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Raju kumar Chaudhary

Raju kumar Chaudhary Matrubharti Verified

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मेरी भाभी नहीं, मेरी माँ

Episode 3: अब तुम इस घर की नहीं हो

अमित की मृत्यु को अभी कुछ ही दिन हुए थे।

घर में पहले जैसी रौनक नहीं रही थी।

जिस आँगन में कभी अमित की हँसी गूँजती थी, वहाँ अब खामोशी पसरी रहती थी।

सावित्री अपने कमरे में बैठी अमित की तस्वीर को देखती रहती।

उसका एक हाथ अक्सर अपने पेट पर होता।

वह धीरे से कहती—

“आप तो चले गए... लेकिन आपकी निशानी मेरे पास है।”

उसकी आँखों से आँसू निकल आते।

वह अपने बच्चे से मन ही मन बात करती—

“तुम्हारे पापा बहुत अच्छे इंसान थे। मैं तुम्हें उनके जैसा ही बनाऊँगी।”

लेकिन सावित्री को क्या पता था कि उसी घर में कुछ लोग उसके भविष्य का फैसला करने की तैयारी कर रहे थे।

---

घर की बैठक

एक शाम घर के बड़े कमरे में परिवार के कुछ लोग बैठे थे।

सुमित भी वहाँ था।

एक बुजुर्ग ने कहा—

“अमित के जाने के बाद घर की स्थिति बदल गई है।”

सुमित चुप रहा।

दूसरे व्यक्ति ने कहा—

“खेती की जमीन का खर्च है, घर का खर्च है... ऊपर से सावित्री और उसके बच्चे की जिम्मेदारी।”

सुमित ने शांत आवाज में कहा—

“भाभी और बच्चे की जिम्मेदारी मैं उठाऊँगा।”

कमरे में कुछ देर सन्नाटा रहा।

फिर एक व्यक्ति ने कहा—

“तू कब तक उठाएगा?”

“जब तक जरूरत होगी।”

“लेकिन यह घर?”

सुमित ने उसकी तरफ देखा।

“यह घर मेरे भाई का था। भाभी उसकी पत्नी हैं। उनका इस घर पर अधिकार है।”

एक आदमी ने कठोर स्वर में कहा—

“अमित अब नहीं है।”

सुमित की आँखों में गुस्सा आ गया।

“अमित नहीं है, इसका मतलब यह नहीं कि उसके रिश्ते भी खत्म हो गए।”

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।

---

सावित्री के सामने फैसला

अगली सुबह सावित्री को बैठक में बुलाया गया।

वह धीरे-धीरे वहाँ पहुँची।

“मुझे बुलाया?”

घर के एक बड़े सदस्य ने कहा—

“हाँ। हमें तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है।”

सावित्री बैठ गई।

उन्होंने कहा—

“अमित अब इस दुनिया में नहीं है। तुम्हें अपनी जिंदगी के बारे में सोचना चाहिए।”

सावित्री ने पूछा—

“क्या मतलब?”

“तुम अपने मायके चली जाओ।”

सावित्री कुछ पल चुप रही।

“मायके?”

“हाँ।”

उसने अपने पेट पर हाथ रखा।

“लेकिन मेरा बच्चा...”

“बच्चा हो जाएगा तो उसकी जिम्मेदारी देखी जाएगी।”

सावित्री की आँखें भर आईं।

“लेकिन यह घर मेरे पति का था।”

जवाब आया—

“पति नहीं रहा तो अब यह घर तुम्हारा नहीं है।”

सावित्री को जैसे किसी ने भीतर से तोड़ दिया।

उसने काँपती आवाज में पूछा—

“तो इतने साल जो मैंने इस घर के लिए दिए... उनका क्या?”

कोई जवाब नहीं मिला।

---

सुमित का प्रवेश

उसी समय बाहर से सुमित की आवाज आई—

“भाभी को कहीं जाने की जरूरत नहीं है।”

सबने पीछे मुड़कर देखा।

सुमित दरवाजे पर खड़ा था।

वह धीरे-धीरे अंदर आया।

“मैंने सब सुन लिया है।”

एक व्यक्ति ने कहा—

“तू फिर बीच में आ गया?”

