"पत्नी क्यों मोहनी नहीं होती?”
क्यों पत्नियाँ प्रेमिका नहीं होती,
क्यों हर रोज़ वो मोहनी नहीं होती?
क्यों महके हुए ख़्वाबों की जगह,
रसोई की धूप ओढ़नी नहीं होती?
क्यों सजना अब फ़र्ज़ नहीं रह जाता,
हँसी आईने की ज़रूरत नहीं होती?
क्यों आँखों में अब नशा नहीं दिखता,
वो बातों में पहले सी रोशनी नहीं होती?
असल में वो मोहनी आज भी होती है,
बस उसे दिखाने की फुर्सत नहीं होती।
वो जो घर को जन्नत बना देती है,
उसे जन्नत देखने की इजाज़त नहीं होती।
वो थक कर भी मुस्कान पहन लेती है,
पर उसकी थकान कभी ज़ाहिर नहीं होती।
प्रेमिका सपनों में बसती है अक्सर,
पत्नी हक़ीक़त की कहानी होती है।
जहाँ मोह छिन जाता है आदतों में,
वहीं से असली मेहरबानी होती है।
पत्नी मोहनी नहीं लगती शायद,
क्योंकि वो दिखावा नहीं करती।
वो इश्क़ को कामों में बदल देती है,
इसलिए अदाओं की नुमाइश नहीं करती।
और जो इसे समझ ले सच्चे दिल से,
उसकी पत्नी फिर भी मोहनी लगती है,
बस देखने वाली नज़र चाहिए,
वरना मोहब्बत रोज़ की आदत बन जाती है।
आर्यमौलिक