मैं एक प्राइमरी अध्यापिका हूं l मैं दिल्ली में रहती हूंl शुरू से ही पढ़ने, पढ़ाने में मेरी रूचि रही है l अपने मन के भावों को कविता, कहानी का रूप देने का यह मेरा छोटा सा प्रयास हैl आप सभी मेरी रचनाओं को पढ़ मेरा मार्गदर्शन करें, जिससे मेरी लेखनी को सही दिशा मिल सकेl

घड़ी घड़ी आगे बढ़ रही जिंदगी
घड़ी घड़ी देखो रंग बदलते लोग
यहां एक घड़ी का नहीं पता फिर
क्यों लोभी बन कर रहा तू दौड़
दो घड़ी चैन से बैठ अपनों संग
यही घड़ियां जीवन की है अनमोल।

-Saroj Prajapati

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लोगों ने असंभव असंभव कह खूब हमारा मनोबल गिराया
हमने भी अपनी जिद और लगन से असंभव को संभव कर दिखाया।

-Saroj Prajapati

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जिस प्रकार एक नाव अपने माझी पर विश्वास कर
तूफानों से लड़ते हुए मंजिल पर पहुंच ही जाती है
उसी प्रकार मनुष्य अपनी मेहनत,लगन और चुनौतियों से लडने के जुनून के दम पर अपना लक्ष्य जरूर हासिल करता है।

-Saroj Prajapati

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वो खुले आंगन और वो लंबी चौड़ी सी छते कहां
लोगों के दिलों में अब वो पहले सी जगह कहां
खुद में ही हो गए लोग मशरूफ कुछ इस कदर
कि अपनों से ही मिलने की अब उन्हें फुर्सत कहां !!

-Saroj Prajapati

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वक्त पर छोड़ दो कुछ समस्याओं के हल
क्योंकि वक्त से बढ़कर नहीं कोई मरहम।।

-Saroj Prajapati

आधुनिकता की चकाचौंध ने कर्ज को दे लोन का रूप
सस्ती ब्याज दरों का ऐसा मायाजाल बिछाया
दिखावे की अंधी दौड़ में बिन सोचे समझे सबने खूब लोन उठाया
किस्त भरने की जब आई बारी, बढता ब्याज देख फिर सिर चकराया
बड़े बूढ़े सयाने सही कह गए भइया, दिखावे से बड़ी नहीं कोई बीमारी
एक बार जो लग जाए तो कर्जे ब्याज भरने में बीत जाती ये जिंदगानी।।

-Saroj Prajapati

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तेरे प्रेम की नाव के सहारे हर तूफानों से लड जाऊंगी
बस तुम थामकर रखना विश्वास की पतवार।।

-Saroj Prajapati

झूठ के पंखों का सहारा ले जो भरते परवाज
बन हंसी का पात्र , जमीं पर ओंधे मुंह गिरते तत्काल।।

-Saroj Prajapati

समझते थे जिन्हें हम अपने बहुत करीब
करते थे जिन पर हम खुद से ज्यादा यकीन
जरूरत की आंधियों में उन्हें दूर खड़े पाया
देर से ही सही करीबियों का सच समझ आया।।

-Saroj Prajapati

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मेरे प्यार की नहीं सीमा कोई
जैसे समुद्र की नहीं थाह कोई।
दिल की गहराइयों से है चाहा तुझे
ना लगा मेरे इश्क पर तू इल्जाम कोई।
बिना शर्त हार गए दिल तुझ पर
ना समझ इसे सौदेबाजी का खेल कोई।
तेरे इश्क के सजदे में हम झुकते हैं
बिन गुनाह झुकना है आसान कोई।
तेरी रुसवाइयों को हंस हंसकर सहते
कहीं और मिलेगा मुझसा महबूब कोई।
वो प्यार ही क्या जो सीमा में बांधा जाए
फूलों की खुशबू को सीमाओं में बांध पाया है कोई!!

-Saroj Prajapati

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