कर्म से अध्यापिका ,हृदय से लेखिका व्यस्त दिनचर्या से लिखने-पढ़ने के लिए समय चुराकर सृजन विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में (कविता, कहानी-उपन्यास , दोहे - मुक्तक,निबंधों का नियमित प्रकाशन-काव्य संग्रह - वर्तिका तथा कहानी संग्रह-जोग लिखी प्रकाशित)

सुप्रभात
अंगड़ाई सूरज ने ली,
कर खोल रहा धीरे-धीरे।
चली यामिनी वसन समेटे,
खग कलरव करते यमुना तीरे।।
सुनीता बिश्नोलिया

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साँस-साँस की आस में, मन-मानस हो पास।
दूरी से कड़ियाँ जुड़े, सब अपने सब खास।।
सुनीता बिश्नोलिया

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झूठा अंजन डाल कर ,मत कर आँखें बंद।
सत्य साथ देगा सदा,झूठ रहे दिन चंद।।
सुनीता बिश्नोलिया

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Sunita Bishnolia लिखित उपन्यास "जुड़ी रहूँ जड़ों से" मातृभारती पर फ़्री में पढ़ें
https://www.matrubharti.com/novels/36804/judi-rahu-jadon-se-by-sunita-bishnolia

#विश्व_हिंदी_दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
सरस शब्द ही जान है, इनसे है पहचान।
हिंदी की गाथा सकल, गाता सदा जहान।
नव सृजन, नव गीत और, दोहा, रोला,छंद
रस की गागर अंक भर,गाती मीठे गान।।
सुनीता बिश्नोलिया

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शुभरात्रि 🌼🌼🌼
ठिठुर रही दोपहर भी,संध्या है बेहाल।
सर्दी से छिपता फिरे,भूला सूरज चाल।।
कहानी "नफरत का चाबुक प्रेम की पोशाक - 2" मातृभारती पर फ़्री में पढ़ें
https://www.matrubharti.com/book/19937157/nafrat-ka-chabuk-prem-ki-poshak-2

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कह रही हूँ मैं कि कहना आ गया है
बिन किए वादे निभाना आ गया है,
बोझ लेकर अपने दिल पे हँसते हैं हम
बोझ हमको भी उठाना आ गया है।।
सुनीता बिश्नोलिया

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सावित्रीबाई फुले जयंती पर शत-शत नमन! 🙏🙏🙏

महिला शिक्षा की अलख जगाने वाली, नारी सशक्तिकरण एवं नारी मुक्ति आंदोलन की प्रणेता,महान समाज-सुधारिका तथा देश की प्रथम महिला शिक्षिका, कवयित्री, शिक्षा और समानता की प्रबल समर्थक सावित्रीबाई फुले की जयंती पर शत्-शत् नमन!

अंधियारे की रात कठिन
घनघोर घटाएँ अंबर पर
कैसे ढले रात ये काली
भारी चिंता मस्तक पर।

सोच उसकी बड़ी थी
ज्योति मन में जली थी
अंधेरी रात में उसको
लानी खुद ही दिवाली थी
ढलेगी रात ये काली,
छँटेगा ये अंधेरा
खुद पे इतना भरोसा था
लाई वो खुद सवेरा।

बहुत मंज़िल कठिन थी
मगर वो भी अटल थी
अशिक्षा के सघन तम में
जोत उसको जलानी थी
मन का डर छोड़कर पीछे
कलम का ले सहारा
बनी वो शिक्षिका करके
रुढियों से किनारा।

भेद ना देख सकती थी
सभी को सम समझती थी
मिटाने भेद मध्य का
वो आगे बढ़ गई थी।
दुखी बीमार की माँ बन
देती सबको सहारा
खुद पे इतना भरोसा था
लाई वो खुद सवेरा।
नारी शिक्षा के सूरज को
धरती पर उतारा।।
सुनीता बिश्नोलिया

