MASHAALLHA

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...बहता हुआ दरिया ...

मेरी कमी क्या होगी किसी को,
मैं ठहरा एक बहता हुआ दरिया,
जो बहाव की जद में बस बहता गया।

कुछ लौटते हैं मुसाफिर शहर में,
पर मैं तो बस राहों का होकर रह गया।

कौन ढूंढेगा मुझको उस गुज़रे हुए वक्त में,
मैं यादों के दरमियां बस सिमट सा गया।

ना कोई साहिल मिला, ना कोई मंज़िल मिली,
मैं तो बस दो किनारों के बीच बंट कर रह गया।


-MASHAALLHA

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—तय मुलाकात—
​कल फिर मुलाकात करेंगे तुमसे,
अधूरी ये बात फिर करेंगे तुमसे।

​जो दिल में छिपे हैं जज़्बात अभी,
वो मिलकर बयां फिर करेंगे तुमसे।

​अब क्यों उदास हो तुम...
कल फिर मिलेंगे तो हम!

​ऐसे ना तुम अब करो,
इंतजार थोड़ा तो करो।

​हम भी बेचैन हैं थोड़े, जुदा होने से डरें,
रात ही की तो बात है, फिर तय मुलाकात है।

​अब मुस्कुरा दो तो जरा,
इस गम को भुला दो जरा।

​चलो अब उठ जाते हैं, अपने घर को जाते हैं,
रात रोके तो क्या, एक-दूजे के ख़्वाब में आ जाते हैं।"

-MASHAALLHA

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—बाहर निकल कर देख लो—

जिद है करने की कुछ पर अन्जाम से डरते हैं लोग,
बेबसी चोखटो पर फिर यूहि मरते हैं लोग।

गर खाब है तो पूरा करो डरकर क्या हो जाएगा,
एक उम्र के बाद ये जख्म बनकर रह जाएगा।

बाहर निकल कर देख लो हर कोई परेशान हैं,
कोशिशो की जिद करो बाकी तुम मे जान है।

फिर तुम्हारा सोया मुकद्दर झक मारकर आएगा,
मंजिलों की चोटियों तक आसमां भी आएगा।

-MASHAALLHA

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