सुमित ने कहा—

“यह मेरी भाभी का सवाल है। मैं बीच में नहीं, उनके साथ खड़ा हूँ।”

सावित्री ने उसे रोकना चाहा।

“सुमित, रहने दो।”

लेकिन सुमित ने कहा—

“नहीं भाभी। आज अगर मैं चुप रहा तो जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाऊँगा।”

उसने परिवार की तरफ देखकर कहा—

“जब मेरे भाई की जरूरत थी, तब सब उनके साथ थे। आज वह नहीं हैं तो उनकी पत्नी को घर से निकालना चाहते हैं?”

एक व्यक्ति बोला—

“तू हमारा फैसला नहीं बदल सकता।”

सुमित ने कहा—

“मैं फैसला बदलने नहीं आया हूँ। मैं सिर्फ इतना कहने आया हूँ कि मेरी भाभी को कोई घर से नहीं निकालेगा।”

---

एक कठिन सवाल

घर के बड़े ने पूछा—

“अगर इतना ही भरोसा है तो क्या तू उनकी पूरी जिम्मेदारी उठा सकता है?”

सुमित ने बिना सोचे जवाब दिया—

“हाँ।”

“उनके बच्चे की?”

“हाँ।”

“उनकी पढ़ाई की?”

सुमित एक पल के लिए रुका।

उसने सावित्री की तरफ देखा।

फिर बोला—

“हाँ।”

सावित्री ने हैरानी से उसे देखा।

“सुमित, मेरी पढ़ाई?”

सुमित ने कहा—

“भाभी, आपने डॉक्टर बनने का सपना देखा था न?”

सावित्री की आँखें नम हो गईं।

“वह सपना अब कहाँ...”

सुमित ने कहा—

“जहाँ था, वहीं है।”

फिर उसने दृढ़ आवाज में कहा—

“आप डॉक्टर बनेंगी।”

कमरे में बैठे सभी लोग हैरान थे।

सुमित ने आगे कहा—

“भैया ने आपसे वादा किया था। अब वह वादा मैं पूरा करूँगा।”

---

“यह मेरी भाभी नहीं...”

घर का एक सदस्य गुस्से में बोला—

“तू पागल हो गया है क्या? एक विधवा की जिम्मेदारी लेकर अपनी जिंदगी खराब करेगा?”

सुमित की आँखों में आँसू आ गए।

उसने कहा—

“विधवा मत कहिए।”

फिर उसने सावित्री की तरफ देखा।

“ये मेरे भाई की पत्नी हैं। मेरी भाभी हैं।”

कुछ पल रुककर वह बोला—

“और मेरे लिए सिर्फ भाभी नहीं... माँ जैसी हैं।”

सावित्री की आँखों से आँसू बहने लगे।

सुमित ने कहा—

“इन्होंने मुझे हमेशा छोटे भाई की तरह प्यार दिया है। मेरे लिए खाना बनाया, मेरी चिंता की, मेरी गलतियों पर समझाया। आज जब इन्हें मेरी जरूरत है तो मैं पीछे कैसे हट जाऊँ?”

पूरा कमरा शांत हो गया।

---

आखिरी आदेश

लेकिन परिवार के कुछ लोग अभी भी नहीं माने।

एक व्यक्ति ने कहा—

“अगर तू इतना ही बड़ा बनना चाहता है, तो दोनों इस घर से चले जाओ।”

सुमित ने कुछ पल घर की दीवारों को देखा।

यहीं उसका बचपन बीता था।

यहीं उसके भाई ने उसे पढ़ाया था।

यहीं उनकी माँ की यादें थीं।

लेकिन सामने सावित्री खड़ी थी।

उसने अपना फैसला कर लिया।

सुमित ने कहा—

“ठीक है।”

सावित्री घबरा गई।

“सुमित!”

