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Vishakha Pareek

Vishakha Pareek

@purushotampareek553gmail.com029871
(163)

भीड़ में किसी का पहचानना भी
तसल्ली का काम करता है,
खासियत के कुछ पन्नों में
खुद का नाम करता है,
नसीब से ही मिलते हैं
उम्र भर साथ चल सकने वाले,
वरना,
भीड़ में तो हज़ारों कदमों का जाल रहता है,
​ज़रूरी नहीं,
हमारी तस्वीर में खड़ा साथ मुस्कुराने वाला हर शख्स हमारा अपना हो,
कभी-कभी,
तस्वीर में कभी ना दिखने वाला भी उम्र भर हमारे साथ रहता है !!!!

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कहानी शुरू करना इतना मुश्किल नहीं लगता,
जितना उसे ख़त्म करना लगता है!
शुरुआत में तो सब अच्छा है...
धीरे-धीरे सब आसान सा लगता है।
पता ही नहीं चलता कब कहानी का हिस्सा बीच में पहुँच जाता हैं,
फिर देखते हैं...
नैया डगमगा रही है, आगे बढ़ पाना मुश्किल लगता है।

धीरे-धीरे जब अंत के करीब आते हैं,
तब याद आता हैं कि कहानी की शुरुवात में हम अंत पता करना भूल जाते हैं
तब लिखने में बहुत मुश्किलें आती हैं,
समझ नहीं आता कैसे ख़त्म करें।
जिस आसानी से शुरुआत की थी,
उसी आसानी पर ख़त्म करना,
थोड़ा मुश्किल लगने लगता है।
पता नहीं कैसे अंत खोज के लाएँ?
यह सोच-सोच के दिमाग पूरा खपने लगता है।

जैसे-तैसे करके शब्द बटोरने पड़ते हैं,
तब जाकर कहीं कोई अंत नज़र आता है...
पता नहीं वह सही भी है या नहीं,
पर शुरुआत को अंत तक लाना, बड़ा मुश्किल लगता है!
ज़रूरी थोड़ी है हर चीज़ ख़त्म करनी पड़े?
पर फिर भी... सबको दिखाने के लिए ख़त्म करना ही पड़ता है,
वरना उम्मीदें लग जाती हैं—कि आगे और कुछ आने को है!
पर कैसे बताएँ?
लेखिका के पास अब कुछ नहीं बताने को हैं....
बड़ा मुश्किल होता है अंत लिखना, फिर भी अंत लिखना पड़ता है!

मैं चाहती नहीं कि अंत लिखूँ,
पर फिर भी मैं चाहती हूं
पता नहीं क्यों?
लेकिन मैं कहानी को अंत तक ज़रूर लाती हूँ!

ज़रूरी थोड़ी है कि हर कहानी ख़त्म हो...
पर मुझे फिर भी लिखना होता है,
पर सच में... बहुत मुश्किल होता है!
ओर अंत में मेरी लिखी... "सभी" कहानियों का यही हश्र होता है।

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बिछड़ने का दर्द सिर्फ एक लव स्टोरी तक सीमित नहीं होता। बिछड़न तो हर उस जगह है जहाँ ज़रा सा भी जुड़ाव था।
​जब कोई पुराना दोस्त छूटता है, तो वो भी तो प्यार ही था। जब किसी पसंदीदा किताब का आखिरी पन्ना खत्म होता है और मन में अचानक एक खालीपन तैरने लगता है कि "अब आगे क्या?", तो वो भी बिछड़न ही है। भले ही हम उसे उस वक्त कोई नाम न दें, लेकिन दर्द तो होता ही है।
​कुछ दर्द इतने गहरे होते हैं कि उन्हें शब्दों में ढाल पाना मुमकिन नहीं होता। और कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं जिनका होना बहुत ज़रूरी होता है—क्योंकि वही दर्द इस बात का सबूत हैं कि हमने किसी चीज़ को सच्चे दिल से महसूस किया था।
​मुझे नहीं पता मैं यह सब क्यों लिख रही हूँ, बस जो मन के अंदर जमा था, वही कागज़ पर उतर रहा है। पर जो भी है, अच्छा लग रहा है। लिखना मन को हल्का कर देता है।
​हर दर्द का रिश्ता सिर्फ आशिक़ी से नहीं होता। बिछड़ना ज़िंदगी के हर मोड़ पर होता है, और दर्द... दर्द बस बिछड़न की परछाईं है। शायद इसीलिए, यह दर्द भी उतना ही ज़रूरी है जितना कि जुड़ाव।

