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बाबा राम रहीम का सच क्या है? . श्री गुरमीत राम रहीम जी पर लगाए गए मुकदमें की तथ्यात्मक समय सारणी : . (i) सन 2002 में वाजपेयी को दो गुमनाम खत प्राप्त हुए !! खतो के बारे में यह दावा किया गया था कि ये पत्र गुरु राम रहीम की साध्वियों द्वारा लिखे गए थे !! और इन खतो में यह दावा किया गया था कि गुरु श्री राम रहीम जी ने 1999 में इन साध्वियों का बलात्कार किया था !! ( मतलब बलात्कार के 2 से 3 वर्ष बाद गुमनाम खत भेजे गए ) . (ii) घटना के 3 साल बाद भेजे गए इन गुमनाम खतो के आधार पर वाजपेयी ने सी बी आई जांच के आदेश जारी किये !! और बहाना यह था कि - हाई कोर्ट के जज ने वाजपेयी को सी बी आई जांच करवाने के आदेश दिए थे !!! . (iii) सी बी आई के आईपीएस अधिकारी ने कुछ 20 साध्वियों से बेहद गहन ,संदिग्धार्थक, अनेकार्थक एवं घुमावदार प्रश्न किये। इन बयानों को Crpc 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने रिकोर्ड किया गया। और पूछे गए इन अनेकार्थक प्रश्नों के जवाबो को "सबूत" के तौर पर मान लिया गया !!! . (iv) कथित साध्वियां लगातार कह रही थी कि - 'कोई अपराध नहीं हुआ था ', किन्तु उनके बयानों का आशय बलात्कार निकाला गया। उनके द्वारा दिए गए पहले बयानों को सबूत माना गया और बाद के कथ्यों को अस्वीकार कर दिया गया !! . तब सी बी आई वाजपेयी के नियंत्रण में काम कर रही थी। यह अंदाजा लगाने की बात है कि किसने क्या किया होगा और कैसे किया होगा। तो इस मामले में आप अपना अनुमान लगाने के लिए स्वतंत्र है। और 18 साल बाद इस मुकदमे के फैसले में गुरमीत राम रहीम जी को दोषी करार देकर जेल भेज दिया गया !!! . दरअसल पूरा देश एक विशाल सर्कस के मंच में तब्दील हो चुका है। और किसी व्यक्ति को लग सकता है कि - तो इससे क्या फर्क पड़ता है। असल में समस्या यह है कि कई देशो में इस तमाशे की डोज़ काफी कम है। और जिस देश में यह तमाशा कम है वह देश अच्छी व्यवस्थाओ के कारण तेजी से मजबूत होगा और अंततोगत्वा या तो हम पर नियंत्रण हासिल कर लेगा या हमें नष्ट कर देगा। और उस समय यह कॉमेडी हमारी ट्रेजिडी बन जायेगी। . ============ . डेरा सच्चा सौदा प्रकरण ; समस्या एवं समाधान . अध्याय . (1) समस्या यह है कि आबादी के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राम रहीम जी के साथ न्याय नहीं किया गया है। . (2) वजहें, जो इस बात की पुष्टि करती है कि भारत के जज भ्रष्ट है . (3) तर्क ; जिनसे यह स्थापित किया जाता है कि भारत के जज बेहद ईमानदार एवं निष्पक्ष है . (4) डेरा और राजनीति . (5) राम रहीम जी के मुकदमे से सम्बंधित कुछ तथ्य जो अदालत के फैसले को संदिग्ध बनाते है . (6) उद्देश्य डेरे के इन्फ्रास्त्रक्चर को गिराना था ताकि मिशनरीज का रास्ता साफ़ हो . (7) समाधान . (8) संत और संतत्व की परिभाषा पर मेरा प्रतिभाव . ————— . टिप्पणी : इस जवाब में कुल 8 बिंदु है। 7 बिन्दुओ में मैंने इस प्रकरण से जुडी हुयी विभिन्न सूचनाएं, तथ्य एवं इनके आधार पर मेरा निष्कर्ष रखा है। इस निष्कर्ष या विश्लेषण को आप मेरा दृष्टिकोण भी कह सकते है। यदि मेरा दृष्टिकोण पूर्वाग्रह से ग्रसित है तो मैं इस बात से इंकार नहीं करता कि मैं पूर्वाग्रह से मुक्त होकर लिखता हूँ। जवाब में एक बिंदु समाधान का भी है, और यह बिंदु महत्वपूर्ण है। पाठको से आग्रह है कि मेरे दृष्टिकोण की तुलना में समाधान वाले हिस्से को ज्यादा भार दें। . ————— . (1) समस्या यह है कि लाखों डेरा समर्थको एवं लाखों स्वतंत्र कार्यकर्ताओ का मानना है कि श्री राम रहीम जी के मामले में अदालत द्वारा दिया गया फैसला संदिग्ध है !! . हो सकता है श्री राम रहीम जी दोषी हो, और ये भी हो सकता है कि वे निर्दोष हो। किन्तु इतना तो तय है कि देश की आबादी का एक वर्ग इस फैसले से संतुष्ट नहीं है। इसी तरह का असंतोष संत श्री आसाराम जी बापू के मामले में भी देखने को मिला था। आसाराम जी के मामले में भी देश की आबादी का एक वर्ग यह मानता था एवं आज भी मानता है उनके साथ न्याय नहीं किया गया। संत रामपाल जी, जयेंद्र सरस्वती जी एवं नित्यानंद जी से जुड़े हुए मामलो में भी देश की एक बड़ी आबादी की यही धारणा थी। . इस तरह यहाँ 2 वर्ग बन जाते है : पहला वर्ग वह है जो यह मानता है कि श्री राम रहीम जी के साथ कोई अन्याय नहीं हुआ है और वे दोषी है, व उनके दोषी होने का सबसे बड़ा सबूत यह है कि अदालत ने उन्हें दोषी ठहरा दिया है !! अदालत ने उन्हें किस आधार पर दोषी ठहराया है और क्या सबूत बरामद किये गए है, इससे उन्हें कोई लेना देना नहीं है !! जबकि दुसरे वर्ग का मानना है कि, हो सकता है वे दोषी हो या हो सकता है कि दोषी नहीं भी हो। इस वर्ग को अदालत के फैसले पर विश्वास नहीं है, तथा इस अविश्वास की "पर्याप्त एवं वाजिब" वजहें मौजूद है। . टिप्पणी - इस लेख में उन नागरिको के लिए कुछ नहीं है जो यह मानते है कि 2000 के नोटों में चिप लगी हुयी है, और इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि टीवी-अख़बार पर ऐसा बताया गया था, और वे यह भी मानते है कि भारत के जज चाहे पैदाइशी ईमानदार न हो किन्तु नियुक्ति मिलते ही एक प्रकार की जादुई प्रक्रिया द्वारा वे ईमानदार हो जाते है !!! यह लेख सिर्फ उन लोगो के काम का है जो जाया तौर पर न्यायमूर्ति पूजक नहीं है और साथ ही यह भी मानते है कि 2000 के नोटों में ऐसी कोई चिप नहीं है। . ———————- . (2) वजहें , जो पुष्टि करती है कि भारत के जज भ्रष्ट है : . एक पोचा तर्क यह है कि इन सभी संतो की भक्ति के कारण इनके भक्त अदालत पर अंगुली उठा रहे है। यह एक गलत तर्क है। आप संतो और उनके भक्तो की बात को जाने दीजिये। सलमान खान का उदाहरण लीजिये। जब उन्हें छोड़ दिया गया था तब भी देश की आबादी का एक बड़ा वर्ग इस तरह की आवाजे उठा रहा था कि हमारी अदालते भ्रष्ट है। तो यह खुली हुयी बात है कि पेड मीडिया द्वारा की जाने वाली तमाम पॉलीस के बावजूद भारत का एक वर्ग यह मानता है कि हमारी जज भ्रष्ट है !! . क्यों कार्यकर्ताओ के एक वर्ग का मानना है कि हमारी अदालतें भ्रष्ट है ? . क्योंकि ऐसी कोई वजह ही नहीं है जो इस बात का इत्मीनान दिलाए कि भारत की अदालतें भ्रष्ट नहीं है। लेकिन ऐसी ढेर सारी वजहें है जो इस बात की पुष्टि करती है कि भारत के जज भ्रष्ट न हो ऐसा किसी भी तौर से संभव नहीं है। कुछ वजहें निचे दी गयी है : . 2.1 साक्षात्कार : भारत में जज बनने के लिए साक्षात्कार से गुजरना पड़ता है। साक्षात्कार में अंक देना जजों के हाथ में होता है। तो भाई भतीजावाद एवं घूस (सेटिंग) के अवसर यहीं से बन जाते है। इस तरह नियुक्ति से ही भ्रष्टाचार शुरू हो जाता है। जज एवं नेता साक्षात्कार की प्रक्रिया को हटाना नहीं चाहते। यदि साक्षात्कार को हटा दिया जाए तो जजों के भ्रष्ट होने की एक वजह समाप्त हो जायेगी। लेकिन फिलहाल साक्षात्कार है , अत: भ्रष्टाचार है। उल्लेखनीय है कि चीन में जजों की नियुक्ति में साक्षात्कार नहीं है। सिर्फ लिखित परीक्षा के माध्यम से ही जजों की नियुक्ति की जाती है। इस वजह से चीन के जज भारतीय जजों की तुलना में कम भ्रष्ट है। समाधान - जजों की नियुक्ति प्रक्रिया से साक्षात्कार को हटाया जाना चाहिए। . 2.2. पदोन्नति एवं स्थानान्तरण : जजों की नियुक्ति, स्थानांतरण एवं पदोन्नतियां वरिष्ठ जजों के हाथ में होती है। शेषन जज हाई कोर्ट के एवं हाई कोर्ट के जज सुप्रीम कोर्ट के चंगुल में है। यदि हाई कोर्ट का जज भ्रष्ट है तो वह शेषन कोर्ट के सभी जजों पर मनचाहे फैसले करवाने के लिए चाबुक चला सकता है। यदि सुप्रीम कोर्ट के जज भ्र्ष्ट है तो वे पूरी न्यायपालिका को भ्रष्ट बना देते है। और सुप्रीम कोर्ट के जज पूरी तरह से निरंकुश है। . यदि सुप्रीम कोर्ट का जज कुर्सी पर रहते हुए घूस खा रहा है तो उसकी शिकायत कहाँ करेंगे आप ? . दरअसल शेषन कोर्ट, हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपनी एक टोली बना ली है। इनके फैसले में किसी का कोई दखल नहीं। जनता को तो भूल ही जाइए, सरकार तक का दखल नहीं !! जब किसी आदमी को यह पता हो कि उसे पकड़ने वाला कोई नहीं है, न ही कोई उससे सवाल पूछने वाला है, तो उसके भ्रष्ट होने की सम्भावना बढ़ जायेगी। यह निरंकुशता भ्रष्टाचार को जन्म देती है। . उल्लेखनीय है कि जापान में जजों को हर आम चुनाव में नागरिको के अनुमोदन से गुजरना पड़ता है। जब भी चुनाव होते है तो बेलेट पेपर के साथ एक अतिरिक्त प्रश्न रखा जाता है कि क्या आप इस जज को नौकरी से निकालना चाहते है या नहीं। इस तरह से नागरिको के पास विकल्प होता है कि वे भ्रष्ट एवं निकम्मे जज को खारिज कर सके। जज को भय रहता है कि भ्रष्टाचार करने पर जनता मुझे खारिज कर सकती है। इस वजह से उनके भ्रष्टाचार में कमी आती है। इसे रिटेंशन इलेक्शन या रिव्यू कहते है। किन्तु भारत के जज और नेता यह कतई नहीं चाहते कि नागरिको को जजों के काम काज पर टिप्पणी करने का अवसर दिया जाए। . अमेरिका में इससे भी बेहतर प्रणाली है। वहां नागरिक के पास जजों को किसी भी समय नौकरी से निकालने प्रक्रिया है। वहां के जज जानते है कि यदि वे भ्रष्टाचार करेंगे तो यह छिपेगा नहीं और जनता उन्हें नौकरी से निकाल देगी। इस तरह जनता द्वारा नौकरी से निकाले जाने का भय उन्हें कम भ्रष्ट बना देता है, और वे तमीज से पेश आते है। नागरिको द्वारा बहुमत का प्रयोग करके इस तरह नौकरी से निकालने की प्रक्रिया को वोट वापसी कहते है। समाधान - भारत में जजों को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार आम नागरिको को दिया जाना चाहिए। इससे नागरिको का न्यायपालिका में दखल बढेगा और इस अंकुश से भ्रष्टाचार में कमी आएगी। . 2.3. पैसे लेकर सीधे नियुक्तियां : क्या आप जानते है कि, उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिए अभ्यर्थी को लिखित परीक्षा से भी नहीं गुजरना होता है !! वरिष्ठ जज कोर्ट में प्रेक्टिस करने वाले किसी भी वकील को सीधे हाई कोर्ट में न्यायधीश के पद पर नियुक्ति दे सकते है !! एक तरह से यह नियम घूसखोरी को कानूनी करने के लिए बनाया गया है, जिसका परोक्ष अर्थ यह है कि – यदि आपके भाई भतीजे वरिष्ठ जज है , यदि आप एक वकील है , और यदि आपके पास घूस देने के लिए मोटी राशि है तो आप सीधे ही हाई कोर्ट के जज बन सकते है !! अनुमान किया जा सकता है कि इस ढंग से जो व्यक्ति जज बनेगा वह कितना भ्रष्ट होगा, और इस तरीके से जो जज किसी को जज बनाएंगे वे कितने ईमानदार होंगे !! समाधान - पसंदगी के आधार पर नियुक्ति देने की प्रक्रिया को ख़त्म किया जाना चाहिए। न्यायधीश जनता के बहुमत से अनुमोदित और यदि वे भ्रष्ट आचरण करते है तो उन्हें नौकरी से निकालने का अधिकार जिले / राज्य / देश के मतदाताओं के पास हो। . 2.4. मन मर्जी क़ानून बनाने की शक्ति : जब तक संसद दखल कर के इसे पलट न दे तब तक सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट की रुलिंग्स का प्रभाव कानूनों की तरह ही होता है। और, यदि संसद कोई क़ानून बनाती है तो सुप्रीम कोर्ट उसे अवैध भी घोषित कर सकती है। इस तरह कानूनों को वैध / अवैध घोषित करने और क़ानून / संविधान की व्याख्या का अधिकार जजों के पास है। . दूसरे शब्दों में, भारत में अंततोगत्वा जज ही यह तय करते है कि कौनसा क़ानून लागू होगा और कौनसा नहीं होगा। क्या संवैधानिक है और क्या असंवैधानिक है यह तय करने का अधिकार भी जजों के पास है !! और ख़ास बात यह है कि जजों पर नागरिको का कोई नियंत्रण नहीं है। समाधान - कानूनों एवं संविधान की व्याख्या का अधिकार आम नागरिको के पास होना चाहिए। इससे जनता यह निर्धारित कर सकेगी कि कौनसा क़ानून देश हित में है व कौनसा देश विरोधी। . 2.5. मामले को असीमित समय तक लटकाने की शक्ति : धीमी अदालती प्रकिया भ्रष्टाचार को जन्म देती है। जजों के पास किसी मामले को असीमित समय तक लटका कर रखने की शक्ति है। वे घूस खाकर किसी मुकदमें के फैसले को इच्छित समय तक टालते रह सकते है, तथा घूस मिलने पर किसी मामले में अति न्यायिक सक्रियता दिखा सकते है। भारत की अदालतों में 3 करोड़ मुकदमे लटके हुए है। इनमे कई नेता, अभिनेता, अधिकारी, उद्योगपति आदि शामिल है। वे इनके मामलों की सुनवाई धीमी गति से करते है ताकि लम्बे समय तक आरोपी जजों के पंजे में फंसा रहे। चीन के 2 लाख जजों के मुकाबले भारत में सिर्फ 18 हजार जज होने से अदालती प्रक्रिया धीमी है और इस वजह से जजों में भ्रष्टाचार है। समाधान - भारत को जजों की संख्या 20 हजार से बढ़ाकर 2 लाख करने की जरुरत है। . 2.6. अवमानना का क़ानून : जजों को कोई भ्रष्ट कह कर न पुकारे, इसके लिए जजों ने अवमानना का क़ानून बनाया है। यदि आप जज को भ्रष्ट कहेंगे तो जज आपको अदालत की अवमानना के आरोप में जेल पहुंचा देंगे। इस क़ानून के कारण जजों के भ्रष्टाचार की चर्चा नहीं हो पाती और इससे जज निशंक होकर भ्रष्टाचार कर पाते है। एक तरह से जजों ने इस तरह का क़ानून बनाकर पूरे देश को बाध्य कर दिया है कि वे जजों को ईमानदार एवं फ़रिश्ता माने !! और आपको अपने आस पास ऐसे लोग बहुतायत से मिलेंगे जो बिना किसी वजह से जजों को हरिश्चंद्र की औलाद मानकर चलते है। और इसकी उनके पास सिर्फ एक वजह है – उन्होंने यह अख़बार में पढ़ा हुआ होता है कि भारत के जज ईमानदार है !! समाधान - अवमानना के क़ानून को रद्द किया जाना चाहिए। . 2.7. विवेकाधिकार की असीम शक्ति : जजों का विवेकाधिकार भी भष्टाचार को बढ़ावा देता है। कानूनों को कितना भी विस्तृत रूप से लिखा जाये, तब भी कई बिन्दुओ को तय करने के लिए दंडाधिकारी को अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करना होता है। यह विवेकाधिकार भारत के जजों को असीमित शक्ति प्रदान कर देता है। वे घूस खाकर अपने विवेकाधिकार का इस तरह से इस्तेमाल करते है, जिससे घूस देने वाले को लाभ पहुँचाया जा सके। एक मशहूर कथन है कि – क़ानून मोम के टुकड़े की तरह होते है, और इसकी व्याख्या करने वाला इसे मनचाहे सांचे में ढाल सकता है !! समाधान - विवेकाधिकार की शक्ति जजों की जगह नागरिको के ज्यूरी मंडल को दी जानी चाहिए। . तो ऊपर दिए गयी प्रशासनिक वजहें बताती है कि हमारी न्यायपालिका में ऐसी पर्याप्त व्यवस्थाएं है जो यह सिद्ध करती है कि ऐसी कोई वजह मौजूद नहीं है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारत के जज देश के अन्य अधिकारियो एवं नेताओ की तुलना में ज्यादा ईमानदार है। . बल्कि स्थिति इसके उलट है। दरअसल जजों की नियुक्ति-पदोन्नति की प्रणाली, विवेकाधिकार का प्रयोग एवं अवमानना का क़ानून उन्हें ज्यादा भ्रष्ट होने के ज्यादा सहज अवसर प्रदान करता है। और उन्हें नेताओं की तरह कभी जनता के प्रति जवाबदेहिता की प्रक्रिया से नही गुजरना पड़ता !! जीवन में कभी भी नही !! यही वजह है कि हमारी न्यायपालिका में भारी भ्रष्टाचार है। . 