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मैं एक नदी की तरह बिना सोचे समझे बस बहती जा रही थी क्योंकि, मुझे जाना था उस एक समंदर में समाना था । कितने पत्थरों से टकराई चोट खाई पर अपने आप को रोक न पाई। कितने कांटे उलझे मेरे दामन में पर मेरा मन था बस उस एक समंदर में समाने में। जाने कब एक झरना मुझ में समा गया मेरी धारा को अविरल बना गया। कुछ पुष्प मेरे आंचल में समा गये मेरी धारा की खूबसूरती को बड़ा गये। पर मैंने किसी पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि मुझे जाना था उस समंदर में मिलना था समाना था। मैंने सबको नजर अंदाज किया अपने आप को भी। फिर 'वो' क्यों ना करता मुझे नजरअंदाज। मैं फिर भी उससे मिली और अस्तित्वहीन हो गई, 'वो' समंदर था गहरा था उसमें दूसरी नदी का बसेरा था। - Soni shakya
सब आते जाते रहे मेरी कहानी में, एक तू ही था जो हर पन्ने पर ठहरा रहा..! - Soni shakya
कुछ रिश्ते किताबें जैसे होते हैं, हर पन्ने पर सिर्फ एहसास मिलते है..!!🍁 - Soni shakya
ये मोहब्बत भी बड़ी अजीब होती है.. ना पुरी हो सकी ना खत्म होती है.. - Soni shakya
इश्क में हम भी बहुत अमीर थे कभी..! उसकी मजबूरियों ने खाली कर दिया..!! 🥀🥀 - Soni shakya
जब बातें थीं तो समय नहीं था-- तुम्हारे पास ..! अब खामोशी है तो-- शिकायत क्यों.? - Soni shakya
सिर्फ दर्द होता तो, नहीं हारती मैं..! तेरी दुरी ने, मार दिया मुझे..!! - Soni shakya
कैसे कह दूं कि- भुला दिया है तुझको.. कि- तेरी आवाज अब नहीं गूंजती मेरे कानों मे.. कि- हवा का हल्का सा झोंका तेरा एहसास नहीं करता.. कि तेरे साथ गुजारा हुआ पल अब याद नहीं आता.. कि भरी भीड़ में तेरी यादें मुझे तन्हा नहीं कर जाती.. कि रातों को तेरा ख्याल सोने नहीं देता.. ये दिल के रिश्ते बड़े बेरहम होते हैं साहब, दिल में ही रहते हैं ता उम्र तड़पाने को..!! - Soni shakya
हां ! इतनी शिद्दत से चाहा है उसे कि.. वफ़ा भी मुकर गई बेवफाई करने से..!! - Soni shakya
हां ! रूठना मेरी आदत थी और, मानना तुम्हारा फर्ज..! जाओ अब रहो सुकून से, आजाद किया मैंने तुम्हें तुम्हारे फर्ज से..!! - Soni shakya
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