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मेरे राज्य के लिए मेरे कान्हा जी के लिए।प्रेम प्रणाम जी
वैसे जिंदगी का हर एक पल बहुत कीमती है परम हर पल को किसी की बुराई करने में या एफआईआर किसी चीज को ना मिलाने के उसके गम में या हमारी इच्छा पूरी ना होने के गम में हम खोये रहते हैं।हम भूल जाते हैं जिंदगी जीने का मजा हर उसे पल में है जो हम परिवर्तन में जी रहे हैं हां तो चलता रहता है छोटी मोटी बड़ी बातें चलती रहती हैं।परिणीति दिल से लगाकर और उसमें खोए रहना इसे जिंदगी नहीं कहते।
happy friendship Day
आलम इकबाल मैं क्या खूब पंक्तियां लिखी है मतलब समझो तो समझ में आता है वरना तो लिखते तो हर कोई है
लोग पूछते हैं कि 'फैमिली मूवी नाइट' कब होनी चाहिए? हमारे घर में इसका जवाब थोड़ा हटके है! जब हमारे फोन का रिचार्ज खत्म हो जाता है, तब शुरू होती है हमारी असली Family Gathering! 🎬🍿 रिचार्ज खत्म होने से एक दिन पहले नई मूवीज़ डाउनलोड हो जाती हैं, और फिर अगले 3-4 दिन कोई फोन नहीं, कोई सोशल मीडिया नहीं... सिर्फ फैमिली, ढेर सारी बातें और एक साथ बैठकर मूवी देखना! ये हमारे पापा का बनाया हुआ एक खास रूल है। उनका मानना है कि जिंदगी में कभी-कभी डिजिटल दुनिया को साइड में रखकर अपनों के साथ रहना बहुत जरूरी है। यह सिर्फ पैसे बचाने की बात नहीं, बल्कि उस 'मज़े' और 'इंतजार' की बात है जो एक साथ आने पर मिलता है। पापा की इस सीख ने हमें सिखाया है कि असली रीकनेक्ट फोन रिचार्ज करने से नहीं, बल्कि अपनों के साथ टाइम स्पेंड करने से होता है। मुझे अपने घर की ये परंपरा बहुत पसंद है। क्या आपको लगता है कि हर घर में ऐसा एक 'No-Recharge/No-Phone' रूल होना चाहिए? 💭✨
वीर पुत्र अभिमन्यु धरती का वह वीर पुत्र था, रण का एक उजास था, अर्जुन का वह नन्हा सुपुत्र, पर साहस अतुल कपास था। नहीं डरा वह कभी काल से, न युद्ध की ललकारों से, अनजान था वह उस साजिश से, कपट भरे वादों से। छल का था ताना-बाना, साजिशों की बंदिशें जहाँ, पर डरा नहीं वह बाल-वीर, गूँजी उसकी हुंकार वहाँ। व्यूह चक्र का भेद दिया, जब बोला तीसरा पहर, बढ़ता गया वह निडर-अचल, बन शत्रुओं के सिर पर कहर। पीछे मुड़कर देखा उसने, कोई न दिखा अपना सज्जन, था अकेला वह निर्भय बालक, फिर भी अडिग रहा मन। रथ वालों को, घोड़े वालों को, एक-एक कर धूल चटाई, साहस के उस महा-समर में, शत्रुओं को हार दिखाई। देख पराक्रम उस बालक का, दुर्योधन तब घबराया, कपटी मन में अधर्म जगा, सातों महारथियों को बुलवाया। "लड़ो एक संग सारे मिलकर, मत छोड़ो इस पांडव को आज, प्रण लिया है मैंने रण में, इसका वध करना अनिवार्य आज!" गूँज उठी जब छल की बातें, सातों ने एक संग वार किया, अस्त्र-शस्त्र सब काट दिए, बालक पर न कोई दया किया। पर कहाँ हार मानने वाला था, वह वीर-श्रेष्ठ अभिमन्यु महान, जब टूटी ढाल और छूटे अस्त्र, तब जागा रण का नया मान। उखाड़ लिया रथ का ही पहिया, हवा में दिया घुमाए, सातों महारथी थर-थर काँपे, जब पहिया उसने तान उठाए। पर पीछे से कपट-वार कर, स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताया, छल से गिराया उस बालक को, पर वह बालक नहीं घबराया। अंतिम साँस, अंतिम कतरे तक, वह रणभूमि में डटा रहा, कौरव दल के हर अभिमानी का, झूठा मस्तक कटा रहा। कहना जाकर मेरे पिता से, उनका पुत्र बलवान था, लड़ा आपके मान की खातिर, जब तक प्राण में प्राण था!
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