2.8. दूसरी तरफ सिर्फ दो वजहें है जिसकी वजह से यह बात स्थापित की जाती है कि भारत के जज बेहद ईमानदार एवं निष्पक्ष है : अवमानना के क़ानून का भय : यदि आप जजों पर अंगुली उठाएंगे तो वे आपको अवमानना का दोषी ठहरा कर जेल में डाल देंगे !! इस वजह से भारत के सभी समझदार एवं बड़े आदमी निरंतर यह दोहराते रहते है कि हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है !!! दूसरी बड़ी वजह पेड मिडिया है : धनिक वर्ग एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक भारत में जज सिस्टम को जारी रखना चाहते है, ताकि वे जजों को घूस देकर मनचाहे फैसले निकलवा सके। इस तरह धनिक वर्ग एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक अपने पक्ष में फैसले लेने के लिए जजों के भ्रष्टाचार का लाभ उठाते है। अत: वे जजों की छवि बनाये रखने के लिए पेड मिडिया को भुगतान करते है। पेड मिडिया निरंतर इस तरह की धारणा खड़ी करता है जिससे नागरिको में यह भ्रम फैले कि भारत के माननीय जज बेहद ईमानदार है। . ——————- . (3) डेरा और राजनीति : . यह एक बहुत ही गलत धारणा है कि धर्म में राजनीति का एवं राजनीति में धर्म का दखल नहीं होना चाहिए। दरअसल धर्म राजनीति से अलग किया ही नही जा सकता। . वजह ? . कोई भी धार्मिक संस्था या धार्मिक गुरु लोगो से जुड़ा होता है तथा उसकी गतिविधियों में धार्मिक जमाव होता है। जहाँ भी लोगो का जमाव होगा वहां दखल करना राजनीति की मजबूरी है। राजनेता ऐसे सभी व्यक्तियों का पीछा करते है जिसके पास लोगो के किसी समूह को प्रभावित करने की क्षमता हो। . धार्मिक संस्थाओ के पास यह क्षमता काफी बढ़ी हुयी होती है। अत: राजनेता चाहते है कि अमुक गुरु या संस्था अपने श्रद्धालुओं को उनके पक्ष में वोट करने के लिए प्रेरित करे। कोई गुरु या संस्था राजनीति से अलग रहना चाहे तो भी राजनेता उनका पीछा करते है। धार्मिक गुरुओ के पास इनसे बचने का कोई विकल्प नहीं है। . और कभी कभी इसका उल्टा भी देखने में आता है। सभी धार्मिक संस्थाओ को अपने विस्तार के लिए सरकार से मधुर सम्बन्ध बनाये रखना जरुरी होता है। इसीलिए वे बढ़त बनाये रखने और स्वयं को सुरक्षित करने के लिए सत्ता के साथ गठजोड़ बनाते है। कुल मिलाकर धार्मिक संस्थाओ / गुरुओ के पास लोगो का जमाव है और ये लोग वोट करते है। राजनीति में प्रत्येक व्यक्ति एक वोट है। तो धर्म में राजनीति स्थायी तत्व है। इससे बचा नहीं जा सकता। . जो लोग इस तरह का ज्ञान बाँटते फिरते है कि धर्म का राजनीती में दखल नहीं होना चाहिए वे भी यह बात अच्छी तरह से जानते है कि पूरी धर्म का राजनीती में दखल अनिवार्य तत्व है, किन्तु वे अपने निहित स्वार्थो के लिए इस तरह के भ्रम फैलाते है। . मौजूदा स्थिति में राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ, कांग्रेस, अकाली और आम आदमी पार्टी में से कोई भी राजनैतिक दल डेरा के समर्थन में नहीं था / है। अकाली स्थानीय राजनीति और धार्मिक वजहों से तथा बीजेपी=संघ राष्ट्रीय राजनीति की वजह से डेरे को गिराना चाहते थे !! अपनी राजनैतिक वजहों के चलते कोंग्रेस एवं आम आदमी पार्टी की रुचि भी डेरे को बचाने में नहीं थी। आरएसएस हिन्दू धर्म के अनुयायियों को अपने नीचे "एक" करने के मिशन पर है। संघ के अनुसार विभिन्न सम्प्रदाय एवं गुरु वगैरह हिन्दुओ को विभाजित कर रहे है, और इसकी वजह से हिन्दुओ को एक करने का उनका मिशन पिछड़ जाता है !! अत: संघ पिछले 90 वर्ष से विभिन्न सम्प्रदायों एवं गुरुओ को अपने प्रतिस्पर्धी के रूप में देखता है। गोल्डन टेम्पल पर अपना प्रभाव रखने वाले अकाली भी डेरे को अपने प्रतिस्पर्धी के रूप में देखते है। कोंग्रेस को डेरे ने एक लम्बे समय तक राजनैतिक समर्थन दिया था, किन्तु हाल ही में डेरे के बीजेपी की और चले जाने से कोंग्रेस को भी डेरे के गिर जाने से कोई दिक्कत नहीं है। इसके अलावा मिशनरीज द्वारा समर्थित तर्क शील सोसाइटी जैसे संगठन भी डेरे के खिलाफ है। . बहरहाल, विभिन्न दलों और संगठनो के अपने हित और उनकी राजनीति है, और इसके कई आयाम हो सकते है। . इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि मिशनरीज एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां डेरे को गिराना चाहती थी। अत: इस बात से कोई फर्क नहीं आता कि संघ / कोंग्रेस / अकाली आदि क्या चाहते थे। भारत में एफडीआई बढ़ने से मिशनरीज की ताकत इतनी बढ़ चुकी है कि बीजेपी / कोंग्रेस / अकाली / आम आदमी पार्टी आदि कोई भी दल मिशनरीज के खिलाफ नहीं जा सकते। अत: इस प्रकरण में संघ / कोंग्रेस / अकाली एवं आम आदमी पार्टी की भूमिका को ज्यादा गंभीरता से लेने से हम मूल विषय से भटक जायेंगे। . यहाँ हमें इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि परदे के पीछे जो भी सियासत रही हो , लेकिन निष्पादन जज द्वारा ही किया जाता है। . आशय यह कि किसी व्यक्ति को जेल में भेजने की शक्ति सिर्फ जज के पास ही होती है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी इस शक्ति से वंचित है। तो जब किसी व्यक्ति को फंसाना होता है तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक हमेशा जज का ही इस्तेमाल करते है। जब तक जज नहीं चाहेगा तब तक किसी भी व्यक्ति को किसी तरह से जेल में नहीं पहुचायां सकता। और यदि जज किसी व्यक्ति को जेल भेजना चाहता है तो उसे फिर कोई बचा भी नहीं सकेगा। ऊपर उन कारणों को बताया गया है जो इस बात की पुष्टि करते है कि भारत की अदालतें उतनी ही भ्रष्ट है जितने कि अन्य विभाग। . ———————— . (5) राम रहीम जी के मुकदमे से सम्बंधित कुछ तथ्य जो अदालत के फैसले को संदिग्ध बनाते है : . सन 2002 में वाजपेयी को दो गुमनाम खत प्राप्त हुए ! खतो के बारे में यह दावा किया गया था कि ये पत्र गुरु राम रहीम की साध्वियों द्वारा लिखे गए थे !! और इन खतो में यह भी दावा किया गया था कि गुरु श्री राम रहीम जी ने 1999 में इन साध्वियों का बलात्कार किया था !! ( मतलब बलात्कार के 2 से 3 वर्ष बाद गुमनाम खत भेजे गए ) !!! घटना के 3 साल बाद यानी 2002 में इन गुमनाम खतो के आधार पर वाजपेयी ने CBI जांच के आदेश जारी किये !!! इन पत्रों में यह नहीं लिखा गया था कि ये पत्र किसने भेजे है। अत: CBI के आईपीएस अधिकारीयों ने कुछ 20 साध्वियों से बेहद गहन ,संदिग्धार्थक, अनेकार्थक एवं घुमावदार प्रश्न किये। इन बयानों को Crpc-164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने रिकोर्ड किया गया। और पूछे गए इन अनेकार्थक प्रश्नों के जवाबो को आगे की जांच के लिए सबूत के तौर पर मान लिया गया !!! 2005 तक CBI ने पीड़ीताओ से कई बार पूछताछ की। किन्तु हर बार पीड़ीताओ ने बयान दिया कि हमारे साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ !! CBI का कहना है कि उन्होंने कथित पीड़ीताओ को 2002 में ही खोज निकाला था !! किन्तु सीबीआई ने उनके बयान 2006 में दर्ज किये, और 2006 में ही चालान पेश किया। CBI ने दोनों कथित पीड़ीताओ के बयान 2006 में फिर दर्ज किये, और इनमे यह कहा गया कि बलात्कार किया गया था !! राम रहीम जी के वकील को दोनों पीड़ीताओ के बयानों की कॉपी नहीं दी गयी !! राम रहीम जी के वकील को पीड़ीताओ से क्रोस क्वेशचन करने का मौका नहीं दिया गया !! पीड़ीताओ ने अपने बयान बदलने की अनुमति मांगी किन्तु उन्हें बयान बदलने की अनुमति नहीं दी गयी !! . तो तकनिकी रूप से मुकदमे का सार यह है कि – 3 साल बाद प्राप्त हुए गुमनाम पत्रों के आधार पर सीबीआई जांच के आदेश किये गए !! 6 साल बाद सीबीआई ने ख़त लिखने वालो को खोज निकाला और उनके बयान दर्ज किये !! उन्होंने 4 वर्ष तक यह कहा कि कोई बलात्कार नही हुआ था , किन्तु सीबीआई ने इसे नहीं माना !! 2006 में सीबीआई ने दो साध्वियों के बयान दर्ज किये जिनमे कहा गया कि, बलात्कार हुआ था !! वकील को इन पीडिताओ से क्रोस क्वेश्चन करने की अनुमति नहीं दी गयी !! पीडीताओ ने अपने बयान बदलने की अनुमति मांगी, किन्तु उन्हें अनुमति नहीं दी गयी !! 11 साल पहले लिए गए इन बयानों के आधार पर जज ने घटना के 18 साल बाद राम रहीम जी को जेल भेज दिया !!! . ध्यान देने वाली बात यह है कि, इस मुकदमे के सम्बन्ध में कोई भी "भौतिक सबूत" बरामद नहीं किये गए। सिर्फ बयानों को आधार पर फैसला दिया गया। जज को यह फैसला करना था कि कौन सच बोल रहा था और कौन झूठ। इस स्थिति में अभियुक्त एवं पीडिताओ का नारको टेस्ट लेकर पता किया जा सकता है कि किसका बयान सच था। किन्तु नारको टेस्ट नहीं लिया गया और जज ने लड़कियों के बयानों को सच मानने का फैसला किया !!! . सुप्रीम कोर्ट की यह रूलिंग कि — लड़की का बयान हर हाल में सच माना जाएगा और लड़की को अपना बयान बदलने की इजाजत नहीं होगी मुख्य वजह बनी जिसके कारण सरकार के नियन्त्रण में काम करने वाले CBI के आईपीएस अधिकारी एवं जज श्री राम रहीम जी को जेल में पहुंचा सके। सुप्रीम कोर्ट ने यह रूलिंग रसूखदार लोगो को पंजे में लेने के लिए की है, और लगभग सभी हिन्दू संतो को गिराने के लिए इस रूलिंग का इस्तेमाल किया गया है, और आगे भी इसी रूलिंग का इस्तेमाल किया जाएगा। . इस रूलिंग का एक सबसे बड़ा साइड इफेक्ट यह आया कि अवसरवादी काम काजी महिलाओं ने इसका इस्तेमाल सहकर्मी पुरुष साथियों को ब्लेकमेल करने में शुरू किया और ज्यादातर पुरुष मालिको ने महिलाओं से दूरी बनाने के लिए उन्हें नियुक्तियां देना बंद कर दिया !! . पिछले 3 साल में मेरे खुद के सामने ऐसे दर्जन भर वाकये गुजर चुके है जब महिलाओं को नौकरियां गंवानी पड़ी है। और विडम्बना यह है कि उन महिलाओं / लडकियों को इस बात की जानकारी नहीं है कि इस रूलिंग की वजह से वे नौकरियां गँवा रही है !! . लिंक - Victim's testimony is enough for conviction for rape: court . CBI के अधिकारियों ने ये बयान मजिस्ट्रेट के सामने कथित Crpc की धारा 164 के तहत दर्ज किये थे !! अब यदि बयान देने वाली लड़की अपने बयान को बदलती तो उसे झूठा बयान दर्ज करवाने के मुकदमे का सामना करना पड़ता। इस तरह उन्हें कोर्ट में श्री गुरु राम रहीम जी के खिलाफ फिर वही बयान देने के लिए बाध्य किया गया !! . और फिर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का इस्तेमाल किया गया कि - लड़की के बयान को अंतिम सत्य एवं अकाट्य सबूत माना जाएगा। . और फिर हमारे पास ऐसे शिक्षित एवं जागरूक लोगो का जमघट है जो इस प्रक्रिया को क़ानून का शासन कह के संबोधित कर रहे है !!! . इस सम्बन्ध में डेरा प्रमुख की पैरवी करने वाले वकील का साक्षात्कार निचे दिए लिंक पर देखें। इस साक्षात्कार में कहे गए तथ्यों को आप विश्वसनीय मान सकते है, क्योंकि वकील ने जो भी तथ्य रखे है वे रिकॉर्ड पर है, और गलत बयानी पर जज वकील को जेल भेज सकता है। . और वकील का साफ़ कहना है कि आरोप लगाने वाली लकड़ियों ने क्या बयान दिया है उसकी कॉपी हमें दी ही नहीं गयी !! और भौतिक सबूत इस मामले में थे नहीं !! मतलब आरोप लगाने वाली लड़कियां कौन है वकील को मालूम नहीं है, उन्होंने क्या बयान दिए वो भी वकील को मालूम नहीं है !! और इन्ही बयानों के आधार पर 10 साल की सजा !! . मैं आपसे आग्रह करूँगा कि कृपया यह पूरा साक्षात्कार देखें - Interview with S.K. Garg Narwana, Lawyer, Gurmeet Ram Rahim . और क़ानून के इस मखौल को कवर करने के लिए मिशनरीज ने 24*7 घंटे देश भर में एक अलग तरह तमाशा रचा, जिसमें राम रहीम जी संत नहीं है , वे विलासी है, ऐश्वर्य प्रिय है, उनके पास गुफाएं है, उनके डेरे में स्वीमिंग पूल है, उन्होंने आलिशान महल बना रखा है, उनके पास 2 बाज, 3 उल्लू , 5 तीतर है, उनके पास ढेर सारी जमीन है, वे फिल्मे बनाते है, नाचते-गाते है, क्रिकेट खेलते है, कारोबार करते है , रंग बिरंगे कपड़े पहनते है आदि आदि जैसे बकवास आरोपों को पेड मीडिया द्वारा बार बार इसीलिए दोहराया गया ताकि बलात्कार के मूल मुकदमे पर चर्चा को टाला जा सके !! . पेड मीडिया से फीडिंग लेने वाले ज्ञानी लोगो ने ये सब देखा-पढ़ा और फेसबुक-कोरा-व्हाट्स एप आदि के माध्यम से पूरे देश में फैलाने में भी योगदान दिया !! . यदि इन फर्जी आरोपों पर बहस नहीं चलाई जाती है तो जनता का ध्यान बलात्कार के मुकदमे से जुड़े तथ्यों पर चला जाएगा। और तब जनता को यह मालूम होगा कि सिर्फ बयान को आधार बनाकर ही राम रहीम जी को दोषी ठहरा दिया गया है। . सुप्रीम कोर्ट की एक रूलिंग ने जज को यह तय करने का अधिकार दे दिया था कि वह यदि चाहे तो पीड़िता के बयान को सच मान सकता है !! और जज को इस बात में सुविधा थी कि लड़की के बयान को सच मान लिया जाए !! . इस तथ्य को चर्चा से बाहर करने के लिए मीडिया ने ऊपर दिए गए फर्जी आरोपों की झड़ी बनाकर यह धारणा खड़ी करने की कोशिश की है कि श्री राम रहीम जी एक दुर्जन व्यक्ति है। और सुबह शाम अनाज खाने के बावजूद कई लोग इन आरोपों को दोहरा रहे है। उन्हें इस बात पर सोचने का अवकाश ही नहीं है कि गुफाएं, स्वीमिंग पूल, महल आदि बनाना और फिल्मो में अभिनय करना अपराध की श्रेणी में नहीं आता। . ————————- . (6) उद्देश्य डेरे के इन्फ्रास्त्रक्चर को गिराना था ताकि मिशनरीज का रास्ता साफ़ हो . टिप्पणी : मैं श्री राम रहीम जी का भक्त नहीं हूँ, न ही मैं कभी डेरे पर गया हूँ। और मुझे यह भी पता नहीं है कि अमुक मामले में श्री राम रहीम जी दोषी है या नहीं है। जब मेरे सामने यह मामला आया तो मैंने इसे कानूनी नजरिये से देखा, और कानूनी टर्म के अनुसार कोई भी सामान्य समझ का व्यक्ति यही निष्कर्ष निकालेगा कि यह मुकदमा पहले दिन से ही फर्जी है, और उन्हें जानबूझकर फंसाया गया प्रतीत होता है। . लेकिन पेड मीडिया की अफीम लेने वाले व्यक्ति मुकदमे से जुड़े तथ्यों को टच ही नहीं करते है, वे उन्हें बस इसीलिए जेल में देखना चाहते है कि राम रहीम जी का रहन सहन उनके अनुसार एक संत जैसा नहीं है !! बताइये !!! . जैसे जैसे घटनाक्रम आगे बढ़ता गया उससे यह बात और भी साफ़ होती चली गयी कि मिशनरीज का उद्देश्य डेरे को तोडना है। मिशनरीज ने बड़ी मेहनत करके पंजाब को नशे की गिरफ्त में लिया है, और डेरे द्वारा इस तरह की प्रभावी गतिविधियाँ संचालित की जा रही थी जिससे लोग नशा छोड़ रहे थे !! . इसके अलावा डेरे के ज्यादातर अनुयायियों में ओबीसी शामिल है और इनमें