आओ सहृदय जननी राष्ट्रभाषा हिन्दी का सम्मान करें

ओपीजेएस यूनिवर्सिटी चूरू में हिंदी जुड़वाँ की लिखे महाकाव्य "मैं हिंदी हूँ" का सम्मान🙏

किसी को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता किंतु जब कोई अधिक बुद्धिमान बनने का दिखावा करता है तो वह स्वयं ही लपेटे में आ जाता है...,





- हिन्दी जुड़वाँ

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खीर (लघुकथा)
देवीप्रसाद की उम्र पचहत्तर साल के आसपास थी।उस उम्र में कुछ न कुछ खाने की इच्छा जाग उठती परन्तु कभी न साथ देने वाली चिड़चिड़े स्वभाव की उनकी पत्नी मानवी जिसे अपनी महिला मंडली से सारे दिन फुर्सत नहीं मिलती थी वह मास्टरजी को अक्सर टोक दिया करती। नववधुओं का वृद्धजनों से कोई मोह नहीं था‌। उनके पुत्र अपने अपने काम में व्यस्त थे। एक दिन उसकी सखी रचु ने खीर खाने की मांग की। मानवी अपने पति को तिरछी निगाहों से देखते हुए खीर बनाने लगी। घर में सभी महिला मंडली आमन्त्रित हुई । उन्होने स्वादिष्ट पकवान को सराहा। उनके जाने के बाद थोड़ी खीर बच चुकी थी, मानवी बची हुई खीर अपने पति को दे कर आ गयी। मास्टरजी ने ईश्वर का धन्यवाद करते हुए खीर को चख कर छोड़ दिया क्योंकि गला दुःख के भावों से भर गया, वे खीर खा ही नहीं पाए। अपनी पत्नी के कुंठित स्वाभाव से जीवन भर की सामाजिक पीड़ा का अनुभव करते हुए अखबार पढ़ने लगे।

-हेतराम भार्गव हिन्दी जुड़वाँ

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किंचित विचार
विवाहोत्सव हेतु पीले चावल की प्रथा पूर्णं होते ही लड़की के मामा ने चिंरजीवी को घूर कर कहा, हमारी बेटी घर के आलतू- फालतू कोई काम नहीं करेंगी, नौकरी नहीं करेगी। शब्दों की कड़वाहट के कारण वो दिन बड़ी उधेड़बुन के साथ बीते ,विवाहोत्सव का समय आया। समस्त मंगलकामनाओं सहित विवाह पूर्णं हुआ। पति-पत्नी का सामंजस्य भाव परिवार के लिए समृद्धि कारक बना। परिवार को प्रगतिशील बनाने के लिए दोनों का श्रम आवश्यक था । इस पर गहन विचार किया गया। नववधू सिलाई का कार्य करना जानती थी और वह स्वयं इच्छुक थी। उसके लिए एक दिन सिलाई मशीन खरीद कर घर लाते हुए रास्ते में वहीं वधू के मामा मिल गये । उन्होंने उसी समय फिर घूरकर कहा, हमारी बेटी आपके घर कमाई करने नहीं भेजी कि तुम सिलाई करवाओ, यह सुनकर चिंरजीवी उसी समय मुड़कर मशीन वापिस दे आया और किंचित विचार करते हुए, अपने भाग्य को कोसते हुए देर रात्रि तक चिंरजीवी घर पहुँचा।

-हेतराम भार्गव हिन्दी जुड़वाँ

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ईर्ष्या और द्वैष
करने वाले कोढ़
ग्रस्त होतें हैं,
वे दूसरों पर
मंथन करते करते
अपने जीवन को
नरक बना लेते हैं।

हिंदी जुड़वाँ

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अन्तस्थ रखो विचारों को, गहन करो चिंतन।
समर्पण सहृदय सद्भावना, बसे मन ही मन।।

हिन्दी जुड़वाँ

कई बार ज़िन्दगी गलत धागे चुन लेती है,
इंसान थक जाता है गाँठें लगा लगा कर!

हिंदी जुड़वाँ

थक चुका हूँ , गाँठें लगा लगा कर मैं,
बहुत कमजोर ,मेरे जीवन की डोर है ?




हिंदी जुड़वाँ

यदि आप अब 6 घंटे नहीं पढ़ सकते तो आने वाले कल में 12 घंटे तक मजदूरी करने के लिए अपने आपको तैयार रखें।

हिंदी जुड़वाँ

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प्रश्न -सैल्फी क्या है ?
उत्तर:अकेलेपन की वह अनुभूति जो अहसास कराए कि तुम्हारे साथ कोई नहीं है।



-हिन्दी जुड़वाँ

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