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Parth yadav

Parth yadav Matrubharti Verified

@parth6606
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मोहे श्याम बिना चैन कहाँ,
नैनन बरसे नीर।
रात अँधेरी, मन है सूना,
तुम बिन जग अधीरा॥

बंसी की वो मधुर तान सुनूँ,
स्मृति में बस तुम ही तुम,
धड़कन बोले “राधे-श्याम”,
हर श्वास बने तुम संग सुगम॥

कुंज गली में ढूँढूँ तुमको,
पग पग पूछूँ नाम,
यमुना तट भी रोता देखो,
लेकर तेरा धाम॥

चाँद भी फीका, तारे रूठे,
जबसे गए हो दूर,
मन-मंदिर की ज्योत बुझी है,
कैसे सहूँ ये सून॥

आओ कान्हा, दीन दयाला,
दर्शन दो इक बार,
विरह अगन में जलती राधा,
कर दो जीवन सार॥

मोहे श्याम बिना चैन कहाँ,
आ जाओ गिरधारी,
तेरे चरणन की धूल ही मोहे,
लगती है प्यारी॥

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मै उजालो से डरता हु, अंधेरो मे फिरता हु ,
जहा से दुर एक कोने मै बसता हु,
पता है मुजै मैरै हालात, मै मुजमैही रहता हु,
राज की तरह मै भी खामोश,शा हु,
सब चील्लाते है, मगर मै जैसै दफ्न रहता हु,
गुजरते रहते दिन, रात, महीनो, बरसो,
और, मे तरसते, पडपता,अंधेरो मे छीपता हु,
डरा सहमा दुर से सब देखता रहता,
संसारकी भीडमे,मै खुदको खोजता रहता हु,
कुछ तो होगा, ए आस लेकर बैठा हु,
अंधेरेके बावजूद वो मुजे देखेगा इंतज़ार करता रहता हु,
बेबस हु, लाचार हु, जाने कबसे चुप हु,
छ गज माटी मे सीमटा, कोन हु मै? पुछता रहता हु,
बरसो से, तरसते कान इक आवाज सुनने,
जबसे मुजे यहा छोडा, मे अंधेरो मे रहता हु,
बहुत भिड लगीथी, उस रोज उजाले मै,
दफनाया सबने रोते हुए मुजे, कही अंधेरोके शहर मै.
मै उजालो से डरता हु, अंधेरो मे फिरता हु.

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क्यु तु मुझे मेहसूस हो रहा,
क्यु बेवजह इश्क़ हो रहा,
तू पास नही, फिर
क्यु तु मुझे मेहसूस हो रहा,

क्यु भीड़ में तन्हाई है…
क्यु हर राह तुम तक जा रही,
क्यों तु हर जगह दिख जाती है
और हर दफा दिल खो जाता है,

क्यु तु मुझे मेहसूस हो रहा,
तू पास नही, फिर
क्यु तु मुझे मेहसूस हो रहा,

क्यों साया बनके आती हो,
रातों को जगाती हो,
फिर तन्हा कर जाती हो,
बस मै अकेला रह जाता हु,
और तुम ओजल हो जाती हो,

क्यु तु मुझे मेहसूस हो रहा,
क्यु बेवजह इश्क़ हो रहा,

क्यु खामोशी बया कर रही,
तेरा ही हक अदा कर रही,
क्यु खाली खाली सा दिन लगे,
क्यु तन्हा ए राते लगे,
क्यु तुझसे मन बात करे,
क्यु सिर्फ तुमसे इश्क़ करे

क्यु बिखर रहा हूँ मैं,
तेरे जाने के बाद,
क्यु बेखबर हो तुम,
क्या कोई गिलाह है,
क्यु बिखर रहा हूँ मैं,

क्यु तुमको ही दिल पुकारे
क्यु तु मुझे मेहसूस हो रहा,
क्यु बेवजह इश्क़ हो रहा,

क्यु बेवजह
क्यु बेवजह
इश्क़ हो रहा,

क्यु बेवजह
इश्क़ हो रहा,
इश्क़ हो रहा,

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लगता नही तेरे सिवा
ए दिल कही मेरा,
खोजता है राह पर,
रात भर तुमको,
क्या यही चाहतो का नशा,
उम्र भर रहता है,

शायद किसी और कहानी में…
हम साथ लिखे जाएँगे…
इस कहानी में बस इतना है…
हम अधूरे… रह जाएँगे…

मै श्याम श्याम पुकारू
तो क्या मोहन तुम आवोगे,
मे मीरा जैसे गाऊँ तो
क्या मोहन तुम आवोगे,

मे नरसी बनके पुकारूँगा
क्या मोहन तुम आवोगे,
मे भटक रहाहु माया मै
तुम बचाने आवोगे,

मे राधा राधा पुकारूँगा
तुम सुनने मोहन आवोगे,
मै बनके गजेंद्र वाट तिहारु
तुम बचाने आवोगे,

मे खड़ा हु बनके सालबेग
तुम वाट हमारी निहारोगे,
मै श्याम श्याम पुकारू
तो क्या मोहन तुम आवोगे,

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की मै दूर चला जाऊंगा,
वापस कभी ना आऊंगा.
तु मुड कर ना देखना मुझे,
मै नज़र नही आऊंगा,
मै दूर चला जाऊंगा ।

जी करता है बच्चा हो जाऊ,
फिर उन्ही गलियों मै खोजाउ,
थोड़ा कच्चा, थोड़ा सच्चा हो जाउ,
जी करता है बच्चा हो जाऊ.

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उनकी खामोशी शाम सी बसर ने लगी।
लगता है राज गहरा कोई अंधेरो की तरहा है।।

ए सफर आधा आधा नाजाने कब पुरा हो पायेगा ।
कौन जाने रातों का,अंधेरा कब सुबह हो पायेगा।।