दलित भी है। मिशनरीज के लिए यह वर्ग आसान शिकार है। सहजधारी सिक्खों को गोल्डन टेम्पल की वोटिंग लिस्ट से बाहर कर दिए जाने और दलित सिक्खों के गोल्डन टेम्पल से दूर छिटकने के बावजूद मिशनरीज इन्हें अपनी और खींच नहीं पा रही है, क्योंकि संत श्री राम रहीम एवं रामपाल जी इन्हें आश्रय दे देते है। . यह देखना बेहद दुखद है कि, इन सभी संतो के अनुयायी करोडो रूपये लेकर वकीलों के चक्कर लगा रहे है, ताकि वकील उन्हें जजों से न्याय दिला सके। एक मात्र अपवाद संत श्री रामपाल जी रहे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि देश के 80% से ज्यादा जज भ्रष्ट है !! . इन अनुयायियों को इस बात का भान नहीं है कि हमारे जज / प्रशासनिक अधिकारी / पुलिस अधिकारी / मंत्री एवं कल्कि पुरुष तृतीय मोदी साहेब समेत संघ के सभी मंत्री अमेरिकी धनिकों की फौलादी पकड़ में है। ये सभी नेता अधिकारी एवं सभी मीडिया कर्मी ( पेड अर्नव, पेड सुधीर, पेड रजत एवं पेड रविश समेत ) अमेरिकी धनिकों की कठपुतलियां मात्र है। . गुरमीत जी , श्री आसाराम जी बापू, श्री रामपाल जी आदि संतो ने अपने असाधारण कार्यो से इस बात को सुनिश्चित किया कि गरीब /दलित / ओबीसी आदि मिशनरीज के आश्रय में चले जाने की जगह हिन्दू धर्म में बने रहे। . मैं इसे फिर से दोहराता हूँ - यदि आज गरीब /दलित / ओबीसी आदि हिन्दू धर्म में बने हुए है तो मंदिर प्रमुखों, प्राचीन राजाओ, संघ के नेताओं, बीजेपी नेताओं का इसमें योगदान शून्य है। इसका असली श्रेय सिर्फ इन तथा इन जैसे अन्य संप्रदाय प्रमुखों की नयी खेप को जाता है। और विडम्बना यह है कि आज उदारवादी / पढ़े लिखे / आधुनिक हिन्दू इन संतो को जेल में भेज दिए जाने का जश्न मना रहे है !!! . हिन्दुओ को अपने नीचे एक करने की चाहत रखने वाले संघ=बीजेपी के ज्यादातर कार्यकर्ता भी इससे खुश है। उनका नजरिया है कि, चलो अच्छा हुआ। यदि ये सभी संत हवालात में भेज दिए जाते है तो हम उनके अनुयायियों को आसानी से संघ=बीजेपी में जोड़ लेंगे !! . इन्हें यह अहसास ही नहीं है कि, मिशनरीज की ताकत के सामने इनकी कोई हैसियत नहीं है। यदि संत गुरमीत जी , संत श्री आसाराम जी एवं संत रामपाल जैसे लोग कमजोर हो गए तो दलितों / ओ बी सी / गरीबो की एक बड़ी संख्या मिशनरीज की गोद में जा गिरेगी। ऐसे सभी व्यक्ति जो इन संतो को गलत तरीके से 10-20 साल के लिए जेल में भेज दिए जाने का जश्न मना रहे है दरअसल वे जाने-अनजाने मिशनरीज की मदद कर रहे है। . उन्हें इस बात को समझने की जरूरत है कि ये संत धर्म के नाम पर सिर्फ डायलॉग नहीं मार रहे है, बल्कि स्कूल, अस्पताल, दवाइयाँ, आश्रय आदि भी उपलब्ध करवा रहे है। और मिशनरीज को कथाएँ कहने वाले संतो से ज्यादा परेशानी नहीं होती है, किन्तु वे ऐसे संतो को बाधा के रूप में देखते है जो परोपकारी कार्य कर रहे है !! . ओह माय गॉड फिल्म कान्हा Vs कान्हा नामक नाटक पर लिखी गयी है। परेश रावल ने इसमें मुख्य भूमिका भी निभायी है और वे इसके सह निर्माता भी है। इस नाटक के फायनेंसर संघ=बीजेपी के नेता है, औ
क्या आप मुझे बता सकते हैं ये"पेड मीडिया"क्या है,और यह क्या करती है? . लोकतंत्र आने से पहले राजा बाहुबल-सैन्य बल से सत्ता में आता था, और वास्तव में राज्य को कंट्रोल करता था। राजा की शक्ति का स्त्रोत सेना थी, और धनिक वर्ग का सेना पर कोई नियंत्रण नहीं था। इसके अलावा अदालतें भी पूर्णतया राजा के अधीन थी। अत: राजा की स्थिति हर हाल में मजबूत रहती थी। . दुसरे शब्दों में, यदि धनिकों के सम्बन्ध राजा से बिगड़ जाते थे तो राजा को निकालने के लिए साजिश / हत्या आदि के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं था। तब वे किसी ऐसे व्यक्ति को फंडिंग देना शुरू करते थे जो राजा का तख्ता पलट सके। . लेकिन वोटिंग राइट्स आने के बाद राज्य के नागरिको की राय निर्णायक बन गयी। नागरिको की राय जिस आदमी के पक्ष में होगी, वह व्यक्ति राजा बन जाएगा। मीडिया नागरिको की राय बनाने में सबसे महत्त्वपूर्ण है, अत: धनिकों ने मीडिया को फैलाना और इसे कंट्रोल करना शुरू किया। मुख्यधारा के मीडिया पर धनिकों का हमेशा से 100% नियंत्रण रहा है, और आज भी उनका इस पर 100% नियंत्रण है। , . व्यवसायिक रूप से यह घाटे का व्यवसाय है। किन्तु राजनैतिक फायदे के लिए धनिक वर्ग मीडिया समूहों को घाटे में चलने के बावजूद भुगतान करते है। वे मीडिया के माध्यम से अवाम को कंट्रोल करते है और अवाम पर कंट्रोल होने से लोकतंत्र का राजा एवं राजवर्ग (पीएम-सीएम-सांसद-विधायक-मंत्री आदि) उनके कंट्रोल में रहता है। और राजा को कंट्रोल करने के बाद वे राजा से उन क़ानूनो गेजेट में प्रकाशित करवाने में सफल हो जाते है जो धनिक वर्ग को अतिरिक्त मुनाफा दे !! . पेड मीडिया क्या है ? . मीडिया में आप जो कुछ भी देखते-सुनते-पढ़ते हो उसके लिए किसी न किसी के द्वारा पे ( Pay ) किया जाता है। इसीलिए यह पेड मीडिया है। . यहाँ सबसे जरुरी बात यह है कि — जब पेड मीडिया सच्ची और अच्छी ख़बरें दिखाता है तब भी इसके लिए किसी न किसी के द्वारा भुगतान किया जाता है। इसे फिर से पढ़िए — जब पेड मीडिया सच्ची और अच्छी ख़बरें दिखाता है तब भी इसके लिए किसी न किसी के द्वारा भुगतान किया जाता है। . मतलब खबर सच्ची है या झूठी है, घृणा फैलाती है या सौहार्द, गंभीर है या कॉमेडी, अश्लील है या शालीन, उकसाऊ है या औचित्यपूर्ण इससे कोई सरोकार नहीं होता है। मीडिया में जो भी चीज आएगी उसकी पेमेंट की जायेगी। बिना पेमेंट कुछ भी आता नहीं है। उदाहरण के लिए यदि कोई नेता वाकयी में ईमानदार है और मीडिया रिपोर्ट कर रहा है कि वह ईमानदार है तो इसके लिए किसी न किसी ने इसके लिए पेमेंट की है। यदि कोई उद्योगपति बेईमान है और मीडिया रिपोर्ट कर रहा है कि उसने इतनी टेक्स चोरी की है, तो टेक्स चोरी सच्चाई है, लेकिन यह खबर मीडिया में सिर्फ तब आएगी जब कोई न कोई इस खबर को दिखाने के लिए पेमेंट करें। . यदि सीएम ने किसी जगह का उद्घाटन किया है और अख़बार ने इसकी फोटो छापी है तो इसके लिए पेमेंट की गयी है। पेमेंट कौन कर रहा है, वह अलग मसला है। लेकिन पेमेंट नहीं हुआ है तो फोटो अखबार में आने वाली नहीं है। यदि किसी टीवी / अख़बार ने कोई सर्वे प्रकाशित किया है तो इसके लिए पेमेंट की गयी है। यदि मीडिया ने किसी व्यक्ति के ट्विट का स्क्रीन शॉट छापा है या टीवी स्क्रीन पर दिखाया है तो इसके लिए भी पेमेंट करनी पड़ेगी। . यदि पेड मीडिया में यह रिपोर्ट हो रहा है कि — बेरोजगारी बढ़ रही है, तो इसके लिए पेमेंट की जायेगी। और यदि उसी दिन किसी अन्य मीडिया में यह आया है कि बेरोजगारी घट रही है तो इसके लिए भी पेमेंट हुयी है। मतलब बिना पेमेंट के एक कार्टून तक मीडिया में प्रकाशित नहीं होता है। पेमेंट कौन कर रहा है यह अलग बात है। लेकिन यह एक तथ्य है कि पेमेंट बिना मुख्यधारा की मीडिया में कुछ भी रिपोर्ट नहीं होता है। . पेड मीडिया के इन सभी स्त्रोतों में विज्ञापनो की स्थिति अलग है। क्योंकि जब आप अमूल का विज्ञापन देखते है तो आपको पता होता है कि पेमेंट अमूल ने की है। लेकिन विज्ञापन के अलावा जितना भी आप देख रहे है उसके लिए भी पेमेंट की जा रही है, और आपको पता भी नहीं है कि पेमेंट कौन कर रहा है !! . पेड न्यूज क्या है ? . मान लीजिए कि नेता X बयान देता है — नागरिकता संशोधन बिल संविधान के खिलाफ है और ये मुसलमानो के खिलाफ भी है, तो मिडिया में यह बयान सिर्फ तब आएगा जब मिडिया को इसके लिए पेमेंट की जाए। इस तरह मीडिया में आने के साथ ही यह बयान पेड न्यूज हो जाता है। यदि पेमेंट नहीं हुयी है तो यह बयान पेड मिडिया में नहीं आएगा, और तब यह पेड न्यूज नहीं है !! . और जब इसी समय कोई नेता Y कहता है कि — यह बिल संवैधानिक है और भारत के मुसलमानो को इससे कोई खतरा नहीं है तो यह बयान भी मिडिया में सिर्फ तब आएगा जब इसके लिए कोई पेमेंट करे। पेमेंट नहीं होने पर यह यह बयान मिडिया में नहीं आएगा। चाहे बयान खुद गृह मंत्री या प्रधानमंत्री ने ही क्यों न दिया हो। जितनी बार यह बयान दिखाने के लिए पेमेंट की जायेगी उतनी ही बार यह बयान दिखाया जाएगा। . इस तरह पेड मीडिया एक स्टेज है जहाँ आप पेड मीडिया के स्पोंसर्स द्वारा बनाए गए स्टेज पर पेड न्यूज Vs पेड न्यूज का एक अंतहीन सिलसिला देखते रहते है। और आप इससे बच नहीं सकते। उनके स्टेज हर जगह इसके लिए आपका पीछा करते है। अखबार, मैगजीन, पाठ्यपुस्तकें, फ़िल्में, ज्ञान बाटनें वाली किताबें, भाषण, फेसबुक-व्हाट्स एप, यू ट्यूब ( यह नया है ) आदि। उनका प्रयास यह रहता है कि आप उनसे जुड़े रहे ताकि आपका इनपुट वे डिसाइड कर सके। . दुसरे शब्दों में पेड मीडिया सच्ची खबरें भी दिखाता है, और झूठी भी। लेकिन हर स्थिति में उन्हें कोई न कोई पेमेंट करता है। इसीलिए मीडिया के लिए सही शब्द पेड मीडिया ( Paid Media ) है। . भारत में मीडिया गोरे लेकर आये थे, और 1947 तक यह उनके नियंत्रण में रहा। 1950 से 1990 तक भी भारतीय धनिकों के माध्यम से इसे गोरे ही कंट्रोल कर रहे थे। बाद में इंदिरा जी ने मीडिया को पूरी तरह से अपने कंट्रोल में लेने की कोशिश की लेकिन असफल रही। 1990 से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने आना शुरू किया और भारत का मीडिया फिर से उनके कंट्रोल में आ गया। आज भारत का पेड मीडिया पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको के नियंत्रण में है, और पूरी पेमेंट वे ही करते है। . पेड मीडिया के अंग : . कक्षा 1 से स्नातकोत्तर तक की सामाजिक विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीती विज्ञान, लोक प्रशासन की सभी पुस्तकें पेड मीडिया है। सभी फ़िल्में, धारावारिक, वृत्त चित्र पेड मीडिया है। समाज-राजनीती-अर्थशास्त्र पर लिखी गयी मुख्यधारा की सभी पुस्तकें पेड पुस्तके है। यदि इन विषयों पर लिखी गयी किसी पुस्तक को पुरूस्कार मिला है तो यह डबल पेड है। मुख्यधारा के सभी अख़बार, मनोरंजन चैनल, न्यूज चेनल पेड मीडिया है। टीवी-अखबार में आने वाले सभी बुद्धिजीवी पेड बुद्धिजीवी है। सभी पत्रकार पेड पत्रकार है। सभी सम्पादक पेड सम्पादक है। सभी क़ानून-संविधान विशेषग्य पेड विशेषग्य है। . तो व्यक्ति के विचार, धारणाओ, निष्कर्षो की बेसिक सप्लाई लाइन पेड मीडिया है। यह कभी सही है कभी गलत है। लेकिन आप ऊपर दिए गए स्त्रोतों से जितना भी ले रहे है, या जितना भी आपने आज तक ग्रहण किया है उसके लिए किसी न किसी ने भुगतान किया है। और वे आपसे यह जानकारी छुपा लेते है कि इसके लिए भुगतान कौन कर रहा है !! यह इनपुट धीरे धीरे व्यक्ति की बुनियादी विचार प्रक्रिया में शामिल हो जाता है और व्यक्ति जब खुद को अभिव्यक्त करता है तो उसका आउटपुट पेड मीडिया का रिफ्लेक्शन होता है। .
अगर भारत में भी अमेरिका की तरह बिना लाइसेंस बंदूक खरीदने की अनुमति दी जाए तो इसके क्या परिणाम हो सकते हैं? . पेड मीडिया के प्रायोजक पूरी दुनिया के नागरिको को हथियार विहीन बनाये रखना चाहते है। अत: बंदूक रखने के अधिकार को लेकर पेड मीडिया द्वारा बहुत बड़े पैमाने पर भ्रम फैलाया गया है। जब से पेड मीडिया का प्रादुर्भाव हुआ है तब से उन्होंने जितनी गलत फहमियां Gun Rights के बारे में फैलायी है उतनी किसी और विषय के बारे में नही फैलायी। . और भारत को Arms Control के कारण जितनी क्षति उठानी पड़ी उतनी क्षति और किसी अन्य वजह से नहीं उठानी पड़ी। और जहाँ तक मैं देखता हूँ, आने वाले समय में भारत को जो सबसे गंभीर नुकसान उठाना पड़ेगा वह भी गन कंट्रोल के कानून के कारण ही उठाना पड़ेगा !! . [ टिप्पणी : इस जवाब में 3 खंड है - खंड (अ) में कुछ तर्क एवं सूचनाएं है जो पेड मीडिया द्वारा Gun Rights के बारे में फैलाये गए भ्रम को काटती है। खंड (ब) में वह प्रकिया है जिसके गेजेट में आने से देश व्यापी जनमत संग्रह प्रक्रिया शुरू होगी ताकि आम भारतीय नागरिक यह तय कर सके कि वे बंदूक रखने का अधिकार चाहते है या नहीं। खंड (स) में मैंने बताया है कि भारत में प्रस्तावित Gun Law लागू होने से किस तरह के संभावित परिवर्तन आयेंगे। खंड (ब) महत्वपूर्ण है, और यदि आप इस तथ्य से परिचित है कि हथियार विहीन नागरिक समुदायों का क्या हश्र होता है तो सीधे खंड (ब) पढ़ सकते है। ] . ———— . खंड (अ) . हालांकि, पेड मीडिया द्वारा Gun Rights के बारे में दिए जाने वाले कई आर्गुमेंट इतने बकवास होते है, है उन्हें उत्तरित ही नहीं किया जाना चाहिए। अत: गन कंट्रोल के पक्ष में दिए जाने वाले निहायत ही स्तरहीन तर्कों को मैंने इसमें शामिल नहीं किया है। . (1) दरअसल, जब किसी देश का कानून यह कहता है कि आप बंदूक नहीं रख सकते तो इसका परिणाम यह होता है कि : जो 0.05% व्यक्ति क़ानून में नहीं मानते, वे क़ानून तोड़कर अवैध रूप से बंदूक ले आते है, और जो क़ानून में मानते है, वे क़ानून की चपेट में आकर बंदूक नहीं ले पाते हथियारबंद होने के कारण अब ये 0.05% अपराधी शेष Law Abide Citizens पर बढ़त बना लेते है !! तो अंततोगत्वा बंदूक नहीं रखने का क़ानून बनाकर सरकार समुदाय के 99.95% शरीफ लोगो को हथियारों से वंचित कर देती है, लेकिन उन 0.05% को नहीं रोकती / रोक पाती जो क़ानून को उड़ता हुआ भुनगा समझते है !! . (2) दरअसल ज्यादातर गन क्राइम अवैध बंदूको से होते है, लाइसेंसी या रजिस्टर्ड बंदूक से अपराध की सम्भावना बेहद कम होती है। वजह ? लाइसेंस वाली बंदूक को ट्रेक किया जा सकता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति को रजिस्टर्ड बंदूक थमा दी जाए तो जब भी गन क्राइम होगा तब व्यक्ति पकड़ा जाएगा। क्योंकि पंजीकृत या लाइसेंस वाली बंदूक को ट्रेक किया जा सकता है। लेकिन जब सरकार बंदूक रखने का अधिकार नहीं देती तो क़ानून तोड़ने वाले व्यक्ति अवैध बंदूके ले आते है, और वे जानते है कि उन्हें ट्रेक नहीं किया जा सकता, अत: अपराध करने के लिए प्रोत्साहित होते है !! इस तरह बंदूक न रखने का क़ानून यह सुनिश्चित करता है कि लोग अवैध बंदूके रखेंगे, फिर उनसे वे क्राइम करेंगे और फिर उन्हें पकड़ा भी नहीं जा सकेगा !! अपराधी के पास रजिस्टर्ड / लाइसेंसी बंदूक होगी तो उसका जोखिम बढ़ जायेगा, और उसके अपराध करने की सम्भावना घटेगी। . (3) वास्तविकता यह है कि बंदूक अच्छी या बुरी नहीं होती। बंदूक से अपराध होगा या रक्षा होगी यह इस बात से तय होता है, कि बंदूक किसके हाथ में है। क़ानून के मानने वाले के हाथ में बंदूक सुरक्षा देती है, लेकिन जब बंदूक अपराधिक प्रवृति के व्यक्ति के हाथ में होती है तो यह हमें नुकसान देने लगती है। . तो आपके घर परिवार