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पता है, कभी-कभी मुझे लगता है कि हम आस्था और अंधविश्वास के बीच का जो बारीक सा धागा है, उसे अक्सर भूल जाते हैं। सोचो अगर हमारे सामने कोई छोटा बच्चा हो और वह मासूमियत से हमसे पूछे कि इन दोनों में क्या फर्क है, तो हम उसे कैसे समझाएंगे? हम उसे बस यही कहेंगे कि देखो बेटा, आस्था वह है जो तुम्हारे मन में एक सुंदर सा दीया जलाती है, जो तुम्हें किसी मुश्किल घड़ी में चुपके से आकर हिम्मत दे जाती है कि सब ठीक हो जाएगा। यह एक भरोसा है जो तुम्हें बेहतर इंसान बनाता है, तुम्हें अंदर से मजबूत करता है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ, अंधविश्वास किसी अंधेरे कमरे जैसा है, जहाँ हम बस डर के मारे कांपते रहते हैं, बिना ये जाने कि वहां है क्या। आस्था तुम्हें उड़ना सिखाती है, जबकि अंधविश्वास तुम्हें डराकर एक जगह थम जाने को कहता है। तो बस इतना याद रखना, अगर कोई बात तुम्हारे मन को शांति दे और तुम्हें निडर बनाए, तो समझ लेना वो तुम्हारी आस्था है, लेकिन अगर वही बात तुम्हारे दिल में डर भर दे और तुम्हें अपनी छोटी-छोटी खुशियों के लिए भी सोचने पर मजबूर कर दे, तो समझ लेना कि वो बस एक अंधविश्वास है, जिससे दूर रहना ही बेहतर है। जीवन में उस रोशनी को चुनना जो तुम्हें रास्ता दिखाए, न कि उस साये को जो तुम्हारे कदमों को रोक दे।
नहीं पता कितना आते होंगे , सवाल और सबसे पहला सवाल शायद कौन हो ? तुम क्या हो? तुम बहुत उलझते हो ।
सौ बार पढ़ी, सौ बार समझी, वो गुत्थी न सुलझा पाई, पर आज सुकून की एक लहर, कुछ गहरे राज़ ले आई। - Kajal Soam
"जलाल तो बस एक बार रस्सी खींचकर जान ले लेता है, लेकिन, तुम तो वह ज़ुल्म हो, जिसे सौ बार भी रस्सी खींचने पर सुकून नहीं मिलता।" - Kajal Soam
like people with out colour - Kajal Soam
एक संवाद, एक सबक (काजल): "किस चाँद का नूर हो तुम, यह बताओ कौन हो तुम?" (मेरी बहन): "चाँद तो बस एक का होता है, हज़ारों का नहीं। वह तो आसमान में रहता है, धरती पर नहीं। ज़रा बच के रहना दुनिया से, यह बड़ा बेखौफ माहौल है।" (काजल): "मैं चाँद नहीं, मैं तो तारा हूँ।" (मेरी बहन - टोंट मारते हुए): "रोशनी तो चाँद से होती है, तारों से नहीं; और मोहब्बत एक से होती है, हज़ारों से नहीं।" (काजल): "अगर ऐसा है, तो फिर मैं खुला आसमान हूँ और उस आसमान का बादल हूँ।" (मेरी बहन): "तो फिर उन बादलों के पीछे छुप मत जाना!" (काजल): "छुपेंगे नहीं, हम तो बारिश बनकर आएंगे।" (मेरी बहन): "देखना, कहीं नाली में मत बह जाना।" (काजल): "अगर नाली में बही, तब भी हम समुद्र में मिल जाएंगे। और फिर भाप बनकर, बादल बनकर आसमान में जलकाएंगे। (मेरी बहन - चेतावनी देते हुए): "आसमान के नीले रंग में खो मत जाना! जिस लाइन में तू है न, उसकी टीचर मैं हूँ, तो ज़रा संभल कर!" (काजल - मुस्कुराते हुए): "हम खोएंगे नहीं, बस तुम्हें अपना दीदार कराएंगे।" (मेरी बहन - फिक्र जताते हुए): "ठीक है, पर एक बात याद रखना... मौसम के बदलाव में तुम भी मत बदल जाना।" (काजल - शांत भाव से): "...और फिर मेरे पास कहने को कुछ न बचा, बस खामोश होकर मैं उनकी बात मान गई।"
भाव-पुष्प कुछ लोग प्रेम को परिभाषित करते हैं, कुछ इस पर तर्क करते हैं। प्रेम में तर्क नहीं होता, इसमें कोई सवाल नहीं होता। कुछ कहने के लिए जवाब नहीं होते, मैं से हम तक, की राह का पता नहीं होता। प्रेम जाना है तो करना होगा, बिना प्रेम किए, क्या प्रेम समझाएंगे? कहते हैं उसने हमें धोखा दिया, हमने तो बड़ी शिद्दत से किया। हमें पहले पता होता तो न करते, न देते उनको अपना दिल। आती है याद बाबा बुल्ले शाह, इश्क शायरी में उन्होंने कहा है— "ज़हर देख के पीता तो क्या पीता? और इश्क देख के किया तो क्या किया?" और इश्क कभी दुःख नहीं होता, इश्क हार और जीत से फर्क नहीं पड़ता। किसी शायर ने भी कहा है, "इश्क में रंग से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि महफिल में हमने दूध से ज़्यादा चाय के दीवाने देखे हैं।" कहने को बहुत कुछ, फिर कहेंगे क्या आपने, कभी न इश्क किया, या समझकर या पढ़कर लिखा। इस पर कहूंगी, हाँ इश्क किया, उस सांवरे से, उस मुरली वाले से। ये दिखावा नहीं, बचपन से है, जब शायद इश्क का मतलब नहीं पता था। और कृष्ण कभी उनको प्रेम करने वाले, को सेवक या नौकर नहीं समझते। वो उन्हें चाहने वाले को सखा, सखी और गोपी कहते हैं। — काजल
"What do you think is more important—the Chair (Position) or the Person sitting on it?" I believe both hold their own power. A chair provides the stage, but the person defines the performance. Without the person, the chair is just an empty seat; without the chair, the person’s authority remains invisible. True power is the harmony between the two."
"जिसकी खातिर छोड़े हमने जमाने के सब नाते, आज उसी के लबों ने कह दिया—'हमें नहीं चाहिए तुम'।" - Kajal Soam
एक नई रचना , दिल से दिल तक
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