“भाभी, डरिए मत।”

उसने सावित्री का सामान उठाया।

“अगर इस घर में आपके लिए जगह नहीं है, तो मैं भी इस घर में नहीं रहूँगा।”

सावित्री रोते हुए बोली—

“तुम अपना घर मत छोड़ो।”

सुमित ने कहा—

“घर दीवारों से नहीं बनता भाभी। घर उन लोगों से बनता है जिन्हें हम अपना मानते हैं।”

फिर उसने अमित की तस्वीर उठाई।

“मैं अपने भाई की तस्वीर लेकर जा रहा हूँ।”

---

गाँव की सड़क

सावित्री धीरे-धीरे घर से बाहर निकली।

उसके हाथ में कुछ कपड़े थे।

सुमित के हाथ में अमित की तस्वीर।

गाँव के लोग उन्हें जाते हुए देख रहे थे।

किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें।

सावित्री ने पीछे मुड़कर आखिरी बार उस घर को देखा।

उसकी आँखों में आँसू थे।

“यहीं तो मेरे पति की यादें हैं...”

सुमित ने कहा—

“भाभी, यादें घर में नहीं रहतीं। दिल में रहती हैं।”

दोनों आगे बढ़ गए।

लेकिन उन्हें नहीं पता था कि अब उनके सामने गरीबी, समाज, पढ़ाई और आने वाले बच्चे की जिम्मेदारी से कहीं बड़ा संघर्ष खड़ा होने वाला है।

रास्ते में सुमित अचानक रुक गया।

उसने सावित्री से कहा—

“भाभी, एक बात का वादा कीजिए।”

“क्या?”

“आप अपना डॉक्टर बनने का सपना कभी नहीं छोड़ेंगी।”

सावित्री ने आँसू पोंछे।

“वादा।”

सुमित मुस्कुराया।

“तो फिर आज से हमारी नई जिंदगी शुरू।”

दूर आसमान में बादल घिरने लगे।

और उसी रात दोनों एक छोटे-से किराए के घर की तलाश में निकल पड़े।

लेकिन सुमित को अभी यह नहीं पता था कि उसकी जेब में सिर्फ कुछ ही पैसे थे... और अगले दिन घर का किराया देना था।

जारी रहेगा...

अगला एपिसोड:

Episode 4 — “एक छोटा घर और बड़ी जिम्मेदारी

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मेरी भाभी नहीं, मेरी माँ

Episode 4: एक छोटा घर और बड़ी जिम्मेदारी

रात काफी हो चुकी थी।

रामपुर गाँव की गलियाँ लगभग सुनसान थीं। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी और आसमान में बादल छाए हुए थे।

सुमित एक हाथ में अमित की तस्वीर और दूसरे हाथ में छोटा-सा बैग लिए चल रहा था।

उसके साथ सावित्री थी।

सावित्री बार-बार पीछे मुड़कर उस घर को देख रही थी, जहाँ उसने अपने पति के साथ जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिन बिताए थे।

अब वह घर पीछे छूट चुका था।

सुमित ने उसकी तरफ देखा।

“भाभी, आप परेशान मत होइए।”

सावित्री ने धीमे स्वर में कहा—

“मैं अपने लिए नहीं रो रही हूँ, सुमित।”

“तो फिर?”

“मुझे डर लग रहा है।”

“किस बात का?”

सावित्री ने अपने पेट पर हाथ रखा।

“इस बच्चे के भविष्य का।”

सुमित कुछ पल चुप रहा।

फिर उसने कहा—

“जब तक मैं हूँ, आपको और बच्चे को किसी चीज की कमी नहीं होने दूँगा।”

सावित्री ने उसकी ओर देखा।

“लेकिन तुम्हारी भी तो जिंदगी है।”

सुमित मुस्कुराया।

“मेरी जिंदगी में अब आप दोनों भी शामिल हैं।”

---

छोटा-सा घर

काफी तलाश के बाद उन्हें गाँव के बाहर एक पुराना छोटा-सा मकान मिल गया।

मकान बहुत बड़ा नहीं था।

एक छोटा कमरा, एक रसोई और सामने मिट्टी का छोटा-सा आँगन।

मकान के मालिक ने कहा—

“कमरा साधारण है, लेकिन किराया कम है।”

सुमित ने पूछा—

“कितना?”