में, मोहल्ले में फेसबुक फ्रेंड्सलिस्ट आदि में ऐसे कितने लोग है जिनके हाथ में बंदूक आने के साथ ही वे लूटपाट करना शुरू कर देंगे !! मेरे अनुमान में किसी भी समाज में इनकी संख्या 0.05% से अधिक नहीं है। . यह स्थापित तथ्य है कि समुदाय के 99.05% नागरिक क़ानून का पालन करने वाले होते है, अत: जब Mass के पास बंदूक जाती है तो इस वजह से क्राइम रेट कभी नहीं बढती, कि आम नागरिको को बंदूक दे दी गयी है। क्राइम रेट बढ़ने की वजहें भिन्न होती है, किन्तु उन्हें गन क्राइम के खाते में दिखाया जाता है, ताकि नागरिको के दिमाग में बंदूक के प्रति नफरत डाली जा सके। . जब बंदूक की वजह से किसी की जान जाती है तो इसे बड़े पैमाने पर कवरेज दिया जाता है, किन्तु उन घटनाओ को छिपा लिया जाता है जब बंदूको ने नागरिको की रक्षा की। और इस तरह असंतुलित रिपोर्टिंग करके वे यह सुनिश्चित करते है कि आम नागरिक बंदूक रखने के अधिकार के खिलाफ बने रहे। . (4) क्या भारतीयों को बंदूक देने से वे एक दुसरे को मार नहीं देंगे ? यह गलत धारणा ( Height of Misconception ) पेड मीडिया द्वारा खड़ी की गयी है ताकि नागरिको को हथियार विहीन रखने के लिए कन्विंस किया जा सके। वे एक तरफ़ा एवं चयनात्मक सूचनाओ का इस्तेमाल करके यह भ्रम खड़ा करते है। मैं आपको इसका एक जीता जागता व्यवहारिक उदाहरण देता हूँ । . भारत के ही कर्नाटक राज्य के कूर्ग जिले में लगभग 70 से 80% नागरिको के पास बंदूके है, किन्तु वहां पर गन क्राइम रेट तुलनात्मक रूप से निम्न है। कर्नाटक भी भारत में ही है, और यदि भारतीयों को बंदूक देने से वे एक दुसरे को मार देंगे तो अब तक कूर्ग में लोगो ने एक दुसरो को मार क्यों नहीं दिया। मतलब यहाँ कोई लॉजिक लगाने की जगह ही नहीं है !! सीधा सबूत सामने है !! . वहां के प्रत्येक नागरिक को बंदूक रखने की छूट है, और महिला, पुरुष सभी बंदूके रखते है। और अनिवार्य रूप से रखते है। और कई कई बंदूके रखते है !! . यह एक वास्तविक उदाहरण है जो यह सिद्ध करता है कि - भारतीयों को बंदूक रखने का अधिकार देने से वे एक दुसरे को मार देंगे , नामक धारणा पूरी तरह से झूठ है, और पेड मीडिया द्वारा भारतीयों के दिमाग में डाली गयी है। . और ज्यादातर भारतीय इस धारणा के शिकार इसीलिए है क्योंकि पेड मीडिया इस सूचना को छिपाता है कि, कूर्ग जिले के 80% नागरिको के पास पंजीकृत बंदूके है !! और इसी तर्ज पर बंदूक के बारे में सही सूचना देने वाली कई खबरें छिपायी जाती है, और भ्रमित करने वाली खबरों को उछाला जाता है !! . आजादी के बाद कूर्ग जिले के नागरिको से बंदूके छीनने की 2 बार तिकड़म लगायी गयी लेकिन दोनों बार कोई वाजिब वजह नहीं होने के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा। पहली कोशिश (शायद 1972 में) इंदिरा जी ने की थी और दूसरा प्रयास 2013 में चिदम्बरम ने किया। . तब कूर्ग में चुनाव थे, अत: जिलाधीश ने सरकार को चिट्ठी लिखी कि – शांति पूर्ण ढंग से चुनाव सम्पन्न करवाने के लिए नागरिको के हथियार जब्त करने की अनुमति दी जाए, और चुनाव के बाद इन्हें बंदूके फिर से वितरित कर दी जाएगी !! DC’s letter on Kodava firearm licence kicks up a row . जब नागरिको को यह जानकारी हुयी तो उन्होंने कलेक्टर एवं एसपी कार्यालय को घेर लिया। उनका तर्क था कि पिछले 150 वर्षो से हम बंदूके रख रहे है, और आज तक कभी क़ानून व्यवस्था की गड़बड़ी नहीं हुयी है, तो किस आधार पर इस तरह का पत्र लिखा गया है। अंतत सरकार को पीछे हटना पड़ा। . कूर्ग जिले के नागरिको को बंदूक रखने की छूट ब्रिटिश ने दी थी। और तब से उन्हें लगातार आर्म्स एक्ट में यह छूट दी जाती रही है। कूर्ग के प्रत्येक मूल निवासी को बंदूक रखने और धारण करने की छूट है। और जब वे अपने शहर से बाहर जाते है तब भी उन्हें छूट है कि वे 100 राउंड कारतूस एवं बंदूक साथ में लेकर जा सकते है !! अभी उनकी इस छूट को 2029 तक बढ़ा दिया गया है। और 2029 में इस छूट को फिर से 10 साल आगे बढ़ाना पड़ेगा, क्योंकि वे अपने हथियार किसी भी कीमत पर देने के लिए राजी नहीं है। Government continues British-era exemption given to Kodavas of Coorg for arms licence . और वे जब प्रदर्शन करने सड़को पर आते है तो भी उनके हाथो में बंदूक रहती है !! और फिर भी आपको भारत में अपने आस पास हर तरफ ऐसे लोग मिलेंगे जो लगातार यह बात दोहराते है कि भारतीयों को बंदूक देने से वे एक दुसरे को मार देंगे !! क्यों ? . क्योंकि पेड मीडिया में उन्होंने यही सब देखा पढ़ा सुना है !!! मैं और मेरे जैसे कई कार्यकर्ता पिछले 6-7 साल से विभिन्न मंचो पर कूर्ग के बारे में यह तथ्य रख रहे है, लेकिन आश्चर्य का विषय है कि अभी तक पेड मीडिया के प्रायोजको को अभी तक कूर्ग के बारे में कोई लॉजिक नहीं सूझा है !! बहरहाल, उम्मीद है कि , जल्दी ही वे इस बारे में कोई थ्योरी गढ़ कर लायेंगे ताकि तथ्य होने के बावजूद इसे तर्क से काटा जा सके !! . तलवार के बारे में यही छूट सिक्खों को 1923 में दी गयी थी। हालांकि सिक्खों को यह छूट ऑफिशियली नहीं है, किन्तु सिक्ख यदि तलवार धारण करता है, तो प्रशासन द्वारा इसकी अवहेलना की जाती है। उल्लेखनीय है कि मास्टर तारा सिंह जी ने कृपाण दा मोर्चा आन्दोलन चलाकर यह छूट देने के लिए गोरो को बाध्य कर दिया था। . (5) कैसे अमेरिकी नेता अपने नागरिको को बंदूक रखने को प्रोत्साहित करते है ? . ओबामा का उदाहरण लीजिये। राष्ट्रपति रहते हुए आपने ओबामा को पेड मीडिया में गन कंट्रोल के बारे में काफी रोते धोते हुए देखा होगा। दरअसल वे यह ड्रामा बंदूके बेचने के लिए करते थे। जब भी हथियारों की बिक्री में गिरावट आती है, हथियार कम्पनियाँ नेताओं को बन्दूको पर प्रतिबन्ध लगाने का बयान देने को कहती है। नतीजा — लोग ज्यादा बन्दुके खरीदते है। . ओबामा कहते है कि मैं बन्दूको पर प्रतिबन्ध लगा दूंगा। पर वे सिर्फ बयान देते है, इसके लिए क़ानून नहीं बनाते !! . यह इस तरह है कि, यदि सरकार द्वारा टोस्टर पर प्रतिबन्ध लगाने का बयान दिया जाए और आपके पास टोस्टर न हो तो आप सबसे पहले क्या खरीदेंगे ? टोस्टर !! और इस तरह के बयान सुनकर सभी अमेरिकी नागरिक बंदूके खरीदने के लिए दौड़ लगाने लगते है !! . ऐसा ड्रामा ओबामा दो बार कर चुके है, और दोनों ही बार बन्दूको की बिक्री में जबरदस्तउछाल आया। Obama gun control push backfires as industry sees unprecedented surge . इस तरह के बयानों को पूरे विश्व में पेड मिडिया द्वारा इस तरह फैलाया जाता है ताकि हथियार विहीन देशो के भोले जीव इस मुगालते के शिकार हो जाए कि ओबामा नागरिको को हथियार रखने की छूट देने के खिलाफ है, अमेरिका में बन्दूको के कारण गदर मची पड़ी है, अत: हमें भी बन्दूको के खिलाफ और भी सख्त कानून बनाने चाहिए !! . बयानों को सुनने के जगह यदि आप अमेरिकी नेताओं द्वारा बनाए गए क़ानून देखिये, तो तस्वीर उल्टी नजर आती है। जोर्जिया यह कानून पास करता है, प्रत्येक परिवार को कम से कम एक बंदूक रखना अनिवार्य होगा !! ‘You must own a gun’: Georgia town passes mandatory firearms law . अगले खंड में मैंने उस इबारत के बारे में बताया है, जिसे गेजेट में छापने से भारत में हथियारबंद नागरिक समाज की रचना की दिशा में काम शुरू होगा। . ————- . खंड (ब) . बंदूक रखने का अधिकार इस तरह का है कि, इस क़ानून के आने से प्रारंभिक चरण में एक आयाम में नकारत्मक नतीजे भी आयेंगे, और कई आयाम में यह अच्छे परिणाम भी देगा। यदि किसी कानून के आने से किसी आयाम में नुकसान होना संभावित है तो मेरे विचार में ऐसे कानून को सीधे लागू नहीं किया जाना चाहिए बल्कि इस पर जनमत संग्रह करवाया जाना चाहिए, ताकि देश के नागरिक इस बारे में फैसला ले सके। यदि नागरिको का बहुमत ऐसे क़ानून को ख़ारिज कर देता है तो इसे लागू नहीं किया जाना चाहिए। . वस्तुत: मैंने भारत में Gun Law का जो क़ानून ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है, वह सीधे लागू नहीं होगा। पहले इस पर देश व्यापी जनमत संग्रह किया जाएगा। यदि देश की मतदाता सूची में दर्ज कुल मतदाताओं के कम से कम 55% मतदाता इस पर हाँ दर्ज कर देते है तो हो यह क़ानून पीएम लागू करेंगे अन्यथा नहीं। निचे मैंने इसका प्रस्तावित ड्राफ्ट दिया है : . —-क़ानून ड्राफ्ट का प्रारम्भ—- . जनमत संग्रह का प्रस्ताव ; बंदूक रखने का अधिकार . ( Proposal for Referendum ; Right to Bear Gun ) . इस क़ानून का सार : प्रधानमंत्री इस क़ानून को 'सिर्फ तब' लागू करेंगे जब जनमत संग्रह में भारत के कुल मतदाताओं के कम से कम 55% मतदाता इस क़ानून को लागू करने की स्पष्ट सहमती दें। इस क़ानून से सम्बंधित सभी मामलो का निपटान नागरिको की जूरी द्वारा किया जाएगा जज द्वारा नहीं। जूरी किसी नागरिक के बंदूक धारण करने पर प्रतिबन्ध या दंड लगा सकेगी। . यह क़ानून प्रत्येक भारतीय को बंदूक रखने का अधिकार देता है। साथ ही 10 लाख से अधिक संपत्ति रखने वाले नागरिको के लिए कम से कम 1 बंदूक एवं 100 जिंदा कारतूस रखना अनिवार्य होगा। प्रधानमंत्री किसी राज्य के 55% मतदाताओ की सहमती से यह क़ानून किसी राज्य या किसी जिले में भी लागू कर सकते है। मुख्यमंत्री भी इस क़ानून को अपने राज्य के कुछ जिलो या पूरे राज्य में लागू कर सकते है। #GunLawReferendum . नागरिको एवं अधिकारियों के लिए निर्देश . (01) यह क़ानून गेजेट में आने के साथ ही भारत में एक देश व्यापी जनमत संग्रह किया जाएगा। यदि भारत की मतदाता सूची में दर्ज कुल मतदाताओ के 55% मतदाता इस क़ानून को लागू करने के लिए हाँ दर्ज कर देते है, सिर्फ तब ही यह क़ानून लागू होगा, अन्यथा नहीं। जनमत संग्रह में मतदाता के पास सिर्फ ‘हाँ’ या ‘ना’ दर्ज कराने का विकल्प होगा, और जनमत संग्रह पूर्ण होने से पहले प्रधानमंत्री इस कानून की किसी भी धारा में कोई बदलाव नहीं करेंगे। इस क़ानून के लागू होने के बाद भारत का कोई भी मतदाता यदि इस क़ानून की किसी धारा में कोई आंशिक या पूर्ण परिवर्तन चाहता है, तो वह अमुक बदलाव के लिए जिला कलेक्टर कार्यालय में एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकता है। कलेक्टर 20 रू प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर मतदाता का शपथपत्र स्वीकार करेगा, और इसे स्कैन करके प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा ताकि अन्य मतदाता अमुक शपथपत्र पर अपनी सहमती दर्ज करवा सके। यदि देश की मतदाता सूची में दर्ज कुल मतदाताओं के 55% नागरिक अमुक शपथपत्र पर हाँ दर्ज करवा देते है तो प्रधानमंत्री शपथपत्र में दिए गए सुझावों को लागू करने के लिए आदेश जारी कर सकते है। . (02) इस क़ानून में वयस्क नागरिक से आशय है - ऐसा भारतीय नागरिक जिसकी आयु 22 वर्ष से अधिक हो। यह क़ानून 22 वर्ष से कम उम्र के नागरिको को बंदूक धारण करने की अनुमति नहीं देता है। 22 वर्ष से कम आयु के नागरिक स्पष्ट रूप से इस क़ानून के दायरे से बाहर रहेंगे। . (03) यह क़ानून लागू होने के बाद भारत का कोई भी वयस्क नागरिक अपने पास छोटी, मध्यम या बड़े आकार की कोई भी पंजीकृत (Registered) बन्दूक रख सकेगा। बंदूक रखने के लिए नागरिक को जिला शस्त्र अधिकारी के पास अपनी बंदूक का पंजीयन कराना होगा। कोई भी नागरिक किसी भी श्रेणी की 2 बंदूके अपने पास रख सकेगा। दो से अधिक बंदूके रखने के लिए नागरिक को जिला पुलिस प्रमुख से लाइसेंस लेना होगा। . (04) यदि कोई वयस्क नागरिक 10 लाख से अधिक संपत्ति का मालिक है तो उसे अपने घर में निम्नलिखित संख्या में बंदूक एवं कारतूस रखना अनिवार्य होगा : 10 लाख से अधिक संपत्ति – 1 छोटी बंदूक एवं 100 कारतूस 20 लाख से अधिक संपत्ति – 1 मध्यम आकार की बंदूक एवं 100 कारतूस 30 लाख से अधिक संपत्ति – 1 बड़े आकार की बंदूक एवं 100 कारतूस संपत्ति में 1 करोड़ के मूल्य तक के 1 घर एवं तथा 10 लाख तक के फर्नीचर को शामिल नहीं किया जाएगा . (05) इस क़ानून से सम्बंधित सभी विवादों की सुनवाई नागरिको की जूरी करेगी। यदि लॉटरी में आपका नाम निकल आता है तो आपको जूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है। जूरी में आकर आपको आरोपी, पीड़ित, गवाहों व दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा प्रस्तुत सबूत देखकर बहस सुननी होगी और सजा / जुर्माना या रिहाई का फैसला देना होगा। . अधिकारीयों के लिए निर्देश . (06) प्रधानमंत्री प्रत्येक जिले में एक जिला शस्त्र अधिकारी (DGO = District Gun Officer) की नियुक्ति करेंगे। जिला शस्त्र अधिकारी एवं उसका स्टाफ वोट वापसी एवं जूरी मंडल के दायरे में होगा। वोट वापसी की के लिए धारा 14 देखें। . (07) जिला शस्त्र अधिकारी तमंचे, पिस्तौल, राइफल, मशीनगन, कार्बाइन आदि बन्दूको का वर्गीकरण करने के लिए निम्नलिखित श्रेणियों में बन्दूको की सूची प्रकाशित करेगा : छोटी बंदूको के प्रकार। मध्यम आकार की बंदूको के प्रकार। बड़ी बंदूको के प्रकार। कारतूस, गोले तथा उनके प्रकार। . (08) जिला शस्त्र अधिकारी सभी नागरिकों को बंदूक चलाने एवं इसके रख रखाव के लिए अनिवार्य ट्रेनिंग तथा वैकल्पिक ट्रेनिंग के नियम निर्धारित करेगा। अनिवार्य प्रशिक्षण कार्यक्रम की घोषणा होने पर जिला क्षेत्र में रहने वाले 22 से 50 वर्ष की आयु के सभी नागरिकों के लिए 2 वर्ष के भीतर प्रशिक्षण लेना अनिवार्य होगा। DGO प्रशिक्षण शिविरो के संचालन के लिए आवश्यक निधि रक्षा मंत्री आदि से प्राप्त कर सकता है, या अनुदान, चंदे आदि स्वीकार कर सकता है। प्रशिक्षण शुल्क प्रशिक्षुओं द्वारा देय होगा, तथा प्रशिक्षण शुल्क की दरें जिला शस्त्र अधिकारी द्वारा तय की जाएँगी। DGO प्रति सप्ताह महा-जूरी मंडल की उपस्थिति में मतदाता सूची से 0.01% वयस्क नागरिको का चयन लॉटरी से करेगा। DGO या उसके द्वारा नियुक्त कर्मचारी लॉटरी द्वारा चुने हुए नागरिकों के यहाँ जाकर ये सुनिश्चित करेगा कि वे नागरिक निर्धारित नियम के अनुसार बन्दूक तथा कारतूस रख रहे है या नहीं। . (09) भारत सरकार इंसास राइफल, 303, 202, .22 रिवोल्वर और भारतीय पुलिस द्वारा प्रयोग की जाने वाली सभी बंदूकें, जो ‘इंसास से कम’ के स्तर की है, उनके डिजाईन सार्वजनिक करेगी। कोई भी नागरिक इस डिजाईन से बिना किसी लाइसेंस के, सिर्फ पंजीकरण करवाकर बंदूक, बन्दुक के पुर्जे, कारतूस, बुलेट प्रूफ जैकेट बनाने की फैक्ट्री लगा सकता है। . (10) भारत में यदि कोई भी व्यक्ति बंदूक बनाने की निर्माण इकाई, कारखाना आदि लगाना चाहता है तो वह जिला शस्त्र अधिकारी के पास अपना रजिस्ट्रेशन करवाकर कारखाना शुरू कर सकेगा। कारखाना शुरू करने