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'The End' के बाद की कहानी___

मुझे फ़िल्में देखना बहुत पसंद है,
बहुत शौक़ है मुझे फ़िल्में देखने का।
शौक़ इतना... कि एक बार देखना शुरू करूँ,
तो ख़त्म किए बिना उठने का जी नहीं चाहता!

दिन में हज़ारों कहानियाँ सुन सकूँ,
बस यही एक ख़्वाहिश है...
जो इतनी ख़्वाहिशों के बीच भी, एक सुकून दे जाती है।

लेकिन... एक कहानी ख़त्म होते ही,
यह दिल सा टूट जाता है!
इसके आगे क्या होगा?
बस यही सोच-सोच के,
दिमाग हिल जाता है।

'Happy Ending' पे सब ख़त्म हो जाता है,
पर... उसके आगे क्या?
यह सवाल बार-बार आता है!

हीरो जीत जाता है,
हीरोइन से मिल जाता है,
विलेन मर जाता है...
फिर आगे क्या?
क्या आगे सब ख़त्म हो जाता है?

वो कैसे रहते होंगे फिर आगे?
अपने जीवन को कैसे जीते होंगे?
विलेन के मरने के बाद...
क्या कोई बदला लेने नहीं आता होगा?
उसके घर पे कैसा नज़ारा चलता होगा?

हीरो-हीरोइन अब कैसे जिएँगे?
ऐसे ही हज़ारों सवालों के आगे,
दिमाग घूम जाता है!

फिर...
एक कहानी के सवाल मिटाने को, हम दूसरी कहानी देख लेते हैं,
और फिर...
उस कहानी के सवाल वापस घेर लेते हैं!
पर सवालों के जवाब नहीं मिलते हैं...

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सब अच्छा हो जाता है जब किन्नर आशीर्वाद देते हैं,
पर... क्या पैसों से आशीर्वाद मिलते हैं?
​शादी, ब्याह, जन्म, आगमन... हर खुशी में उन्हें बुलाते हैं,
कुछ पैसे देते हैं, मिठाई देते हैं,
और आशीर्वाद देने को बहुत कहते हैं।
कामना होती है हमारी कि बस वो दुआ दे दें,
हम उनसे बार-बार यही कहते हैं—
"आशीर्वाद दो, सब अच्छा है... आप जब कह दो, सब सच्चा है!"
​पर क्या सच में... पैसों से आशीर्वाद मिलता है?
​उनके आने से लेकर उनके जाने तक, वो तो बस दुआएं ही देते हैं,
पर क्या इतने कुछ पलों में कोई आशीर्वाद मिलता है?
उनके जाने के बाद... पीठ पीछे लोग जाने कितनी बड़बड़ाहट करते हैं,
क्या नफ़रत की उस ज़मीन पर कोई आशीर्वाद पलता है?
खुदसे ​इज़्ज़त नहीं धेले की... और हम उनको इज़्ज़त देने की बात करते हैं,
क्या ऐसे खोखले इरादों से आशीर्वाद चलते हैं?
​आशीर्वाद तो सम्मान से मिलता है, जो वो अपनी मर्ज़ी से दें,
और हम... पैसों से उनका आशीर्वाद खरीदते हैं!
क्या सच में वो आशीर्वाद होते हैं?
​मुझे समझ नहीं आता, लोग ऐसा कैसे करते हैं?
सम्मान नहीं देते, इज़्ज़त नहीं करते,
पर अपने लिए सब कुछ अच्छा चाहते हैं!
लोग ऐसा दिखावे का आशीर्वाद... कैसे सहन कर पाते हैं?

