सौरभ दीक्षित "मानस", उपन्यास "घाट-84, रिश्तों का पोस्टमार्टम"

अक्सर दूसरों की नजर में अच्छा बनने के चक्कर में हम खुद की नजर में बुरे हो जाते हैं...#मानस

-saurabh dixit manas

ऊँची चौखट सर माथे पर,
ऐसी फ़ितरत लोगों की....
साथ चले जो उसको ठोकर,
ऐसी फ़ितरत लोगों की...#मानस

-saurabh dixit manas

ऊँची चौखट सर माथे पर
ऐसी फ़ितरत लोगों की....

-saurabh dixit manas

ज़माने भर की तकलीफें मुहब्बत यार देती है।

किसे रखती यहाँ जिंदा सभी को मार देती है।।

-saurabh dixit manas

वक़्त बदलता जाता है शायद ये मालूम नहीं।
वक़्त बदलता जायेगा, शायद ये मालूम नहीं।।
आज मुझे तुम ठुकराते हो, मेरे इन हालातों से,
वक़्त मेरा भी आयेगा शायद ये मालूम नहीं...

-saurabh dixit manas

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बिन आवाज टूटकर बिखर जाता है।
ये वक़्त है साहब, यूँ गुज़र जाता है.....#मानस

-saurabh dixit manas

जिंदगी में मेरे नाम कुछ भी नहीं एक दिल था वो भी अब तुम्हारा हुआ।

लोग कहने लगे जो था कल सही आज लड़का ये पागल आवारा हुआ।।

-saurabh dixit manas

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क्या तुम्हें मिलती खुशी है यार हमको ही जलाकर?
तुम कभी देखो ज़रा ये तीर खुद पर भी चलाकर....

-saurabh dixit manas

किस्से कहानी या कभी क़िरदार मांगेंगे।
साथ रहकर भी तुम्हारी हार मांगेंगे।।
सीख लो मानस चलन तुम भी ज़माने के,
ज़ख़्म देंगे जो वही फिर प्यार मांगेंगे।।

-saurabh dixit manas

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सूख जाते हैं किनारों में अटककर अश्क़ भी,
लोग कहते, मैं मुहब्बत में कभी रोया नहीं....#मानस

-saurabh dixit manas