के लिए किसी लाइसेंस या किसी भी विभाग से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी। यह क़ानून लागू होने के बाद भारत में बंदूक निर्माण में विदेशी निवेश की अनुमति नहीं होगी, और सिर्फ भारतीय नागरिको के सम्पूर्ण स्वामित्व वाली इकाइयां ही बंदूक निर्माण के कारखाने स्थापित कर सकेगी। . (11) जूरी प्रशासक की नियुक्ति एवं महाजूरी मंडल का गठन . (11.1) जिला शस्त्र अधिकारी प्रत्येक जिले में 1 जिला जूरी प्रशासक की नियुक्ति करेंगे। यदि नागरिक जूरी प्रशासक के काम-काज से संतुष्ट नही है तो वोट वापसी प्रक्रिया का प्रयोग करके जूरी प्रशासक को बदलने की स्वीकृति दे सकते है। . (11.2) प्रथम महाजूरी मंडल का गठन : जिला जूरी प्रशासक एक सार्वजनिक बैठक में जिले की मतदाता सूची में से 25 वर्ष से 50 वर्ष की आयुवर्ग के 50 मतदाताओं का चुनाव लॉटरी द्वारा करेगा। इन सदस्यों का साक्षात्कार लेने के बाद जूरी प्रशासक किन्ही 20 सदस्यों को निकाल सकता है। इस तरह 30 महाजूरी सदस्य शेष रह जायेंगे। . (11.3) अनुगामी महाजूरी मंडल : प्रथम महा जूरी मंडल में से जिला जूरी प्रशासक पहले 10 महाजूरी सदस्यों को हर 10 दिन में सेवानिवृत्त करेगा। पहले महीने के बाद प्रत्येक महाजूरी सदस्य का कार्यकाल 3 महीने का होगा, अत: 10 महाजूरी सदस्य हर महीने सेवानिवृत्त होंगे और 10 नए चुने जाएंगे। नये 10 सदस्य चुनने के लिए जूरी प्रशासक जिला मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा 20 सदस्य चुनेगा और साक्षात्कार द्वारा इनमें से किन्ही 10 की छंटनी कर देगा। महाजूरी सदस्य हर शनिवार और रविवार को बैठक करेंगे। यदि बैठक होती है तो आरंभ सुबह 11 बजे और समाप्त शाम 4 बजे तक हो जानी चाहिए। जूरी सदस्य को प्रति उपस्थिती 600 रु. एवं यात्रा खर्च मिलेगा। यदि निजी क्षेत्र के कर्मचारी को जूरी ड्यूटी पर बुलाया गया है तो नियोक्ता उसे आवश्यक दिवसों के लिए अवैतनिक अवकाश प्रदान करेगा। नियोक्ता अवकाश के दिनों का वेतन कर्मचारी के वेतन से काट सकता है। सभी श्रेणी के सरकारी कर्मचारी स्पष्ट रूप से जूरी ड्यूटी के दायरे से बाहर रहेंगे। जो नागरिक जूरी ड्यूटी कर चुके है, उन्हें अगले 10 वर्ष तक जूरी में नहीं बुलाया जायेगा। . (12) जूरी मंडल का न्यायिक क्षेत्राधिकार . (12.1) जूरी किसी नागरिक को बंदूक रखने से एक निश्चित समयावधि के लिए प्रतिबंधित कर सकेगी। तय अवधि बीत जाने पर अन्य जूरी मंडल यह फैसला करेगा कि आरोपी को हथियार रखने की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं। . (12.2) DGO या कोई भी नागरिक महाजूरी मंडल को उन लोगो की सूची दे सकेंगे जिनको बंदूक रखने से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। यदि महाजूरी मंडल इसे अनुमोदित कर देता है, तो एक नए जूरी मंडल का गठन किया जाएगा। यदि जूरी मंडल के 67% सदस्य सहमती दे देते है तो अमुक व्यक्ति को बंदूक रखने से प्रतिबंधित कर दिया जाएगा। . (12.3) यदि कोई नागरिक निर्धारित नियमों के अनुसार बंदूक या कारतूस अपने घर पर नहीं रख रहा है, तो महाजूरी मंडल सदस्य यह फैसला करेंगे कि मामले की सुनवाई की जानी चाहिए या नहीं। . (12.4) यदि किसी बंदूक निर्माण इकाई के खिलाफ कोई शिकायत आती है, या कारखाने के मालिक के खिलाफ टैक्स वगेरह का कोई भी मामला दायर होता है तो सुनवाई जूरी द्वारा की जायेगी, जज द्वारा नहीं। . (12.5) जिला जूरी प्रशासक, जिला शस्त्र अधिकारी के खिलाफ आने वाली सभी शिकायतों की सुनवाई भी जूरी करेगी। . (13) जूरी मंडल द्वारा सुनवाई . (13.1) यदि धारा (12) में दिए गए मामलो से सम्बंधित कोई भी विवाद है तो वादी अपनी शिकायत महाजूरी मंडल के सदस्यों को लिख कर दे सकते है। यदि महाजूरी मंडल मामले को निराधार पाते है तो शिकायत खारिज कर सकते है, अथवा इस मामले की सुनवाई के लिए एक नए जूरी मंडल के गठन का आदेश दे सकते है। . (13.2) मामले की जटिलता एवं आरोपी की हैसियत के अनुसार महाजूरी मंडल तय करेगा कि 15-1500 के बीच में कितने सदस्यों की जूरी बुलाई जानी चाहिए। तब जूरी प्रशासक मतदाता सूची से लॉटरी द्वारा सदस्यों का चयन करते हुए एक नए जूरी मंडल का गठन करेगा और मामला इन्हें सौंप देगा। . (13.3) अब यह जूरी मंडल दोनों पक्षों, गवाहों आदि को सुनकर फैसला देगा। प्रत्येक जूरी सदस्य अपना फैसला बंद लिफ़ाफ़े में लिखकर ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर को देंगे। दो तिहाई सदस्यों द्वारा मंजूर किये गये निर्णय को जूरी का फैसला माना जाएगा। किन्तु नौकरी से निकालने का फैसला लेने के लिए 75% सदस्यों के अनुमोदन की जरूरत होगी। प्रत्येक मामले की सुनवाई के लिए अलग से जूरी मंडल होगा, और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी। पक्षकार चाहे तो फैसले की अपील उच्च जूरी मंडल में कर सकते है। . (13.4) यदि यह सिद्ध होता है कि आरोपी निर्धारित नियम के अनुसार बंदूक तथा कारतूस अपने घर पर नहीं रख रहा है, तो जूरी सदस्य उसकी संपत्ति के 5% के अनुपात तक जुर्माना ( इस संपत्ति में 1 करोड़ का 1 घर तथा 10 लाख तक का फर्नीचर शामिल नहीं किया जाएगा ) और / या 2 माह के कारावास की सजा सुना सकेंगे। अपवादित मामलों को छोड़कर, प्रथम अपराध के लिए जुर्माना 2% तक, द्वितीय अपराध के लिए 4% तक तथा तीसरे तथा अन्य अपराधों के लिए यह जुर्माना 5% तक हो सकेगा। प्रथम अपराध कारावास द्वारा दंडनीय नहीं हो सकेगा। . (14) वोट वापसी ; जिला शस्त्र अधिकारी . (14.1) 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका कोई भी नागरिक जिला कलेक्टर के सामने स्वयं या किसी वकील के माध्यम से जिला शस्त्र अधिकारी एवं जिला जूरी प्रशासक बनने के लिए ऐफिडेविट प्रस्तुत कर सकेगा। जिला कलेक्टर सांसद के चुनाव में जमा की जाने वाली राशि के बराबर शुल्क लेकर उसका आवेदन स्वीकार कर लेगा, तथा उसे एक विशिष्ट सीरियल नम्बर जारी करेगा। कलेक्टर एफिडेविट को स्कैन करके प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा। . (14.2) कोई भी नागरिक किसी भी दिन पटवारी कार्यालय में जाकर जूरी प्रशासक एवं जिला शस्त्र अधिकारी के किसी भी प्रत्याशी के समर्थन में हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर में मतदाता की हाँ को दर्ज करके रसीद देगा। पटवारी मतदाताओं की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम एवं मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिले की वेबसाईट पर भी रखेगा। मतदाता किसी पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृत कर सकता है। स्वीकृति (हाँ) दर्ज करने के लिए मतदाता 3 रूपये फ़ीस देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी यदि कोई मतदाता अपनी स्वीकृती रद्द करवाने आता है तो पटवारी एक या अधिक नामों को बिना कोई फ़ीस लिए रद्द कर देगा। पटवारी प्रत्येक सोमवार एवं कलेक्टर प्रत्येक 5 तारीख को उम्मीदवारों की स्वीकृतियां सार्वजनिक करेंगे। [ टिपण्णी : कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी ‘हाँ’ SMS, ATM, मोबाईल एप द्वारा दर्ज कर सके। . रेंज वोटिंग – प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता किसी प्रत्याशी को -100 से 100 के बीच अंक दे सके। यदि मतदाता सिर्फ हाँ दर्ज करता है तो इसे 100 अंको के बराबर माना जाएगा। यदि मतदाता अपनी स्वीकृति दर्ज नही करता तो इसे शून्य अंक माना जाएगा । किन्तु यदि मतदाता अंक देता है तब उसके द्वारा दिए अंक ही मान्य होंगे। रेंज वोटिंग की ये प्रक्रिया स्वीकृति प्रणाली से बेहतर है, और ऐरो की व्यर्थ असम्भाव्यता प्रमेय (Arrow’s Useless Impossibility Theorem ) से प्रतिरक्षा प्रदान करती है। ] . ——-ड्राफ्ट का समापन—— . (*) उपरोक्त क़ानून के राज्य एवं जिला स्तर के ड्राफ्ट भी प्रस्तावित किये है। अत: पीएम या सीएम चाहे तो यह क़ानून किसी एक राज्य या किसी जिले में भी लागू कर सकते है। . ———— . खंड (स) . ऊपर दिए गए क़ानून के बारे में कुछ स्पष्टीकरण . (1) यह क़ानून भारत में कैसे लागू होगा ? . इस क़ानून की धारा (1) में जनमत संग्रह का प्रावधान दिया गया है। प्रधानमंत्री इस क़ानून पर हस्ताक्षर करके इसे गेजेट में निकालेंगे और गेजेट में आने के साथ ही इस पर जनमत संग्रह शुरू हो जाएगा। तब भारत का कोई भी नागरिक चाहे तो पटवारी कार्यालय में जाकर या अपने रजिस्टर्ड मोबाइल द्वारा SMS भेजकर इस कानून पर अपनी हाँ दर्ज करवा सकता। . यदि देश के कुल मतदाताओं के 55% नागरिक इस पर अपनी सहमती दर्ज करवा देते है, तब सिर्फ तब ही यह क़ानून देश में लागू होगा। जब तक 55% मतदाता इस पर अपनी सहमती दर्ज नहीं करते है, तब तक जनमत संग्रह जारी रहेगा। यदि किसी मतदाता ने इस क़ानून पर अपनी सहमती दर्ज करवा दी है, और वह अपनी सहमती रद्द करना चाहता है तो वह किसी भी दिन अपनी स्वीकृति को रद्द भी कर सकता है। इस तरह यह क़ानून नागरिको का स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने के बाद ही देश में लागू होगा अन्यथा नहीं। . (2) क्या प्रधानमंत्री यह क़ानून बिना जनमत संग्रह के लागू कर सकते है ? . यदि प्रधानमंत्री चाहे तो इस कानून की धारा 1 में से जनमत संग्रह का प्रावधान निकाल कर इसे सीधे देश में लागू कर सकते है। प्रधानमंत्री चाहे तो बिना जनमत संग्रह के इस क़ानून को देश के किसी राज्य या किसी जिले में भी लागू कर सकते है। किन्तु इस क़ानून ड्राफ्ट के लेखको का मानना है कि, यह क़ानून 55% नागरिको की स्पष्ट सहमती प्राप्त करने के बाद ही लागू किया जाना चाहिए अन्यथा नहीं। . (3) हमें इस क़ानून की जरूरत क्यों है ? . 3.1. बाह्य आक्रमण : हथियारबंद नागरिक समाज लोकतंत्र की जननी है। प्रत्येक नागरिक का शस्त्रधारी होना राज्य को इतनी शक्ति प्रदान कर देता है कि सेना के हारने के बावजूद वे खुद की एवं अपने राज्य की रक्षा कर पाते है। हिटलर ने स्विट्जर्लेंड पर हमला करने की योजना को इसीलिए स्थगित कर दिया था, क्योंकि तब सभी स्विस नागरिको के पास बंदूक थी। जब प्रत्येक नागरिक के पास बंदूक होती है तो इसे सेना द्वारा हराया नहीं जा सकता, और न ही राज्य पर पूरी तरह से कंट्रोल लिया जा सकता है। प्रत्येक अफगान के पास बंदूक होने के कारण अमेरिका, ब्रिटेन और रूस भी कई वर्षो तक चली लड़ाइयो के बावजूद अफगानिस्तान पर कभी भी पूरी तरह से नियंत्रण नहीं बना सके। विएतनाम अमेरिका से 20 वर्षो तक लड़ने में इसीलिए कामयाब रहा क्योंकि सेना के हारने के बाद यह युद्ध वहां के नागरिक लड़ रहे थे। सोवियत रूस ने नागरिको को हथियार भेजे और वे अपने देश की रक्षा कर पाए। ब्रिटिश भारत पर 200 वर्षो तक इसीलिए शासन कर पाए क्योंकि भारत के नागरिक हथियार विहीन थे। गोरो के पास सिर्फ 1 लाख बंदूके थे, और इन 1 लाख बन्दूको के माध्यम से उन्होंने 60 करोड़ नागरिको पर शासन किया। यदि सिर्फ 1% यानी 60 लाख भारतीयों के पास बंदूक होती तो ब्रिटिश भारत को नियंत्रित नहीं कर पाते थे। यदि आज भारत का चीन से युद्ध हो जाता है, और अमेरिका हमें हथियारों की मदद देने से इनकार कर देता, या हमें देरी से हथियार भेजता है, तो हथियारो के अभाव में ज्यादातर से भी ज्यादा सम्भावना है कि हमारी सेना रूपी दीवार दीवार टूट जायेगी। और एक बाद यदि हमारी सीमाओं में सेना घुस आती है तो नागरिको के पास प्रतिरोध करने के लिए कोई हथियार नहीं है। तब हमारी अवस्था ईराक जैसी हो जायेगी। ऐसे संभावित संकट से बचने के लिए यह क़ानून जरुरी है। . 3.2. आंतरिक आक्रमण : प्रत्येक नागरिक के पास बंदूक होने से आन्तरिक स्तर पर भी देश काफी हद तक सुरक्षित हो जाता है, और विभिन्न अपराधो में कमी आती है। कसाब दर्जनों नागरिको को इसीलिए मार सका था क्योंकि नागरिको के पास हथियार नहीं थे। यदि मुम्बई वासियों के पास बंदूक होती तो कसाब आता नहीं था, और आ भी जाता तो 5-7 लोगो से ज्यादा को नहीं मार पाता। और आगे भी यदि इस तरह के हमले बड़े पैमाने पर होने लगते है तो हमारे पास कोई उपाय नहीं है। सिर्फ 2000 हथियारबंद इस्लामिक आतंकियों के दस्ते ने 2 लाख कश्मीरी पंडितो को घाटी से खदेड़ दिया था। यदि कश्मीरी पंडितो के पास बंदूके होती थी, तो उन्हें कभी पलायन नहीं करना पड़ता था। 2012 में असम के कोकराझार में सिर्फ 4000 हथियारबंद मुस्लिम बांग्लादेशी घुसपेठियो ने हमला करके 2 लाख हिन्दु नागरिको को अपनी जमीन, संपत्ति आदि छोड़कर पलायन करने पर मजबूर कर दिया था। यदि सभी नागरिको के पास बंदूक होती तो उन्हें अपना घर बार छोड़कर भागना नहीं पड़ता।2012 Assam violence - Wikipedia 1947 में विभाजन के दौरान भी 20 लाख हथियार विहीन नागरिको को अपनी जान-माल गंवाना पड़ा था। वजह यह थी कि सीधी कार्यवाही करने वाले पक्ष के पास हथियार थे, जबकि दूसरे पक्ष के नागरिक हथियार विहीन थे। चूंकि सिक्खों के पास हथियार थे, अत: वे कुछ हद तक इसका प्रतिरोध कर पाए। भारत में निरंतर चुनाव होने, जनता का लोकतंत्र में विश्वास होने और सैनिको का सरकार पर भरोसा होने के कारण अब तक कभी तख्ता पलट नहीं हुआ है। किन्तु कोई विदेशी ताकत जैसे अमेरिका आदि भारत में तख्ता पलट करवाना चाहे तो वे कुछ ही महीनो में गृह युद्ध छिडवाकर, आतंकवादी हमले करवाकर, असुरक्षा का भाव उत्पन्न करके एवं राजनैतिक विकल्प हीनता दर्शा कर ऐसे हालात पैदा कर सकते है कि जनरल तख्ता पलट कर सकता है। . (4) इस क़ानून के गेजेट में आने से क्या परिवर्तन आयेंगे ? . 4.1. नकारात्मक प्रभाव : प्रथम चरण में गन क्राइम जैसे क्रोध जनित हमले आदि में वृद्धि होगी और बन्दुक से होने वाली मौतों में इजाफा होगा। लेकिन जैसे जैसे प्रत्येक नागरिक के पास बन्दुक पहुंचेगी वैसे वैसे दुसरे चरण में इस हिंसा में थोड़ी कमी आने लगेगी। इस क़ानून में किसी व्यक्ति को बंदूक रखने की अनुमति देने का अधिकार नागरिको की जूरी को दिया गया है। अत: जूरी मंडल गन क्राइम करने वाले नागरिको को हथियारों से वंचित कर देगा, और अपराध में गिरावट आने लगेगी। यदि पुलिस प्रमुख को वोट वापसी पा