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🌼🌼सुप्रभात 🌼🌼🙏
चल रही शीत की सरगम बड़ा मौसम सुहाना है
उड़ रहे भोर के पंछी गगन से मिलने जाना है
छोड़ो आलस उठो साथी बांहें फैलाए रवि आया
पड़े हैं ओस के मोती इसे उनको उठाना है।
सुनीता बिश्नोलिया

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कल जयपुर से चंडीगढ़ की यात्रा के बीच बिहारी का ये दोहा याद आ गया.....
चमचमात चंचल नयन बिच घूँघट-पट झीन।
मानहु सुरसरिता-विमल-जल उछरत जुग मीन॥
मेरे सामने वाली बर्थ पर चंचल सी लड़की और शर्मीला सा लड़का। शायद नई-नई शादी हुई थी और दोनों कहीं घूमने जा रहे थे। लड़की थोड़ी लापरवाह सी थी उसकी चंचल-चपल नज़रें चारों तरफ घूम रही थी। लड़का और लड़की कभी मोबाइल देखने लगते तो कभी एक दूसरे को। लड़का कभी बिस्किट तो कभी चाॅकलेट अपने बैग से निकालकर लड़की को देता तो प्रतिउत्तर में लड़की मुस्कुराती हुई उन्हें खाने लगती।
कभी लड़की को हाथ में पहना चूड़ा नहीं सुहाता तो कभी लाल रंग का सिल्क वाला सूट। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी इसलिए सूट पर लोंग कोट पहना था शायद सूट की चुन्नी उसे बहुत परेशान कर रही थी इसलिए उसने चुन्नी उतार कर लड़के की गोद में रख दी । लड़के ने चुपचाप चुन्नी समेटकर अपने बैग में रख रख ली।
कुछ देर बाद लड़के ने अपने बैग से टिफिन निकालकर लड़की को खाने के लिए कहा।
लड़की उस लड़के के आगे इस तरह बैठ गई जैसे वो उसे खाना खिलाए। लड़के ने उसे एक-दो कोर खिलाए ही थे कि अचानक उसकी नजर सहयात्रियों पर पड़ी जो शायद उन्हें ही देख रहे थे।
लड़के के हाथ रुक गए तो बेपरवाही से लड़की खुद खाना खाने लगी और लड़का बस उसे चुपचाप खाना खाते देखता रहा।
खाना खाकर लड़की ने कहा खाना किसने बनाया..? तो लड़के ने जवाब दिया - " भाभी ने।"
" तुम्हारी भाभी तो बहुत अच्छा खाना बनाती है..! तुम भी खालो टिफिन में और खाना रखा है। "
लड़की की बात सुनकर लड़का बड़ा खुश
हुआ। उसने कहा - "मुझे अभी भूख नहीं, चलो तुम सो जाओ।"
ये सुनकर लड़की मुस्कराते हुए बोली -
"ठीक है मैं सो जाती हूँ.. पर तुम खाना जरूर खा लेना। "
कहते हुए लड़की अपने हाथ में पहना चूड़ा उतारने लगी तो लड़के ने उसका हाथ पकड़ लिया। लड़की ने कहा -
"ये बहुत चुभ रहा है।"
लड़के ने कहा -" चूड़ा उतारते नहीं! जल्दी सो जाओ नींद आ जाएगी तो पता ही नहीं चलेगा।" आज्ञाकारी बच्चे की तरह लड़की ने लड़के की बात मान ली और बीच सो गई। लड़की को कंबल उढ़ाकर लड़का उठा और बीच वाली बर्थ पर सोने जाने लगा तो लड़की ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा - " यहीं बैठे रहो मुझे डर लगता है। "
" बुद्धू लड़की! "
कहते हुए लड़के ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया और बीच वाली बर्थ पर जाकर लेट गया तो लड़की उसे को फोन करके जोर से हँसने लगी।इस पर लड़के ने शर्माते हुए लड़की से सो जाने को प्रार्थना की।
मैं चुपचाप लेटी अधखुली आँखों से चंचल लड़की की शरारतें देखती रही।
सुनीता बिश्नोलिया

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