“हर महीने तीन हजार रुपये।”

सुमित ने अपनी जेब टटोली।

उसके पास कुछ ही पैसे थे।

उसने सावित्री की तरफ देखा।

सावित्री समझ गई।

“अगर मुश्किल है तो हम कोई दूसरा घर देख लेते हैं।”

सुमित ने सिर हिलाया।

“नहीं। यही ठीक है।”

उसने अपनी जेब से पैसे निकाले और मकान मालिक को अग्रिम किराया दे दिया।

मकान मालिक ने चाबी देते हुए कहा—

“कल से रह सकते हो।”

सुमित ने चाबी हाथ में ली।

उसने दरवाजा खोला।

अंदर खाली कमरा था।

न बिस्तर।

न अलमारी।

न कोई सामान।

सावित्री दरवाजे पर खड़ी होकर कमरे को देखने लगी।

फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली—

“कम से कम हमारा अपना तो है।”

सुमित ने कहा—

“हाँ। छोटा है, लेकिन यहाँ किसी को आपको घर से निकालने का अधिकार नहीं होगा।”

सावित्री की आँखें भर आईं।

---

पहली रात

उस रात दोनों ने जमीन पर चादर बिछाई।

सावित्री एक तरफ लेट गई।

सुमित दरवाजे के पास बैठा अमित की तस्वीर देख रहा था।

सावित्री ने पूछा—

“सोए नहीं?”

“नहीं।”

“क्यों?”

“सोच रहा हूँ।”

“क्या?”

“कल से काम ढूँढना है।”

सावित्री ने कहा—

“तुम्हें इतना सब करने की जरूरत नहीं है।”

सुमित ने तस्वीर की तरफ देखते हुए कहा—

“जरूरत है।”

“लेकिन तुम अकेले कितना करोगे?”

“जितना होगा, करूँगा।”

सुमित ने अमित की तस्वीर से कहा—

“भैया, आपने कहा था कि मैं अपने परिवार को संभालूँगा। अब मैं पीछे नहीं हटूँगा।”

---

नौकरी की तलाश

अगली सुबह सूरज निकलने से पहले ही सुमित उठ गया।

उसने पुराने कपड़े पहने और नौकरी की तलाश में निकल पड़ा।

पहली जगह उसने एक दुकान पर काम माँगा।

दुकानदार ने पूछा—

“क्या काम आता है?”

सुमित ने कहा—

“जो काम देंगे, सीख लूँगा।”

दुकानदार ने कहा—

“अभी जगह खाली नहीं है।”

सुमित दूसरी जगह गया।

फिर तीसरी जगह।

फिर चौथी जगह।

हर जगह उसे कोई न कोई बहाना सुनने को मिला।

दोपहर तक उसके पैर थक चुके थे।

लेकिन वह रुका नहीं।

आखिर शाम को उसे एक छोटे से गोदाम में काम मिल गया।

तनख्वाह बहुत कम थी।

लेकिन सुमित के लिए वह नौकरी बहुत बड़ी थी।

उसने मालिक से कहा—

“मैं पूरी मेहनत करूँगा।”

मालिक ने कहा—

“कल सुबह से आ जाना।”

सुमित के चेहरे पर पहली बार मुस्कान आई।

---

घर में इंतजार

उधर सावित्री घर में अकेली बैठी थी।

उसने अपनी पुरानी किताबें निकालीं।

एक किताब खोली।

पहले पन्ने पर उसका नाम लिखा था।

“सावित्री — भविष्य की डॉक्टर।”

वह कुछ देर उस नाम को देखती रही।

फिर उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

“क्या मैं सच में डॉक्टर बन पाऊँगी?”