ईवीएम मशीन के साथ वीवीपैट क्यों लगाई जाती है? आपने लोकसभा चुनावों में जब वोट किया तो VVPAT को पर्ची छापते और काटते देखा ? क्या आपको याद है ? . याद कीजिये, जब आपने Evm पर केले का बटन दबाया तो क्या आपने देखा कि — वीवीपेट ने केले की पर्ची छापी है, या वीवीपेट ने लाईट जला कर आपको पहले से पर्ची छपी हुयी पर्ची दिखाई और लाईट बुझा दी ? यदि आपने वीवीपेट को पर्ची छापते एवं काटते नहीं देखा तो क्या आप विश्वासपूर्वक कह सकते है कि वीवीपेट ने आपको पहले से छपी हुयी पर्ची नहीं दिखा दी है ? . VVPAT वोट चुराने में इस मनोवैज्ञानिक हेक का इस्तेमाल करता है -- अक्सर लोग उन चीजो को नहीं देख पाते या उनकी अवहेलना कर देते है जो उनकी आँखों के ठीक सामने रख दी जाती है !! . ( यह जवाब प्रायोगिक किस्म का है, अत: इसे पूरी तरह से समझने के लिए आपको थोड़े तर्क एवं पूर्व स्मृति का इस्तेमाल करना पड़ेगा। हो सकता है आपको कॉपी पेन उठाना पड़े। किन्तु यदि आप इसे समझने की कोशिश करते है तो आपके द्वारा किया गया श्रम व्यर्थ नहीं जाएगा। क्योंकि आप तब वीवीपेट का एक बेहद आसान हेक पकड़ लेंगे, जिसे वीवीपेट को सामने रखे बिना समझना और समझाना काफी मुश्किल है !! जवाब में कुछ विवरण ऐसे भी है जिनकी पुष्टि नहीं की जा सकती है। अत: पुष्टि के लिए पाठक स्वतंत्र स्त्रोतों से इनकी पुष्टि करने के लिए प्रयास करें, या अपने विवेक का इस्तेमाल करे। ) . ————- सेक्शन - A ————- 1. 2013 से अब तक VVPAT में क्या बदलाव आये ? 2013 में जब वीवीपेट आया था तो वीवीपेट की बॉडी पेक न होकर खुली हुयी थी। पर्ची छपने के बाद मतदाता खुद अपने हाथ से पर्ची लेकर डिब्बे में डालता था। कृपया इस वीडियो के शुरूआती 30 सेकेण्ड का हिस्सा देखें - Hari Krishna Prasad Vemuru@vhkprasad#ElectionCommissionOfIndia i remember you planned this📷 during first VVPAT trial in Delhi, and I am also one of your invitees to witness, why the present model changed? Does 3sec & 7sec has a link to this con..iracy? You seem to be totally dumb for such questions 684:13 pm - 1 मई 2019 लिंक - . 2018 में केंचुआ ने वीवीपेट में एक और बहुत ही शानदार बदलाव किया। केंचुआ ने वीवीपेट के पारदर्शी कांच को अंधे कांच से बदल दिया !! यह One Way कांच है, और इस पर बाहर से कितनी भी रौशनी डाली जाए अंदर का कुछ भी दिखाई नहीं देता। . बाद में केंचुआ ने लाखों Evm को कलेक्टर ऑफिस से ट्रको में लादकर मंगवाया और इनमे अंधे कांच लगवाकर इन्हें फिर से कलेक्टर कार्यालय भिजवा दिया !! कृपया इस वीडियो में 30 से 60 सेकेण्ड तक का हिस्सा देखिये। क्या आप इसमें पर्ची छपते हुए देख पा रहे है या आपने सिर्फ छपी हुयी पर्ची देखी ? इसे ध्यान से देखने के लिए आपको इसे रिवाइंड करके ध्यान से देखना पड़ सकता है। . लिंक -- . 2. अहमदाबाद के राहुल मेहता जी जब 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले वीवीपेट का पब्लिक डेमोंस्ट्रेशन देखने गए तो उन्हें यह बात खटक गयी कि जब मतदाता वोट कर रहा है तो वह वीवीपेट पर्ची को छपते एवं कटते हुए नहीं देख पा रहा है। जो कुछ हो रहा था वह यूँ था : वोटर Evm पर कुकर का बटन दबाता है। वीवीपेट लाईट जलाता है। वोटर कुकर की पर्ची देखता है। वीवीपेट लाईट बुझा देता है। राहुल मेहता जी सोफ्टवेयर लिखते है और उन्होंने IIT दिल्ली से 1990 में कम्प्यूटर साइंस शाखा से इंजीनियरिंग की डिग्री ली थी। बाद में उन्होंने अमेरिका से मास्टर ऑफ़ कम्प्यूटर साइंस किया। चूंकि वे पिछले 30 वर्षो से Evm पर काम कर रहे है, और इंजीनियरिंग में समझते है अत: उन्हें यह प्रक्रिया कुछ ठीक नहीं लग रही थी। उन्हें समझ नहीं आ रहा था जैसा कि वे पहले देखते थे वैसे वे इस बार पर्ची को छपते और कटते क्यों नहीं देख पा रहे है। और तब उन्होंने नोटिस किया कि वीवीपेट का कांच जो कि पारदर्शी होता था, अब पारदर्शी नहीं रह गया है । इसे अंधे कांच से बदल दिया गया है। वीवीपेट पर्ची "छापने के बाद" लाईट जलाता है, और "पर्ची काटने से पहले" बुझा देता है !!! . मेहता जी ने निर्वाचन अधिकारी से कहा कि — क्या यह मशीन ख़राब है, क्योंकि जैसे कि मैं पहले देखता था वैसे मैं पर्ची छपते और कटते नहीं देख पा रहा हूँ ? . निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि नहीं मशीन एकदम ठीक है। लेकिन अब इसका कांच बदल दिया गया है। मेहता जी ने कहा कि, क्या मैं इसका वीडियो बना सकता हूँ ? अधिकारी ने इंकार कर दिया !! तब मेहता जी कई दिनों तक एक के बाद एक 8 डेमोंस्ट्रेशन स्टेशनों पर पहुंचे और पाया कि सभी मशीनों के कांच बदल दिए गए है। . [ तब मैं भी चुनाव लड़ रहा था और चुनाव आयोग की नामांकन प्रक्रिया में काफी उलझा हुआ था। मैंने दो बार वीवीपेट का डेमो देखने के लिए 2 दिन तक 2-2 घंटे जाया किये किन्तु मुझे इसका डेमो देखने नहीं मिला। बाद में जब मैंने इसका डेमो देखा तो पाया कि ग्लास बदल दिया गया है, और टोर्च डालने से भी अंदर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। . तब कार्यकर्ताओं ने अन्य शहरो एवं राज्यों के एक्टिविस्ट्स को भी सूचित किया कि वे वीवीपेट का डेमो देखें और वीडियो बनाए। कई शहरो में कार्यकर्ताओ ने जाकर डेमो देखा, और सब ने पाया कि ग्लास बदल दिया गया है। किन्तु किसी भी व्यक्ति को चुनाव अधिकारियो ने वीडियो नहीं बनाने दिया !! इसी दौरान जुंझुनू ( राजस्थान ) से जूरी सिस्टम के प्रत्याशी डॉ तेजपाल कटेवा जी ने डेमो देखा और वे इसका वीडियो भी लेने में सफल रहे। उन्होंने यह वीडियों सोशल मीडिया पर डाल दिया। ] . तब मेहता जी ने निर्वाचन अधिकारी से कहा कि – यदि मुझे वीवीपेट का बिट मैप कोड लिखने दिया जाए तो मैं ऐसा कोड लिख सकता हूँ कि इच्छित उम्मीदवार को मनचाहे वोट मिलेंगे लेकिन प्रत्येक मतदाता को उसी निशान की पर्ची दिखाई देगी जिसे उसने वोट दिया है। और पर्चियों को गिनने से भी पर्चियां बराबर निकलेगी। निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि वीवीपेट का बिट मेप कोड वोटिंग के 15 दिन पहले डाला जाता है, और यह हमें आगे से आता है । हम ये कोड खुद से नहीं डालते। . —————— 3. VVPAT का बिट मेप कोड क्या है ? Evm में 3 हिस्से होते है : बेलेट यूनिट : जिस पर आप बटन दबाते है। वीवीपेट : जो पर्ची छापता है। कंट्रोल यूनिट : जहाँ अंतिम रूप में वोटिंग काउंट जाता है। कृपया इस बात को नोट करें कि बेलेट यूनिट, वीवीपेट और कंट्रोल यूनिट तीनो अलग अलग डिवाइस है, और इन्हें आपस में कनेक्ट किया जाता है। ये एक ही डिवाइस नहीं है। . दूसरा बिंदु यह है कि , ये पहले से तय नहीं होता कि कितने उम्मीदवार चुनाव लड़ने वाले है और उनमे से किस उम्मीदवार को कौनसा चिन्ह एवं Evm पर कौनसा क्रम मिलने वाला है। यह सब आवंटन तो वोटिंग के 15 दिन पहले होता है। उदाहरण के लिए मेरे संसदीय क्षेत्र में 28 मई को वोटिंग थी, और मुझे चिन्ह ( प्रेशर कुकर ) का आवंटन 15 तारीख को हुआ था। 15 तारीख से पहले तब Evm को पता नहीं है कि मुझे प्रेशर कुकर मिलने वाला है, और इसीलिए Evm मशीन के पास मेरे नाम एवं चिन्ह का डेटा नहीं है। और इसीलिए Evm मशीन वीवीपेट को यह संकेत नहीं भेज सकती कि 5 नंबर का बटन दबाने पर वीवीपेट पर्ची पर प्रेशर कुकर और मेरा नाम छापेगा। . अब मान लीजिये किसी सीट पर 4 उम्मीदवारो नरेंद्र गाँधी, राहुल मोदी , अरविन्द यादव, और पिंटू सिंह ने नामांकन किया है, और जिला निर्वाचन अधिकारी ने उन्हें निम्नलिखित चिन्ह आवंटित किये है : नरेंद्र गाँधी – केला राहुल मोदी – संतरा अरविन्द यादव – अंगूर पिंटू सिंह – जामुन तो अब अंतिम सूची जारी होने के बाद जिला निर्वाचन अधिकारी उम्मीदवारों का Evm पर क्रम, उनका नाम, उनके चिन्ह आदि की सूचना निर्वाचन आयोग को भेजेगा। निर्वाचन आयोग अब उन्हें इसका बिट मेप भेजेगा। बिट मेप की कमांड वीवीपेट में डाली जायेगी ताकि बेलेट यूनिट पर जब आप पिंटू सिंह का बटन दबाए तो वीवीपेट पिंटू सिंह का नाम एवं उसके चिन्ह जामुन की पर्ची छापे। . —————- 4. कैसे VVPAT का बिट मेप लिखकर वोटो में बड़े पैमाने पर हेरा फेरी की जा सकती है ? कृपया निचे दिए गए विवरण को ध्यान से पढ़ें : . यदि वीवीपेट में बिट मैप लिखने वाला कोडर संतरा छाप उम्मीदवार को जितवाना चाहता है तो वह बिट मेप इस तरह से लिख सकता है कि, जब मतदाता A1 केले का बटन दबाएगा तो Vvpat केले की पर्ची छापेगा → लाईट जलाएगा → मतदाता A1 केले की पर्ची देखेगा → और लाईट बुझ जायेगी। इसके बाद वीवीपेट कंट्रोल यूनिट को केले का 1 वोट भेज देगा। . अब यदि अगला मतदाता A2 भी केले का बटन दबाता है तो इस बार वीवीपेट केले की पर्ची नहीं छापेगा !! हाँ, वो फिर से केले की पर्ची नहीं छापेगा !! क्योंकि उसने केले की पुरानी वाली पर्ची काटी नहीं है। उसके पास केले की वह पर्ची रोल के बाहर मौजूद है, जो उसने मतदाता A1 के लिए छापी थी , और लाईट जला कर दिखाई थी। . अत: यदि दूसरा मतदाता A2 भी केले का बटन दबाता है तो वीवीपेट लाईट जलाएगा → A2 को वही पर्ची फिर से दिखा देगा जो पर्ची उसने A1 को दिखाई थी → अब वीवीपेट लाईट फिर से बुझा देगा !! और वीवीपेट कंट्रोल यूनिट को कमांड भेजेगा कि संतरे का एक वोट बढ़ा दिया जाए !! कृपया इस बात पर ध्यान दें कि वीवीपेट ने A2 को केले की पर्ची दिखायी है, किन्तु कंट्रोल यूनिट को कमांड भेजा है कि संतरे का एक वोट बढ़ा दिया जाए। . अब यदि तीसरा वोटर A3 भी केले का बटन दबाता है तो वीवीपेट फिर से उसे वही छपी हुयी पर्ची दिखा देगा जो उसने A1 एवं A2 को दिखाई थी, और कंट्रोल यूनिट को कमांड भेजेगा कि संतरे का वोट बढ़ा दिया जाए !!! . और अब यदि मतदाता B1 आता है और संतरे का बटन दबाता है तो वीवीपेट केले वाली पर्ची काट कर गिरा देगा और संतरे की पर्ची छाप कर B1 को दिखाएगा। और अब वीवीपेट बिना लाईट जलाए 2 अतिरिक्त पर्चिया संतरे की छापेगा और डब्बे में गिरा देगा !! ( ताकि डिब्बे में पर्चियों की काउंटिंग का साम्य बनाया जा सके ) . तो VVPAT को बिट मेप के कोड में यदि कमांड दी जाए तो वह इस तरह बर्ताव करेगा। . (1) जितनी बार संतरे का बटन दबाया जाएगा उतनी बार वह संतरे की ही पर्ची छापेगा और काट कर डब्बे में गिराता जाएगा। . (2) यदि पहला वोटर केले का बटन दबाता है तो वीवीपेट केले की पर्ची छापकर दिखाएगा। . (3) यदि अगला ( यानी दुसरे नंबर का ) वोटर भी फिर से केले का बटन दबाता है तो वीवीपेट केले की पर्ची नहीं छापेगा बल्कि लाईट जलाकर पहले से छपी हुयी पर्ची ही दिखा देगा, और बिना पर्ची काटे लाईट बुझा देगा। . (4) यदि तीसरा वोटर फिर से केले का बटन दबाता है तो फिर से लाईट जलाकर उसे वही पर्ची दिखा देगा, जो उसने पहले और दुसरे वोटर को दिखाई थी। (4.1) यदि चौथा वोटर संतरे का बटन दबाता है तो वीवीपेट केले की वह एक पर्ची काटकर डिब्बे में गिरा देगा जो उसने पहले, दुसरे और तीसरे वोटर को दिखाई थी। (4.2) अब वह संतरे की पर्ची छापकर चौथे वोटर को दिखायेगा और लाईट बुझा देगा । (4.3) लाईट बुझाने के बाद पर्चियों की काउंटिंग पूरी करने के लिए वीवीपेट दो अतिरिक्त संतरे की पर्चियां छापेगा, और डिब्बे में गिरा देगा । (5) लेकिन यदि चौथा वोटर भी फिर से केला दबाता है तो अबकी बार वीवीपेट वोट नहीं चुराएगा। क्योंकि उसे सिर्फ दूसरा एवं तीसरा वोट चुराने की कमांड दी गयी है। तो इस बार वह केले की पर्ची छापेगा और साथ में 2 पर्चियां और भी केले की छाप कर 4 पर्चियां केले की डिब्बे में गिरा देगा। मतलब वीवीपेट सिर्फ दूसरा एवं तीसरा वोट ही चुराएगा। यदि निरंतर केले का बटन दबाया जा रहा है तो वह वोट चुराना बंद कर देगा और एक भी वोट नहीं चुराएगा। तो VVPAT की कोडिंग की सिक्वेंस इस तरह होगी : A1केला → A2केला → A3केला → B1संतरा के क्रम में वोटिंग होती है तो पहला वोट केले को जाएगा, किन्तु बाद के दो वोट संतरे को जायेंगे। लेकिन A2 एवं A3 पर्ची केले की ही देखेंगे। और चूंकि वीवीपेट दो अतिरिक्त पर्ची संतरे की छाप कर डिब्बे भी गिराता है अत: पर्चियां भी बराबर निकेलेगी। मतलब कंट्रोल यूनिट में भी 1 केला एवं 3 संतरा का काउंट आएगा और वीवीपेट के डिब्बे में भी 1 पर्ची केले की और 3 पर्चियां संतरे की निकलेगी। और कमाल की बात यह है कि जब आप वोटर से पूछेंगे तो 3 वोटर कहेंगे कि हाँ हमने केला दबाया था और हमने केले की ही पर्ची देखी थी !!! A1केला, B1संतरा, A2 केला, B2संतरा....... केला, संतरा, जामुन, अंगूर, संतरा, केला, जामुन के क्रम में वोटिंग होगी तो वीवीपेट कोई वोट नहीं चुरा सकेगा। क्योंकि वीवीपेट को हर बार नयी पर्ची छापनी होगी। यदि केला1 , केला2 , केला3 , केला4 ....... केला7 या जामुन1 , जामुन2 , जामुन3 , जामुन4, ..... जामुन7 के क्रम में वोटिंग होगी तो भी वीवीपेट कोई वोट नहीं चुराएगा। क्योंकि वीवीपेट सिर्फ दूसरा एवं तीसरा वोट ही चुराएगा। यदि किसी उम्मीदवार के पक्ष में भारी एवं निरंतर मतदान हो रहा है तो वीवीपेट वोट नही चुराएगा. क्योंकि इससे अस्वभाविक परिणाम आ सकते है। यदि संतरे को 50% से अधिक वोट मिल जाते है तो वीवीपेट वोट चुराना बंद कर देगा, और स्वभाविक वोटिंग होने देगा। दुसरे शब्दों में जो 6 आदमी दिल्ली के मुख्य निर्वाचन आयोग के दफ्तर में बैठकर सभी सीटो के बिट मेप लिखकर भेज रहे है, चुनाव के नतीजे वे ही तय करेंगे। अलबत्ता वे आपको वे पर्चियां दिखाते रहेंगे जो बटन आपने दबाया है !!! कृपया इस बात को भी नोट करें कि कोडर यह कमांड भी दे सकता है कि वीवीपेट का यह कोड तब एक्टिव होगा जब किसी मशीन पर 50 वोट डाले जा चुके होंगे। मलतब जब वोटिंग से पहले मशीन चेक करने के लिए सेम्पल वोटिंग की जायेगी तो कंट्रोल यूनिट सही पर्ची काटेगी और सही संकेत ही कंट्रोल यूनिट को भेजेगी !!! . सार यह है कि -- वीवीपेट का कोड केंचुआ के दिल्ली के दफ्तर में बैठे 4 इंजीनियर्स लिखते है, और ये लोग जैसा कोड लिखेंगे नतीजे वैसे ही आयेंगे !! और इस गड़बड़ी को कभी भी साबित नहीं किया जा सकेगा !!! . ——————- . 5. तो मेहता जी ने निर्वाचन अधिकारी से कहा कि, यदि वीवीपेट का बिट मेप मुझे लिखने दिया जाए तो मैं ऐसा बिट मेप लिख सकता हूँ कि आप अगर केले का बटन दबायेंगे तो वीवीपेट पर भी आप केले की पर्ची देखेंगे, किन्तु कंट्रोल यूनिट में वोट संतरे को जाएगा , और यदि आप पर्चियां गिनेंगे तो वे भी बराबर निकलेगी !! मतलब उसी हिसाब से निकलेगी जितने वोट कंट्रोल यूनिट में है !! . चुनाव आयोग ने उन्हें वीवीपेट दिखाने से इंकार कर दिया। मेहता जी ने उनसे कहा कि यदि मुझे 12 घंटे के लिए एक वीवीपेट दे दी जाए तो मैं आपको इसका डेमो देकर दिखा सकता हूँ । निर्वाचन अधिकारी ने इनकार कर दिया। निर्वाचन अधिकारी का कहना था कि वीवीपेट पूरी तरह से सुरक्षित है, और जो भी आप कह रहे हो वह बकवास है !! मेहता जी ने लिखित में उन्हें अर्जी दी कि मुझे एक वीवीपेट दी जाए ताकि मैं यह करके दिखा सकू। निर्वाचन अधिकारी ने इनकार कर दिया !! . तब मेहता जी ने तारीख 7 अप्रेल 2019 को गुजरात के लीडिंग गुजराती दैनिक “गुजरात समाचार” के मुख्य पृष्ठ पर एक विज्ञापन दिया , जिसमे उन्होंने लिखा कि — " जो भी व्यक्ति VVPAT का कोड लिखेगा, वह चुनावी नतीजे तय करेगा। और यदि मुझे VVPAT दी जाए तो मैं ऐसा कर के दिखा सकता हूँ !! " . विज्ञापन का लिंक : . बदले में केंचुआ ने उन्हें नोटिस जारी किया कि आप एक संवैधानिक संस्था पर आरोप लगाकर मतदाताओं को भ्रमित कर रहे हो, अत: अपने खर्चे पर फिर से एक विज्ञापन लगाओ कि – आपका दावा मनगड़ंत है.. नोटिस का हिन्दी अनुवाद : “गुजरात समाचार” समाचार पत्र में, ता. 