दुनिया को बताऊँ तो तमाशा बन जाएगा,
अपनों को कहूँ तो घर उजड़ जाएगा…
इसलिए दर्द को स्याही बना लिया मैंने,
और काग़ज़ को अपना सबसे करीबी बना लिया।
रो कर लिख देती हूँ अपने मन की हर बात,
क्योंकि सुनने वाला कोई होता तो कलम चुप रहती…
मन हल्का हो जाता है काग़ज़ से बात करके,
इतनी-सी तसल्ली भी आजकल बहुत होती है जीने के लिए।