उसी समय बाहर से सुमित की आवाज आई—

“भाभी!”

सावित्री ने किताब बंद कर दी।

“आ गए?”

सुमित अंदर आया।

उसके चेहरे पर थकान थी।

सावित्री ने पूछा—

“नौकरी मिली?”

सुमित मुस्कुराया।

“हाँ।”

“कहाँ?”

“एक गोदाम में।”

“तनख्वाह?”

सुमित ने रकम बताई।

सावित्री चुप हो गई।

उसे पता था कि इतनी कम रकम में घर चलाना आसान नहीं होगा।

सुमित ने कहा—

“चिंता मत कीजिए।”

“मैं चिंता नहीं करूँगी तो कौन करेगा?”

दोनों हल्का-सा मुस्कुरा दिए।

---

पहला खाना

उस रात घर में खाने के लिए केवल थोड़े-से चावल थे।

सावित्री ने खिचड़ी बना ली।

दोनों एक ही थाली में खाने बैठे।

सुमित ने पहला निवाला उठाया और कहा—

“बहुत स्वादिष्ट है।”

सावित्री हँस पड़ी।

“झूठ बोल रहे हो।”

“सच में।”

“इसमें तो नमक भी कम है।”

सुमित ने कहा—

“तो क्या हुआ? मेहनत का स्वाद ज्यादा है।”

दोनों हँस पड़े।

कई दिनों बाद सावित्री के चेहरे पर मुस्कान आई थी।

लेकिन वह मुस्कान ज्यादा देर नहीं रही।

---

अचानक दर्द

रात में सावित्री को अचानक पेट में तेज दर्द महसूस हुआ।

उसने अपना पेट पकड़ लिया।

“सुमित...”

सुमित तुरंत उठ गया।

“क्या हुआ?”

“पता नहीं... बहुत दर्द हो रहा है।”

सुमित घबरा गया।

“भाभी, अस्पताल चलते हैं।”

उसने तुरंत बाहर जाकर पड़ोसी से मदद माँगी।

एक ऑटो की व्यवस्था हुई।

सुमित सावित्री को लेकर अस्पताल की ओर दौड़ा।

उसके मन में केवल एक डर था—

“मेरे भाई की आखिरी निशानी को कुछ नहीं होना चाहिए।”

अस्पताल पहुँचते ही डॉक्टर ने सावित्री को अंदर ले लिया।

सुमित बाहर खड़ा होकर लगातार प्रार्थना करने लगा।

कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए।

सुमित दौड़कर उनके पास गया।

“डॉक्टर साहब, भाभी कैसी हैं?”

डॉक्टर ने कहा—

“अभी चिंता की बात नहीं है। लेकिन उन्हें आराम और नियमित जाँच की जरूरत है।”

सुमित ने राहत की साँस ली।

“मैं ध्यान रखूँगा।”

डॉक्टर ने कहा—

“उन्हें तनाव से भी बचाइए।”

सुमित ने सावित्री की ओर देखा।

उसे याद आया कि पिछले कुछ दिनों में उसने कितना कुछ सहा था।

उसने मन ही मन फैसला किया—

“अब भाभी को किसी भी हालत में अकेला महसूस नहीं होने दूँगा।”

---

अगली सुबह

सुबह सुमित काम पर जाने के लिए तैयार हो रहा था।

सावित्री ने उसे रोककर कहा—

“सुमित।”

“जी?”

“मेरी पढ़ाई के बारे में मैंने सोचा है।”

सुमित मुस्कुराया।

“क्या?”

“मैं पढ़ाई फिर से शुरू करना चाहती हूँ।”

सुमित ने बिना देर किए कहा—

“तो फिर शुरू कीजिए।”

सावित्री ने कहा—

“लेकिन किताबें, फीस, अस्पताल का खर्च...”

सुमित ने उसकी बात बीच में रोक दी।

“एक-एक करके सब होगा।”

“तुम इतना भरोसा कैसे करते हो?”

