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Aap sab ko republic day ki subh kamna
miss you kanzal one
Ajadi kese mili ye mat jano Gulami kese huvi ye jano Jati vad ko khatam karo
mera dada and bajrang das bapa ni dosti
mene aapni marji se Army 🪖 ki job me ritarment leliya he...
हमने कई रिटायर फौजियों को बैंकों और दफ़्तरों में सिक्योरिटी गार्ड बनकर खड़े देखा है। सीमा पर जवानी झोंकने के बाद भी उन्हें दो वक्त की इज़्जतदार रोज़ी के लिए खड़ा रहना पड़ता है। गोली , बर्फ़ और जंगल झेलने वाला जवान रिटायर होकर भी चैन से नहीं बैठ पाता क्योंकि पेंशन अक्सर ज़िंदगी चलाने को काफी नहीं होती। इसके उलट , कभी किसी मुखिया , पार्षद , विधायक , सांसद या मंत्री को रिटायर होकर नौकरी करते देखा है? नहीं। सत्ता से उतरते ही वे कोठियों, फार्महाउस और दर्जनों कट्ठा ज़मीन के मालिक बन जाते हैं। कुछ के नाम पर नहीं तो रिश्तेदारों के नाम पर बिज़नेस खड़े हो जाते हैं। जनता की “सेवा” इतनी फ़ायदेमंद होती है कि रिटायरमेंट उनके लिए आराम की शुरुआत बन जाती है। सवाल क्रूर लेकिन जरूरी है—अगर सबकी तनख़्वाह तय थी, तो यह अकूत संपत्ति कहाँ से आई? देश की असली सेवा किसने की—सीमा पर खड़ा जवान या कुर्सी से चिपका नेता? जब फौजी को बुढ़ापे में भी नौकरी चाहिए और नेता को कभी नहीं, तो यह व्यवस्था नहीं, लूट का लाइसेंस है। हिसाब होना चाहिए वरना यह अन्याय चलता ही रहेगा।
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