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इश्क़ में मोहन जिसने भी चोट खाई है.. शायरी बस उसी के समझ में आई है..
तुम अच्छे पहले भी लगते थे मोहन प्यार सहित.. अच्छे अभी भी लगते हो तुम मगर प्यार रहित..
कभी इश्क़ ऐसे मोड़ पर ले आता है.. जहाँ समझ नहीं आता.. इधर जाएं या उधर जाएं अब यहाँ खड़े भी रहें तो कब तक और क्यूँ. फ़िर आदमी चल देता है एक रास्ते पर बेमकसद..
किसी की पसंद होना कोई बड़ी बात नहीं.. कब तक रहते हो पसंद ये बड़ी बात है..
कोई अपना होता तो करते भी बात उसकी.. गैरों की बात करना भी भला कोई बात हुईं..
ये मानकर चलना तुम बहुत अच्छे जब तक लगोगे.. तब तक मोहन अगले का मक़सद ना पूरा हो जाए..
ग़लत कहते हैँ लोग मोहन कि दूर रहने से प्यार होता नहीं कम.. मगर जो दूर हो जाए उस प्यार में बताओे कहीं होता है दम..
मैं जिसकी तरफ़ रास्ता बनाता गया.. वही मेरे रास्ते में कांटे बिछाता रहा..
उसने बड़ी अदा से अपनी जुल्फों को काँधे पर झटका.. मैं तो संभल गया जैसे तैसे पर दिल खा गया झटका..
अब तू क्यूँ बेकार हमें भरमा रहा है.. क्या तू पहले जैसा नज़र आ रहा है..
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