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JITENDER

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@sweetktlgmail.com1946


बरसात की वो नर्म सी रुत, तेरा मेरा साथ हो,
तेरे लबों पे मुस्कान हो, आँखों में मेरे जज़्बात हो।

तू तलती है जब इश्क़ में भीगे हुए पकौड़े,
मैं बनाता हूँ चाय, तेरे ख़्वाबों में थोड़े-थोड़े।

किचन में तेरी-क़दमों की सदा बजती है,
हर इक साजिश मोहब्बत की वहाँ रचती है।

तेरे हाथों की चटनी में जो लज़्ज़त होती है,
वो दिल को भी चख जाए, ऐसी रहमत होती है।

हम साथ हों, तो मौसम भी ग़ज़ल बन जाता है,
हर लम्हा इक नया ख़्वाब सा महक जाता है।

न दूनिया की परवाह, न कोई शिकवा रहे,
बस तू हो, मैं हो, और ये बारिशों का नशा रहे।

मुसाफ़िर जीत

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