07/04/2019 को, “ राइट टू रिकॉल पार्टी ” नाम के तहत “शीर्ष के 4-5 प्रोग्रामर के लिए लाखों ईवीएम में वोट बदलना संभव !! कैसे ? और उपाय ?” इस हैडलाइन से मनमानी चीज़े बताए हुए पर्याप्त सबूत के बिना प्रथम नजर से ही जाली (भ्रामक) विज्ञापन दिया गया है, उस संबंध में आपको निम्नलिखित नोटिस दिया जाता है : यह कि, आप अच्छी तरह से जानते है कि यानी चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 से प्राप्त हुए अधिकारों और संसद द्वारा निर्मित R.P.Act-1951 और चुनाव प्रबंधन नियमों के अधीन काम करने वाला संगठन है। दुनिया का सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के चुनाव स्वतंत्र और न्यायिक तरीके से हो, इस तरह से चुनाव आयोग काम करता है। वर्ष 1999 से ई.वी.एम द्वारा चुनाव प्रक्रिया हो रही है, और इस तरह चुनाव आयोग के अधीन EVM द्वारा हो रही चुनाव प्रक्रिया में अविश्वश्नियता का एक भी किस्सा साबित नहीं हुआ है, और इस वजह से EVM का नि-संदेह बेहतरीन ट्रेक रिकॉर्ड रहा है। आपकी पार्टी और नाम का उल्लेख सहित दिनांक 07.04.2019 को “गुजरात समाचार” दैनिक समाचार पत्र में चुनावी विज्ञापन ऊपर वर्णित शीर्षक से प्रसिद्ध किया गया है और इसमें चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर मनगडंत आरोप लगाया गया है। जिसके कारण साधारण मतदाता का निरर्थक भ्रमित होना संभव है, और आपकी इस कोशिश से अब तक के निष्कलंक चुनाव प्रक्रिया को बिना प्रमाण दूषित करने की कोशिश की जा रही है। लोकसभा की आम चुनाव प्रक्रिया वर्तमान में जारी है। चुनाव आयोग की देखरेख में हमारा तंत्र चुनाव का संचालन कर रहा है। आपने 06-गांधीनगर संसदीय मत विस्तार से खुद को प्रत्याशी घोषित किया है, और नामांकन के समय आपने भारत के बंधारण का ''अनुच्छेद -84- (ए)'' के अनुसार भारत का संविधान और संविधान से स्थापित भारत की एकता और सप्रभुता की विश्वास की सौगंध उठायी है। फिर भी भारत की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था भारत के चुनाव आयोग द्वारा स्थापित कार्यप्रणाली के प्रति आधार विहीन टिप्पणी और भ्रामक विज्ञापन देकर चुनाव आयोग को कोई भी प्रमाण ( proof ) दिए बिना दुषित करने का प्रयत्न किया है। इस परिस्थिति में आपके द्वारा वर्तमान पत्र में प्रसिद्ध किया गया विज्ञापन निराधार आरोप चुनाव प्रक्रिया को आशंकित और विषयुक्त बना सकता है, ऐसा हमारा मानना है। इसलिए आपके द्वारा प्रसिद्ध हुए “चुनाव विज्ञापन” के संदर्भ में आप प्रसिद्ध किये हुए विज्ञापन को प्रमाणित करे, ऐसा आधारशील पुरावा (proof) सहित 3-दिन में खुलासा दो या अपने दिए हुए EVM विज्ञापन के गलत होने का खुद के खर्चे से विज्ञापन देकर लोगो का संदेह दूर करने के लिए नोंध लीजिए। अन्यथा आपके सामने उचित जोग्वाई में कानूनी कार्यवाही करने की हमे मजबूरी एवं शक्ति हो उसकी नोंध लीजिये। ————- सेक्शन - B ————- 1. भारत में VVPAT क्यों लायी गयी थी ? . भारत के नेताओं को पंजे में लेने के लिए बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक भारत में Evm लेकर आये है, और इसे हैक किया जा सकता है --- यह जानकारी पहली बार मुझे सबसे पहले संघ=बीजेपी के नेताओं से 2009 में मिली थी। तब मैं संघ=बीजेपी में काम करता था, और मैंने जितना इसे समझा, मेरा Evm से भरोसा उठ गया था। यह उस दौर की बात है तब बीजेपी=संघ के नेता 2009 के चुनावी नतीजो के बाद पूरे देश में धरने दे रहे थे, और देश के नागरिको को यह बता रहे थे, कि Evm में रिमोट से वोट बदले जा सकते है और कोंग्रेस ने Evm का इस्तेमाल करके चुनाव जीता है। तब संघ की शाखाओ एवं बीजेपी की बैठको में वरिष्ठ नेताओ द्वारा हम कार्यकर्ताओ को हमेशा यही कहा जाता था कि, कोंग्रेस ने यदि Evm में हेराफेरी नहीं की होती तो हम सरकार बना लेते !! . उस समय कोंग्रेस को 210 सीट मिली थी, और इस बात को मैंने भी नोट किया था कि देश के लोगो की एनर्जी 210 सीटो के साथ मैच नहीं हो रही थी। मेरा मतलब है नतीजो के बाद माहौल देखकर लग नहीं रहा था कि कोंग्रेस को 210 सीटो के लिए लोगो ने वोट किया है !! उस समय की खबरे एवं बीजेपी=संघ के नेताओं का तब का स्टेंड आप निचे दिए गए लिंक्स पर देख सकते है : EC rejects BJP charge about EVM malfunction . BJP to show EC how EVMs can be tampered . तब लाल कृष्ण आडवाणी भारत में लगातार Evm को हटाकर बैलेट पेपर लाने की मुहीम चला रहे थे। इसी दौरान संघ=बीजेपी के सांसद GVL नरसिम्हा राव ने डेमोक्रेसी एट रिस्क नाम से एक पुस्तक लिखी जिसमे उन्होंने इस बात को स्पष्ट किया कि Evm के रहते लोकतंत्र एक फ्रोड है !! इस पुस्तक का आमुख आडवाणी जी ने लिखा था। हालांकि संघ=बीजेपी के अन्य नेताओं की तरह ही आजकल ये भी Evm के समर्थन में है !! . तब मेहता जी और इंजीनियर श्री हरि प्रसाद जी भी Evm को कैसे हैक किया जा सकता है, दर्शाने को लेकर काम कर रहे थे। किंतु सबसे बड़ी समस्या थी कि केंचुआ अवलोकन के लिए Evm देने को राजी नहीं था। और जब तक इंजीनियर्स के हाथ में मशीन नहीं लगे तब तक मतदाताओ को यह बात समझायी नहीं जा सकती कि Evm में रिमोट से वोट बदले जा सकते है !! इन लोगो ने केंचुआ से कई बार आग्रह किया कि यदि घंटे भर के लिए Evm दी जाए तो आपके सामने ही हम इसके वोट रिमोट से चेंज करके दिखा देंगे। हम इंजीनियर है, जादूगर नहीं है। किन्तु केंचुआ ने Evm देने से इंकार कर दिया। . इसी समय मेहता जी ने इन्डियन एक्सप्रेस के मुख्य पृष्ठ पर इस आशय का विज्ञापन देने की कोशिस की कि, कैसे रिमोट से Evm के वोट बदले जा सकते है। किन्तु इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पेज पर यह विज्ञापन लगाने से इंकार कर दिया। तब उन्होंने यह विज्ञापन तीसरे पृष्ठ पर दिया। यह विज्ञापन 31 जुलाई 2009 को दिया गया था। विज्ञापन दिल्ली, मुंबई समेत कई महानगरो के एडिशन में प्रकाशित हुआ। . विज्ञापन का लिंक : . इसी समय इंजिनियर श्री हरि प्रसाद जी ने 2010 में जिला कलेक्टर कार्यालय से एक इवीएम चुराई एवं इसका डिस्प्ले बदल कर इसके वोटो को रिमोट से बदल कर दिखाया। हरि प्रसाद जी का यह वीडियो उन्होंने यू ट्यूब पर अपलोड किया था। बदले में चुनाव आयोग ने श्री हरि प्रसाद पर काफी मुकदमे डलवाकर उन्हें फिट कर दिया। उनकी कम्पनी के कर्मचारियों का उत्पीड़न किया गया और उन पर भी मुकदमे डाले गए !! . श्री हरि प्रसाद जी द्वारा बनाया गया वीडियो यहाँ देखें - India's EVMs are Vulnerable to Fraud ( इस वीडियो के क्रेडिट में श्री राहुल मेहता जी एवं GVL नरसिम्हा राव का नाम भी देखा जा सकता है ) . तो इतना सब काण्ड होने के कारण यह बात कॉमन नोलेज में आने लगी थी कि Evm विश्वसनीय नहीं है। लेकिन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक Evm हटाना नहीं चाहते थे। क्योंकि इसे हटाने के बाद नेताओ की नस दबाकर रखने का एक महत्तव्पूर्ण हथियार उनके हाथ से निकल जाएगा। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक भारत की सभी पार्टियों एवं नेताओं को दो चीजो से कंट्रोल में रखते है - (1) मीडिया व (2) Evm . मेक ओवर करने के लिए पहले चरण में चुनाव आयोग ने हर साल इवीएम चलेंज आयोजित करना शुरू किया जिसमे वह कहता है कि आकर Evm हैक करके दिखाओ। लेकिन चूंकि केंचुआ Evm किसी को भी छूने नहीं देता इसीलिए चुनाव आयोग के चेलेंज में कोई इंजिनियर नहीं जाता। और यह बात स्पष्ट है कि बिना खोले इसे हेक नहीं किया जा सकता। . कृपया पाठक इस बात को नोट करे कि किसी भी व्यक्ति को इवीएम के साथ छेड़खानी करने का अवसर नहीं मिले तो इसे हेक नहीं किया जा सकता। इसे सिर्फ एक ही शर्त पर किया जा सकता है कि हेकर को इसे खोलने का अवसर मिले। तो केंचुआ किसी भी व्यक्ति को Evm छूने नहीं देता और अगले दिन सभी अखबारों में बड़े बड़े अक्षरों में खबर लगवा देता है कि कोई भी इंजीनियर Evm को हैक करके नहीं दिखा सका !!! . मेरा पाठक से आग्रह है कि कृपया ऊपर दिए गए पेरेग्राफ को दुबारा पढ़े और ध्यान से पढ़ें। इससे आपको पेड मीडिया की ताकत का अंदाजा होगा। केंचुआ और पेड मीडिया ने पिछले 20 साल से सिर्फ एक गलत वाक्य का इस्तेमाल करके देश के 90 करोड़ मतदाताओ को बेवकूफ बना के रखा है। और केंचुआ यह अधुरा वाक्य हजारों बार दोहराता है। . उसका अधुरा और गलत वाक्य है — Evm को हैक नहीं किया जा सकता !! ( यह झूठी बात है ) जबकि सही वाक्य है — Evm को बिना छुए हैक नहीं किया जा सकता !!! ( यह सही बात है ) . केंचुआ इतना भ्रष्ट और चालाक है कि वह हर साल Evm चेलेंज आयोजित करता है, किन्तु इंजीनियर्स को Evm छूने नहीं देता। लेकिन केंचुआ और पेड मीडिया अगले दिन यह बात छापते है कि कोई भी इंजीनियर इसे हैक करके नहीं दिखा सका !! जबकि कोई इंजीनियर वहां जाता ही नहीं है !! . ऊपर मैंने दो कार्यकर्ताओ के विवरण दिए है। ये पिछले 15 साल से केंचुआ से Evm मांग रहे है। इनका कहना है कि हमें आप 2 घंटे के लिए लाइव Evm / Vvpat दे दो। हम इसे लाइव ही हैक करके दिखा देंगे !! और जब केंचुआ इन्हें Evm नहीं देता तो ये इसे चुराते है, और बदले में केंचुआ इन्हें खामोश कर देता है !! और ये लोग कोई परचून की दूकान नहीं चलाते है !! इंजीनियर्स है। और मेहता जी ने IIT दिल्ली से कम्प्यूटर साइंस से तब इंजीनियरिंग की थी, जब भारत में कम्प्यूटर इक्का दुक्का हुआ करते थे। केंचुआ जानता है कि इन लोगो के हाथ में Evm दे दी गयी तो ये इसे हैक कर देंगे। . मेरा बिंदु है कि, जो इंसान Evm / Vvpat का कोड लिखेगा Evm / Vvpat उसी के हिसाब से नतीजे देगी। Evm / Vvpat का कोड केंचुआ लिखता है !! मतलब यदि केंचुआ और उसके सभी अधिकारी 100% ईमानदार है तो Evm सेफ है वर्ना नहीं है !! . और फिर आप सोशल मीडिया में आप ऐसे लोगो को बेहद बुद्धिमता पूर्ण डिबेट करते देखते है कि Evm सुरक्षित है !! कैसे सुरक्षित है ? क्योंकि उन्होंने यह अख़बार में पढ़ा है !!! . Anti-Evm एक्टिविस्ट्स ने मतदाताओं तक यह जानकारी पहुंचानी जारी रखी कि केंचुआ मतदाताओ को अखबारों-टीवी के माध्यम से भ्रमित कर रहा है कि Evm को हैक नहीं किया जा सकता। सोशल मीडिया के ताकतवर हो जाने के कारण कार्यकर्ताओ की बात ज्यादा तेजी से मतदाताओं तक जा रही थी। चूंकि केंचुआ मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए मीडिया का इस्तेमाल कर रहा था, इसीलिए अखबारों में भी यह बात आना जरुरी था कि केंचुआ का Evm चेलेंज एक ढकोसला है। . नवम्बर 2012 में मेहता जी ने Anti-Evm पर फिर से विज्ञापन दिया। यह विज्ञापन गुजरात समाचार के मुख्य पृष्ठ पर दिया गया था। विज्ञापनो का जिक्र इसीलिए किया जा रहा है, क्योंकि कोरा-फेसबुक पर लिखने का पैसा नहीं लगता, किन्तु इस स्तर के एक विज्ञापन पर लाखों का खर्च आता है। और विज्ञापन सिर्फ तब ही लगाए जाते है जब सूचना की गंभीरता एवं विश्वसनीयता का स्तर इतना उच्च हो कि लाखों रूपये इस पर खर्च किये जा सके। . link -- . तो 12 साल की इतनी सब उठा पटक के बाद छोटे छोटे कार्यकर्ता नागरिको के सामने यह स्थापित करने में कामयाब रहे कि केंचुआ पूरे देश को Evm के माध्यम से पूरे देश के मतदाताओं से झूठ बोल रहा है। कृपया पाठक इस बात को नोट करें कि सरकार जब भी कोई सांकेतिक सकारात्मक बदलाव लाती है तो इसके पीछे हमेशा कई सारे छोटे छोटे कार्यकर्ताओ के प्रयास होते है। ऐसे कार्यकर्ता जो मीडिया के चपेट में नहीं रहते और इस बात को जानते है कि असली लड़ाई मीडिया के साथ ही है, और ब्रांडेड नेता, सरकारे आदि मीडिया की कठपुतली एवं प्रोडक्ट से ज्यादा कुछ नहीं है । . तब मतदाताओ को और भी बुत्ता देने के लिए केंचुआ 2012 में VVPAT लेकर आया। केंचुआ को यह बात पता थी कि देश के काफी सारे एक्टिविस्ट्स Evm के पीछे लगे हुए है, अत: उसने प्राथमिक डिजाइन में कांच नहीं लगाया। फिर 3 साल बाद इसमें कांच लगाया। लेकिन तब भी मतदाता पर्ची कटते और और छपते देखता था। फिर इसे ब्लेक कांच से बदला। इस ब्लेक कांच में टोर्च की लाईट डालने से अंदर का कुछ कुछ दिखाई देता था। और फिर लोकसभा चुनावों के पहले केंचुआ ने ब्लेक कांच को अंधे कांच से बदल दिया !!! one way कांच लगाने का क्या प्रभाव हुआ है यह ऊपर लिखा जा चुका है। . तो वीवीपेट की यह लड़ाई अब शुरू हुयी है, और अगले चुनावों तक anti-evm कार्यकर्ताओ को यह प्रयास करने चाहिए कि वे वीवीपेट के फ्रोड की सूचना ज्यादा से ज्यादा मतदाताओ तक पहुंचाए। पेड मीडिया की चपेट में होने के कारण किसी मतदाता को यह बात लिखकर या बोलकर समझाना काफी मुश्किल है, अत: कार्यकर्ताओ को सभी मतदाताओ को यह सूचना देनी चाहिए कि आगामी चुनावों में जब भी वे वोट करने जाए तो इस बात को नोटिस करें कि उन्होंने वीवीपेट में पर्ची छपते या कटते देखी है या नहीं । जब वोटर खुद अपनी आँखों से इसे देखेगा तो स्वयं ही समझ जायेगा। वर्ना पेड मीडिया की गिरफ्त में रहने वाले किसी व्यक्ति को 1000 पेज लिखकर भी यह बात समझाई नहीं जा सकती। . ———— . Evm के कारण बूथ स्तर के आंकड़े सामने आने लगे जिससे तुष्टिकरण एवं बदला भंजाने की राजनीती शुरू हुयी !! . भारत में EVM का प्रयोग 1988 में उपचुनाव के दौरान प्रायोगिक तौर पे शुरू किया गया ,1996 के लोकसभा चुनावों में 12 सीट पर EVM के माध्यम से चुनाव हुए । ये वाजपेयी थे जिन्होंने बड़े पैमाने पर EVM के इस्तेमाल की वकालत की, फलस्वरूप 1998 के आम चुनाव में सभी 543 लोकसभा सीट पर EVM के माध्यम से मतदान हुआ । . 1998 से पहले मतपत्रो के माध्यम से वोटिंग होती थी। गणना के दौरान अक्रमत: ढंग से किन्ही 3 मत पेटियों के मतपत्रो को मिलाने के उपरांत गणना की जाती थी । इस विधि से की गयी गणना से बूथ वाईज़ वोटिंग को चिन्हित करना मुमकिन नहीं था । लेकिन EVM के आने से स्थिति पलट गयी । . अब चूंकि हर बूथ पर एक EVM रखी जाती है अत: हर बूथ की वोटिंग के आंकड़े चिन्हित EVM में दर्ज़ रहते है। 