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Dhara vyas

Dhara vyas

@vyasdhara


शायद मैं ठहरा मुसाफ़िर सा,
मंजिल सा किनारा मेरा।
काग़ज़ की कश्ती,
लहरों से लड़ती,
बीच समंदर में उलजी।
- Dhara vyas

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शख़्सियत ऐसी कि आईना भी टूट जाए,
सफ़र इतना लम्बा कि ख़ामोशी भी छूट जाए।
है मुझमें क़ैद एक परिंदा,
पंख खुलें तो आसमां छू जाए।
— धरा Vyas
- Dhara vyas

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