सुमित ने कहा—

“क्योंकि मुझे अपने भाई पर भरोसा था। और अब मुझे आप पर भरोसा है।”

सावित्री की आँखें नम हो गईं।

उसने किताब अपने हाथ में ली।

और उसी दिन से उसकी जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हुआ।

लेकिन दूसरी तरफ...

सुमित जिस गोदाम में काम करने जा रहा था, वहाँ उसका सामना ऐसे व्यक्ति से होने वाला था जो आगे चलकर उसकी जिंदगी बदल देगा।

और उसी दिन उसे पता चलने वाला था कि सिर्फ नौकरी करना काफी नहीं होगा—उसे अपनी भाभी की पढ़ाई के लिए बहुत बड़ा फैसला लेना पड़ेगा।

जारी रहेगा...

अगला एपिसोड:

Episode 5 — “भाभी की किताबें और सुमित का पहला बलिदान

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मेरी भाभी नहीं, मेरी माँ

Episode 5: भाभी की किताबें और सुमित का पहला बलिदान

सुबह के करीब छह बज रहे थे।

सूरज की हल्की रोशनी छोटे-से घर की खिड़की से अंदर आ रही थी।

सावित्री जमीन पर बैठी अपनी पुरानी मेडिकल की किताबें खोलकर पढ़ रही थी।

किताबें पुरानी थीं, कुछ पन्ने फटे हुए थे, लेकिन उसकी आँखों में एक नई चमक थी।

कई महीनों बाद उसने फिर अपने सपने को हाथ में पकड़ा था।

वह किताब के एक पन्ने पर लिखे शब्दों को ध्यान से पढ़ रही थी।

तभी दरवाजे के पास सुमित दिखाई दिया।

उसने मुस्कुराकर पूछा—

“भाभी, सुबह-सुबह पढ़ाई शुरू?”

सावित्री ने किताब बंद नहीं की।

“हाँ। अगर डॉक्टर बनना है तो मेहनत करनी पड़ेगी।”

सुमित ने कहा—

“यही तो मैं सुनना चाहता था।”

सावित्री मुस्कुराई।

“लेकिन एक समस्या है।”

“क्या?”

“मेरी सारी किताबें पुरानी हैं। बहुत-सी जरूरी किताबें मेरे पास हैं ही नहीं।”

सुमित ने सहजता से कहा—

“तो नई किताबें ले आएँगे।”

सावित्री ने तुरंत कहा—

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि अभी घर चलाना जरूरी है।”

सुमित ने जवाब नहीं दिया।

वह जानता था कि बात सिर्फ किताबों की नहीं थी।

सावित्री के डॉक्टर बनने के रास्ते में फीस, किताबें, परीक्षा और आगे की पढ़ाई—सब कुछ था।

और उसकी अपनी नौकरी की कमाई बहुत कम थी।

---

गोदाम की नौकरी

सुमित जल्दी से तैयार होकर काम पर निकल गया।

जिस गोदाम में वह काम करता था, वहाँ दिनभर सामान उठाना, गिनना और व्यवस्थित करना पड़ता था।

काम कठिन था।

लेकिन सुमित शिकायत नहीं करता था।

गोदाम का मालिक विनोद नाम का एक मध्यम उम्र का आदमी था।

विनोद ने सुमित को काम करते हुए देखा और कहा—

“तुम बहुत मेहनती लड़के हो।”

सुमित ने कहा—

“काम मिला है तो मेहनत तो करनी ही है।”

विनोद ने पूछा—

“घर में कौन-कौन है?”

सुमित कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

“मैं और मेरी भाभी।”

“माता-पिता?”