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ठहराव और गति: जीवन में संतुलन की तलाश____
​पुराने समय की बात करें तो उस दौर में एक अजब सा ठहराव था। लोग रुकते थे, एक-दूसरे का हाथ थामकर आगे बढ़ना चाहते थे। रिश्ते एक-दूसरे के लिए सीढ़ी का काम करते थे, जहाँ सब साथ मिलकर ऊपर चढ़ते थे।

​आज की भागदौड़ और मौकों की होड़____
​आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में स्थिति काफी बदल चुकी है। अब लोग रुकना पसंद नहीं करते। अगर कोई पीछे छूट रहा हो, तो लोग उसका इंतज़ार किए बिना आगे निकल जाते हैं। रिश्ते अब पहले की तरह एक-दूसरे की सीढ़ी नहीं बनते। धैर्य में कमी ज़रूर आई है, लेकिन इसे पूरी तरह गलत भी नहीं कहा जा सकता। आज के दौर ने लोगों को यह सिखाया है कि जब भी कोई मौका मिले, उसे तुरंत पकड़ लो—उसे हाथ से जाने मत दो। पुराने समय में दूसरों का इंतज़ार करने और अत्यधिक धैर्य बनाए रखने के चक्कर में कई बेहतरीन मौके हाथ से निकल जाया करते थे। शायद उसी नुकसान से सीख लेकर आज की पीढ़ी ने तेज़ दौड़ना शुरू कर दिया है।

​धैर्य और गति का संतुलन____
​भागने का मतलब यह नहीं कि मन में धैर्य खत्म हो गया है, और न ही धैर्य का अर्थ यह है कि इंसान आगे बढ़ना छोड़ दे। असल में तरक्की और सुकून दोनों के लिए गति और धैर्य—इन दोनों का होना बेहद ज़रूरी है। आज के जीवन में सिर्फ एक चीज़ की कमी है, और वह है 'संतुलन (Balance)'।

​यदि हम इस तेज़ भागती ज़िंदगी में थोड़ा सा पुराना धैर्य घोल लें और अपनी गति भी बनाए रखें, तो जीवन जीना पहले से कहीं अधिक सरल हो जाएगा। न पुराना दौर पूरी तरह गलत था, न आज का दौर खराब है। कमी किसी दौर में नहीं, बल्कि हमारी समझ में है। जिस दिन यह संतुलन की समझ आ जाएगी, सब कुछ सहज हो जाएगा।

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मेरे कमरे की खिड़की पर, एक पर्दा लगा है...
पर्दे को हटाऊँ, खिड़की खोलूँ,
तो उससे आसमाँ दिखता है!
उस आसमाँ में कितने बादल हैं...
रात हो, तो वहाँ तारे टिमटिमाते हैं,
और चाँद अपनी रोशनी लेकर पहुँच जाता है उसे चमकाने!
मेरी खिड़की का किनारा... बहुत तीखा है,
हाथ लगाओ तो कभी-कभी चुभ भी जाता है।
चुभ जाए... तो एक आह निकलती है,
जो मेरे ही कमरे में सुनाई देती है...
सुनाई भी कुछ इस कदर, कि गूँज ही पड़ती है आवाज मेरी,
जो लौटकर मेरे ही कान में आकर लगती है!
इतना खाली है कमरा मेरा... कि सच कहूँ तो,
मुझे खिड़की से दिखते आसमाँ से कभी - कभी जलन होने लगती है!
क्योंकि जितने तारे उसमें भरे हैं...
उतना ही खालीपन मुझे मेरे कमरे में लगता है।
बहुत खाली है कमरा मेरा,
इसलिए शायद मुझे खिड़की से दिखता आसमाँ अच्छा लगता है!
बहुत सुंदर है वह...
अच्छा लगता है उसे देखना, उसे निहारना,
वह मुझे पूरा करता है...
मेरे कमरे के खालीपन से, मुझे थोड़ा दूर रखता है।
मेरी खिड़की से दिखता आसमाँ...
कभी-कभी जलन के साथ, मुझे सुकून भी देता है!

