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मत कहो हमें रटने वाले, हम नया पैगाम रचते हैं। काँटों से गुज़रकर हम तो, फूलों की महक बिखेरते हैं। धूप-छाँव को महसूस कर, शब्दों को रंगों में उतारते हैं, हम फसल की तरह उगते हैं। कोई न समझे तो टूट जाते हैं, काँटों और फूलों में हमें फर्क नहीं दिखता, हम काँटों को भी फूल समझते हैं।" - Std Maurya
"नया साल है, अब नया मोड़ लाएंगे हम, जो बीते साल के आखिरी दिन भूल गए हमें, वादा है, नए साल में उन्हें याद भी नहीं करेंगे हम।" - Std Maurya
"नया साल है, अब नया मोड़ लाएंगे हम, जो बीते साल के आखिरी दिन भूल गए हमें, वादा है, नए साल में उन्हें याद भी नहीं करेंगे हम।"
जो तुम सोचते हो,वही तुम करों।
#stdmaurya
मुझे शर्म आती है यह कहकर, पढ़-लिखकर भी तुम फ़क़ीर नेता चुनते हो, और देश की तरक़्क़ी की उम्मीद करते हो।
मेरा देश आज़ाद है — यह जानता हूँ, मगर मेरे देश के युवा मानसिक गुलाम हैं — यह भी जानता हूँ। और जिस देश के युवा मानसिक गुलाम हों, उस देश का तरक़्क़ी करना असंभव है।
"मैं देख शर्मिंदा हूँ, अश्लीलता फैलाने वाले देश संभालने को आ रहे हैं, किन्तु पढ़े-लिखे लोग दर-दर भटक रहे हैं।" -एसटीडी
फूल तो फूल होता है, टूट कर भी उसमे महक होता है. मगर उसे कोई समझता नहीं। इस लिए उस में गम का मुस्कान होता हैं.. -एसटीडी
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