“नहीं।”

विनोद ने ज्यादा सवाल नहीं किया।

लेकिन उसने महसूस किया कि सुमित अपने बारे में ज्यादा बात नहीं करना चाहता।

---

पहली तनख्वाह

एक महीने की मेहनत के बाद सुमित को पहली तनख्वाह मिली।

उसने पैसे हाथ में लिए तो कुछ पल उन्हें देखता रहा।

उसके मन में कई जरूरतें थीं।

घर का किराया।

राशन।

दवाइयाँ।

और सावित्री की पढ़ाई।

वह बाजार गया।

उसने राशन खरीदा।

दवाइयाँ खरीदीं।

फिर एक मेडिकल स्टोर के सामने रुक गया।

दुकान के बाहर मेडिकल की किताबों का एक छोटा-सा स्टॉल लगा था।

सुमित ने किताबों को देखा।

उसने दुकानदार से पूछा—

“यह किताब कितने की है?”

दुकानदार ने कीमत बताई।

सुमित ने जेब में रखे पैसे गिने।

किताब खरीदने के बाद उसके पास घर के बाकी खर्च के लिए बहुत कम पैसे बचते।

वह कुछ देर सोचता रहा।

फिर उसने किताब खरीद ली।

---

घर वापसी

शाम को सुमित घर पहुँचा।

सावित्री ने पूछा—

“आज बहुत देर हो गई?”

“काम ज्यादा था।”

सुमित ने बैग आगे बढ़ाया।

“यह आपके लिए।”

सावित्री ने बैग खोला।

अंदर नई मेडिकल की किताब थी।

उसकी आँखें भर आईं।

“सुमित... यह कितने की है?”

“उसकी कीमत मत पूछिए।”

“लेकिन पैसे?”

“मैंने संभाल लिया।”

सावित्री समझ गई कि बात इतनी आसान नहीं थी।

उसने किताब वापस करने की कोशिश की।

“इसे वापस कर दो।”

सुमित ने किताब उसके हाथ में वापस रख दी।

“नहीं।”

“सुमित...”

“भाभी, जब आपने कहा था कि डॉक्टर बनना चाहती हैं, तभी मैंने फैसला कर लिया था।”

“लेकिन घर का खर्च?”

“मैं संभाल लूँगा।”

“अगर पैसे कम पड़ गए तो?”

सुमित मुस्कुराया।

“तो मैं थोड़ा और काम करूँगा।”

सावित्री ने कहा—

“तुम अपनी सेहत खराब कर लोगे।”

सुमित ने हँसते हुए कहा—

“आप डॉक्टर बन जाएँगी तो मेरी सेहत भी ठीक कर देंगी।”

सावित्री हँस पड़ी।

---

पहला बलिदान

अगले दिन सुमित के पास घर का किराया देने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे।

मकान मालिक दरवाजे पर आया।

“सुमित, किराया कब दोगे?”

सुमित ने कहा—

“दो दिन का समय दे दीजिए।”

मकान मालिक ने पूछा—

“पैसे कहाँ गए?”

सुमित ने चुपचाप सावित्री की किताबों की तरफ देखा।

मकान मालिक समझ गया कि उसने कुछ खर्च किया है।

“ठीक है। दो दिन में दे देना।”

मकान मालिक चला गया।

सुमित अंदर आया।

सावित्री ने सब सुन लिया था।

उसने कहा—

“तुमने किराया रोककर मेरी किताब खरीदी?”

सुमित चुप रहा।

सावित्री की आँखों में आँसू आ गए।

“तुम ऐसा क्यों करते हो?”

सुमित ने कहा—

“क्योंकि यह सिर्फ आपकी किताब नहीं है।”

“तो?”

“यह हमारे भविष्य की किताब है।”

---

सावित्री का संकल्प

उस रात सावित्री देर तक पढ़ती रही।

सुमित सो चुका था।

सावित्री ने किताब बंद की और सुमित की ओर देखा।

वह थककर सो रहा था।

उसने धीरे से कहा—

“मैं तुम्हारी मेहनत बेकार नहीं जाने दूँगी।”

उसने मन ही मन प्रण लिया—

“मैं डॉक्टर बनूँगी। चाहे मुझे कितनी भी कठिनाई क्यों न सहनी पड़े।”

---

एक नया रास्ता

कुछ दिनों बाद सावित्री को पता चला कि मेडिकल की पढ़ाई के लिए उसे एक प्रवेश परीक्षा देनी होगी।

उसने फॉर्म देखा।

फीस देखकर वह परेशान हो गई।

उसने कागज सुमित के सामने रख दिया।

“इतने पैसे चाहिए।”

सुमित ने रकम देखी।

वह चुप हो गया।

यह रकम उसकी कई महीनों की बचत के बराबर थी।

सावित्री ने कहा—

“कोई बात नहीं। अभी नहीं तो बाद में।”

सुमित ने पूछा—

“फॉर्म जमा करने की आखिरी तारीख कब है?”