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सच में हुआ क्या? मुझे नहीं पता...
मैं चल रही थी, मैं शांत थी, मैं खुश थी।
फिर कुछ तो हुआ... और मैं रुक गई।
​मुझे नहीं पता क्या हुआ, पर मैं रुक गई।
और फिर देखा... ठहरना है,
ठहरी, तो जाना कि थमना है,
और थमकर... मैं वहीं बैठ गई।
​बैठके मैंने सबकी सुनी,
और फिर मैने कुछ अपनी भी कह दी,
फिर उसके बाद जो हुआ...
मुझे नहीं समझ आया कि वो क्या हुआ!
​एक-एक करके सब अपनी कहने लगे,
मैंने जो कहा था... वो तो महज़ एक शब्द था,
पर नाजाने क्यों उस पर टिप्पणी पर टिप्पणी, सब वाक्यों में करने लगे?!!!
​उन वाक्यों को सुनते-सुनते... मैं सहम गई।
​मेरा एक आँसू आँख पर आया,
पर वो गिरने से पहले रुक गया।
दूसरे के आने पर, पहले ने पूछ लिया—
"आना है, या रुक जाएँ?"
पर पहले के पूछने में थोड़ा अहसास था... तो दूसरा गिर गया!
दूसरे के गिरने को, पहले ने इजाज़त में 'हाँ' समझा,
फिर क्या... उसके बाद दोनों का साथ बन गया!
​मैं इतनी ख़ामोशी में थी, फिर भी यह हुआ...
और सच कहूँ... सब मेरी मौजूदगी में था,
लेकिन मुझे आज भी नहीं पता कि क्या हुआ!
​कितना अजीब है ना...।।।।।।

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मेरे दिल-ओ-दिमाग़ में, ख़्यालों की एक अलग ही दुनिया बसती है,
मैं जीती तो हूँ हकीकत में... पर मेरी सांसें उसी दुनिया में चलती हैं!
​मुझे जीना पसंद है, तो मैं जीती हूँ,
मुझे हंसना पसंद है, तो मैं हंसती हूँ...
पर जब मन करे रोने का, तो मैं रोने से पहले...
पता नहीं क्यों, थोड़ा सोचती हूँ!
​थोड़ा अजीब है मेरा मुझसे मिलना,
पर जब भी मिलती हूँ, खुलकर मिलती हूँ!
​कभी सब खाली सा लगता है, तो कभी बहुत भारीपन,
पर जो भी हो... मुझे उसमें ही अच्छा लगता है।
यह जैसी भी दुनिया है, मैं इसमें खुलकर जीती हूँ!
​मुझे अच्छा लगता है चलना, तो मैं चलती हूँ,
नहीं रुकती, नहीं ठहरती...
गिर जाती हूँ कभी, तो हंसकर संभलती हूँ!
​मेरे ख़्यालों की दुनिया में, मैं खुश हूँ,
और मैं उस खुशी के साथ ही खुद को समझती हूँ...
क्योंकि... मैं मुझे वैसी ही अच्छी लगती हूँ!

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किसको दोष दूँ मैं अपने गुनाहों का,
जब मालूम है... गुनहगार मैं खुद हूँ!
​मेरी गलती, मेरी हस्ती,
मेरी बस्ती... जो टूटी मेरी आँखों के सामने,
किसको कहूँ मेरे आँसुओं की वजह क्या है?
जब मालूम है... आँसुओं का कतरा गिराने की वजह मैं हूँ,
जब मालूम है... उस कतरे का हकदार मैं हूँ!
​आखिर किसको दोष दूँ मैं अपने गुनाहों का,
जब मालूम है... गुनहगार मैं हूँ!
​मुझे नहीं करना अपनी गलतियों का पश्चाताप,
मुझे नहीं करना अपनी गलतियों का पश्चाताप...
मुझे तो बस अपनी गलती की सज़ा भुगतनी है!
​पर किससे कहूँ कि सज़ा दे मुझे मेरी गलती की?
जब मालूम है... अपना ठेकेदार ही मैं हूँ!
​ज़मीन हक में है मेरे, मैं ज़मींदार हूँ उसकी,
ज़मीन हक में है मेरे, मैं ज़मींदार हूँ उसकी...
किससे कहूँ कि बेच दे इसको,
जब मालूम है... खरीदार ही मैं हूँ!
​किसको दोष दूँ मैं अपने गुनाहों का,
जब मालूम है... गुनहगार ही मैं हूँ!

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