“सिर्फ दस दिन।”

सुमित ने कागज उठा लिया।

“फॉर्म भरेगा।”

“लेकिन पैसे?”

“मैं लाऊँगा।”

“कहाँ से?”

सुमित ने कहा—

“यह मेरी समस्या है।”

सावित्री ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं। तुम्हारी जिंदगी बर्बाद करके मैं डॉक्टर नहीं बनना चाहती।”

सुमित ने उसकी आँखों में देखकर कहा—

“आपकी जिंदगी बचाने के लिए नहीं, आपका सपना बचाने के लिए मेहनत कर रहा हूँ।”

सावित्री कुछ बोल नहीं पाई।

---

रात का फैसला

उस रात सुमित बहुत देर तक जागता रहा।

उसने कागज पर अपनी कमाई और खर्च का हिसाब लगाया।

पैसे कम थे।

बहुत कम।

अचानक उसे एक विचार आया।

वह सुबह विनोद के पास गया।

“मालिक, क्या मैं सुबह की शिफ्ट के बाद रात में भी काम कर सकता हूँ?”

विनोद ने हैरानी से पूछा—

“तुम रात में भी?”

“हाँ।”

“इतना काम क्यों करना चाहते हो?”

सुमित ने कहा—

“मेरी भाभी पढ़ाई कर रही हैं।”

विनोद ने पूछा—

“तुम्हारी भाभी?”

“हाँ।”

“उनके लिए इतना?”

सुमित ने मुस्कुराकर कहा—

“वह मेरे भाई की पत्नी हैं। मेरे लिए माँ जैसी हैं।”

विनोद कुछ पल उसे देखता रहा।

फिर बोला—

“ठीक है। रात की शिफ्ट भी कर लेना।”

सुमित ने राहत की साँस ली।

लेकिन उसे नहीं पता था कि लगातार दिन-रात काम करने की कीमत उसकी सेहत को चुकानी पड़ेगी।

---

उसी रात...

सुमित घर लौटा तो बहुत थका हुआ था।

सावित्री पढ़ रही थी।

उसने पूछा—

“आज बहुत थके हुए लग रहे हो।”

सुमित ने मुस्कुराकर कहा—

“कुछ नहीं।”

वह बैठा ही था कि अचानक उसके सिर में तेज चक्कर आया।

उसने दीवार का सहारा लिया।

सावित्री घबरा गई।

“सुमित!”

सुमित ने खुद को संभाल लिया।

“मैं ठीक हूँ।”

लेकिन सावित्री ने उसकी आँखों में कमजोरी देख ली थी।

उसने गंभीर आवाज में कहा—

“तुम्हें डॉक्टर के पास जाना होगा।”

सुमित हँसते हुए बोला—

“अभी डॉक्टर कहाँ है?”

सावित्री ने उसकी ओर देखा।

फिर अपनी मेडिकल की किताब उठाई।

“बहुत जल्दी होगी।”

दोनों मुस्कुरा दिए।

लेकिन उस मुस्कान के पीछे आने वाले दिनों का एक बड़ा संघर्ष छिपा था।

क्योंकि सावित्री के प्रवेश परीक्षा के फॉर्म की आखिरी तारीख अब केवल तीन दिन दूर थी...

और सुमित के पास अभी भी पूरी फीस नहीं थी।

जारी रहेगा...

अगला एपिसोड:

Episode 6 — “तीन दिन, एक सपना और सुमित की सबसे बड़ी परीक्षा

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