2010 तक चुनाव आयोग बूथ वाइज़ आँकड़े अधिकृत रूप से ज़ाहिर नहीं करता था, किन्तु अनाधिकृत रूप से सभी पार्टियों और उम्मीदवारों के पास यह आंकड़े उपलब्ध हो जाते थे। वर्ष 2010 से RTI के अधीन चुनाव आयोग ने बूथ वाइज़ आंकड़ो का खुलासा करना शुरू किया, और आंकड़े सहज उपलब्ध होने लगे। . बूथ वाइज़ आंकड़ो से अमुक पार्टी को यह सुनिश्चित जानकारी मिल जाती है कि अमुक क्षेत्र के नागरिको ने मुझे पर्याप्त मात्रा में वोट नही किया है, अत: तुष्टि करण और दमन के लिए इस पैमाने को आधार बनाया जाने लगा और राजनेतिक दलों ने कम वोट देने वाले क्षेत्रो के नागरिको से बदला भंजाना शुरू किया। . ————- सेक्शन - C ————- . 1. कोंग्रेस-बीजेपी-सपा-बसपा-आपा का Evm पर स्टेंड क्या है ? . 1998 से ही सभी बड़ी पार्टियों एवं ब्रांडेड नेताओं का एक ही स्टेंड है --- जब चुनाव हार जाओ तो मजमा बनाने के लिए Evm को कोसना शुरू करो !! और जब सत्ता में आ जाओ तो Evm का समर्थन करने लगो !! . सबूत ? . भारत में पिछले 20 साल में आज तक किसी भी बड़ी पार्टी के किसी भी सांसद ने संसद में Evm को रद्द करके बेलेट पेपर लाने के लिए बिल नहीं रखा है। केजरीवाल जी और मायावती भी Evm के खिलाफ रहे है। मायावती के पास लोकसभा में दर्जनों सांसद रहे है। और आम आदमी पार्टी के पास भी पिछली लोकसभा में 4 सांसद थे। किन्तु इनमे से किसी भी पार्टी के किसी भी सांसद ने संसद में कोई बिल नहीं रखा !! और कोंग्रेस ने भी नहीं रखा !! . 2. सोनिया जी, मोदी साहेब, केजरीवाल जी, मुलायम सिंह जी, मायावती आदि के समर्थको एवं अंध भगतो का Evm पर क्या स्टेंड है ? . नेताओं के समर्थको एवं अंध भगतो का सेपरेट कोई स्टेंड नहीं होता। जो उनके नेता का स्टेंड होता है, वही उनका स्टेंड हो जाता है। मतलब इस समय यदि आप सोनिया जी के भगतो से पूछेंगे तो वे कहेंगे कि Evm को हैक किया जा सकता है, किन्तु यही भगत 2014 से पहले तक नागरिको को यह विश्वास दिलाने में लगे रहते थे कि Evm एकदम सुरक्षित है !! अन्य नेताओं के भगतो का भी यही हिसाब है। . 3. सुप्रीम कोर्ट का Evm पर क्या स्टेंड है ? . मेरी मान्यता में भारत की सबसे भ्रष्ट संस्था सुप्रीम कोर्ट है। जजों को मैं भारत के सभी स्तर के सभी प्रकार के भ्रष्टाचार की गंगोत्री मानता हूँ। Evm पर सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज Evm के मुद्दे पर लगातार आती हुयी आपत्तियों की सुनवाई करके पिछले 20 साल से टाइम पास कर रहे है, ताकि Evm को शुरू रखा जा सके। जब भी कोई PIL दायर होती है केंचुआ सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों को जाकर कहता है कि, Evm एकदम सुरक्षित है, और सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज मान लेते है। . उन्होंने कभी भी केंचुआ को नहीं कहा कि -- आपकी Evm को अवलोकन के लिए सार्वजनिक करो और इंजीनियर्स को इसे हेक करने का अवसर दो !! भ्रष्ट केंचुआ भ्रष्ट सुप्रीम कोर्ट दोनों ही संवेधानिक
क्या आपने कभी जज को वकील के माध्यम से पैसे देकर कोई फैसला लिया है ? . जजों के भ्रष्टाचार की बात करना भारत में गैर कानूनी है। अत: इस सवाल का जवाब कोई भी आपको ठीक से नहीं देगा। . भारत में सबसे ज्यादा भ्रष्ट महकमा अदालतें है। एक तरह से अदालतें भ्रष्टाचार की गंगोत्री है। देश के सारे प्रकार के हर स्तर के भ्रष्टाचार की जड़ में भ्रष्ट जज बैठे है। जब जजों का भ्रष्टाचार नागरिको के सामने आने लगा तो सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों ने ईमानदार होने का एक बेहद सीधा और आसान तरीका निकाला। उन्होंने "न्यायपलिका की अवमानना" का कानून छापकर जजों के भ्रष्टाचार पर तबसरा करने को गैर कानूनी बना दिया। और इस तरह एक झटके में भारत के जज फ़रिश्ते बन गए !! . मेरी मान्यता है कि -- भारत की सुप्रीम कोर्ट के 90% जज भ्रष्ट एवं बिकाऊ है। शेष 10% निकम्मे है एवं उन्हें भारत की अदालतें सुधारने की कोई फ़िक्र नहीं है। हाई कोर्ट के 80% जज भ्रष्ट एवं बिकाऊ है। शेष 20% निकम्मे है, और उन्हें भारत की अदालतें सुधारने की कोई फ़िक्र नहीं है। निचली अदालतों के 70% जज भ्रष्ट एवं बिकाऊ है। और उन्हें भारत की अदालते सुधारने की कोई फ़िक्र नहीं है। . अमूमन एक कार्यकर्ता के तौर पर मैं उस व्यक्ति को सिरे से खारिज कर देता हूँ, जो जजों के भ्रष्टाचार पर अपना रूख साफ़ नहीं करता या जजों के भ्रष्टाचार पर बोलने से कतराता है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार पर बोलता है तो उसे सबसे पहले जजों के भ्रष्टाचार पर बोलना चाहिए। क्योंकि जब तक जजों का भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा तब तक किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार में कमी नहीं लायी जा सकती। . समाधान ? . जूरी सिस्टम . यदि भारत में जूरी सिस्टम लागू कर दिया जाता है तो मेरा मानना है कि सिर्फ अगले 3 महीने देश में हर प्रकार के भ्रष्टाचार में 80% तक की गिरावट आ जाएगी। जूरी सिस्टम के अलावा मैं जजों के भ्रष्टाचार का कोई समाधान नहीं देखता। हाँ , थोडा आंशिक सुधार जजों पर वोट वापसी प्रक्रियाएं लागू करके भी लाया जा सकता है। अन्य कोई मार्ग नहीं। . -------------- . मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ कि कैसे निरंकुश जजों का भ्रष्टाचार देश की बैंड बजाता है, और कैसे वोट वापसी इसमें सुधार लाता है। . 2016, कैलिफोर्निया के जज एरोन पर्सकी को नागरिको ने वोट वापसी क़ानून का प्रयोग करके निकाल दिया था। दरअसल एक 20 वर्षीय युवक ने नीम बेहोश युवती के साथ बलात्कार किया था, और नागरिको की जूरी द्वारा दोषी ठहराए जाने के बावजूद पर्सकी ने उसे सिर्फ 6 माह की सजा दी थी !! टर्नर पर जो आरोप साबित हुए थे, उनमे उसे 14 वर्ष तक की सजा दी जा सकती थी , किन्तु पर्सकी ने सिर्फ 6 माह की टोकन सजा दी !! पर्सकी 80 सालो में पहले जज थे, जिन्हें नागरिको ने वोट वापसी के अधिकार का प्रयोग करके पद से बर्खास्त कर दिया था। . California Voters Remove Judge Aaron Persky, Who Gave a 6-Month Sentence for Sexual Assault Aaron Persky, the California judge who drew national attention in 2016 when he sentenced a Stanford student to just six months in jail for sexually assaulting an unconscious woman, was recalled on Tuesday, according to The Associated Press. He is the first judge recalled in California in more than 80 years. With nearly all precincts reporting on Wednesday, just under 60 percent of voters were in favor of removing Judge Persky from the Santa Clara County Superior Court, where he had served since 2003. Cindy Hendrickson, a prosecutor, was elected to replace him. चित्र में आप इस भ्रष्ट जज को देख सकते है जो मतदान के दिन तख्ती लेकर नागरिको से अपील कर रहा था कि उसे नौकरी से निकालने के लिए वोट न करें !! . तो इस तरह वोट वापसी का प्रयोग करके अमेरिका के नागरिक नेता-पुलिस एवं जजों को चेतावनी देते रहते है, ताकि अन्य नेता-जज-अधिकारी ईमानदार बने रहे। इस कहानी में एक सबक यह भी है कि लोग सब जगह एक ही जैसे होते है। चाहे भारत हो या अमेरिका। जिसे भी आप निरंकुश ताकत देंगे, वो अपना रंग दिखाने लगेगा। जब तक उन पर डंडा तना रहेगा तब तक ही वे ठीक से काम करते है। . जजों को ईमानदार बनाए रखने का यह बेहद सरल एवं निरापद तरीका है - एक भ्रष्ट जज को दंड दो , ताकि उसका हश्र देखकर अन्य जज तमीज में काम करने लगे। . और भारत का हाल आपको मालूम ही है। सारा जोधपुर जानता है कि, सलमान ने हिरण मारे थे, और इसके भर भर के सबूत मौजूद है। और सारा मुंबई जानता है कि उस रात दारु पीकर गाड़ी दबंग खान ही चला रहा था। जिन सबूतों के आधार पर सेशन जज ने सलमान को सजा सुनाई, उन्ही सबूतो के आधार पर हाई कोर्ट जज ने सलमान को बरी कर दिया। निचोड़ यह है कि, अदालत में सबूत कोई मायने नहीं रखते। मायने यह रखता है कि क्या जज किसी सबूत को सबूत मानने को राजी है या नहीं। . सारा मामला जजो के विवेक यानी कि उन्हें दी गयी घूस पर टिका हुआ है, न कि जिरह और सबूतों पर !! भ्रष्ट जजो को नौकरी से निकालने और दंड देने की शक्ति जब तक नागरिको के पास नहीं आएगी, जज इसी तरह के काण्ड करते रहेंगे। . भारत में वोट वापसी क़ानून लाने के लिए हमें जो इबारत गेजेट में छपवाने की जरूरत है उसका प्रस्तावित ड्राफ्ट निचे दिए गए लिंक पर देखें। यदि ये इबारत गेजेट में छाप दी जाती है तो भारत के प्रत्यके नागरिक को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी और उन्हें वोट वापसी लेने का अधिकार मिल जाएगा। . प्रस्तावित वोट वापसी पासबुक
यदि पीएम जूरी कोर्ट का प्रस्तावित कानून गेजेट में छाप देता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट इसे असंवैधानिक बता कर रद्द कर देता है, तो क्या किया जा सकता है ? https://hi.quora.com/q/gtevjihzvzgehiip/जूरी-कोर्ट-शेषन-हायर-सुप्रीम-कोर्ट-में-जूरी-अदालतो-की-स्थापना . जूरी कोर्ट के प्रस्तावित क़ानून की कोई भी धारा भारतीय संविधान के किसी भी अनुच्छेद एवं भारत में लागू किसी भी क़ानून की किसी भी धारा का उलंघन नहीं करती है। यहाँ तक कि पीएम को जूरी कोर्ट गेजेट में निकालने के लिए लोकसभा की अनुमति लेने की भी जरूरत नहीं है। पीएम इस पर हस्तक्षर करके सीधे गेजेट में छाप सकता है। किन्तु यह तकनिकी बिंदु है, व्यवहारिक नहीं। . व्यवहारिक बिंदु यह है कि यदि पीएम जूरी कोर्ट गेजेट में छापता है तो सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों के पास इस क़ानून को खारिज करने की विवेकाधीन शक्ति है। और इसीलिए यह तय है कि कोई न कोई बहाना बनाकर सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज इसमें अडंगा जरुर लगायेंगे। . और तब पीएम निम्नलिखित में से कोई या क्रमिक रूप से सभी कदम उठा सकता है : . (i) पीएम गेजेट में सुप्रीम कोर्ट जज पर वोट वापसी की प्रक्रिया छापेगा। वोट वापसी आने के बाद भारत के नागरिक अमुक सुप्रीम कोर्ट जज को नौकरी से निकाल कर किसी ऐसे व्यक्ति को यह नौकरी दे देंगे जो जूरी कोर्ट क़ानून में अडंगा नहीं लगाए। (ii) यदि सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्ट जज वोट वापसी का क़ानून भी ख़ारिज कर देता है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज के खिलाफ संसद में महाभियोग लाएगा। पीएम महाभियोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को नौकरी से निकालकर अपने किसी भी वफादार को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है। (iii) यदि महाभियोग गिर जाता है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-भतीजो आदि के खिलाफ सीबीआई लगाकर उलटे सीधे मुकदमे कायम करेगा और उन्हें जेल में डाल देगा। पीएम इसके लिए लोकसभा के प्रस्ताव का इस्तेमाल करेगा। ज्ञातव्य है कि लोकसभा को यह शक्ति है कि वह देश के किसी भी व्यक्ति को बिना कोई मुकदमा चलाये जेल में डाल सकती है। और इसकी अपील अदालत में नहीं की जा सकती। (iv) पीएम गेजेट में जनमत संग्रह की प्रक्रिया छापेगा, और देश के सामने यह प्रश्न रखेगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज को नौकरी से निकाल दिया जाना चाहिए। यदि 51% मतदाता जनमत संग्रह में “हाँ” दर्ज कर देते है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को निकाल देगा। जनमत संग्रह में यदि कोई प्रस्ताव पास हो जाता है तो फिर उसे लोकसभा या राज्यसभा द्वारा रोका नहीं जा सकता। (v) यदि जनमत संग्रह के पास होने के बावजूद सांसद इसमें अडंगा करते है तो पीएम सांसदों पर वोट वापसी का क़ानून छापेगा ताकि नागरिक जूरी कोर्ट का विरोध कर रहे सांसदों को निकाल कर नए सांसद भेज सके। (vi) यदि सांसद वोट वापसी के दायरे में आने से इनकार करते है तो पीएम लोकसभा भंग करके नए चुनावो की घोषणा करेगा। नए चुनावों में वे सभी सांसद हार जायेंगे जो जूरी कोर्ट के विरोध में थे, और वे प्रत्याशी जीत कर संसद में जायेंगे जो जूरी कोर्ट के समर्थन में है। . ये सब सीधे तरीके है। इसके अलावा पीएम टेढ़े तरीको का इस्तेमाल करके भी सुप्रीम कोर्ट जज को काबू कर सकता है : . पीएम इमरजेंसी का प्रस्ताव पास करेगा, और सुप्रीम कोर्ट बंद करवा देगा। आपातकाल लगाने के बाद पीएम जीतने मर्जी उतने क़ानून छाप सकता है और सुप्रीम कोर्ट इन कानूनों का रिव्यू नहीं कर सकता। आपातकाल लगाने के बाद पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को उसके रिश्तेदारों के एनकाउन्टर वगेरह करने की धमकी भी दे सकता है। पीएम के पास पुलिस और मिलिट्री होती है। . अत: यदि पीएम बल प्रयोग करने पर आये तो सुप्रीम कोर्ट जज को 2 मिनिट में ठिकाने कर सकता है। हालांकि मेरे विचार में पीएम को आपातकाल लगाकर इस तरह की हिंसात्मक कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है, और न ही उसे इस दिशा में कदम उठाना चाहिए। ऐसे कई सीधे और कानूनी तरीके मौजूद है जिनका इस्तेमाल करके पीएम लोकतान्त्रिक तरीके से सुप्रीम कोर्ट जज को चित कर सकता है। . यदि पीएम लोकतान्त्रिक तरीके से यह स्थापित कर देता है कि, सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्ट जज नागरिको के बहुमत की मंशा के खिलाफ जा रहा है तो अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी(*) सक्रीय होकर सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज से मुलाक़ात करने को तत्पर हो जायेंगे। और इससे पहले कि अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी सुप्रीम कोर्ट जज से मुलाक़ात करें सुप्रीम कोर्ट जज या तो इस्तीफा दे देगा या फिर जूरी कोर्ट में अडंगा लगाना बंद कर देगा। . तो मेरे विचार में सही तरीका यह है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज जूरी कोर्ट क़ानून में अडंगा लगाते है तो पीएम इस स्थिति को लोकतान्त्रिक तरीके से निपटाए, बल प्रयोग से नहीं। . (*) अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी लोकतंत्र के रक्षक है। जब सत्ता में बैठा कोई व्यक्ति स्पष्ट बहुमत के खिलाफ जाता है तो जिन भी लोगो में अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी का अंश है वे लोकतन्त्र की पुनर्स्थापना के लिए आवश्यक कदम उठाते है। यहाँ इस बात पर ध्यान देना जरुरी है कि अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी अपने विवेक से सही गलत का फैसला नहीं करते। वे बस लोकतान्त्रिक मूल्यों का पालन करते है। अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह जी, अहिंसामूर्ती महात्मा मदन लाल जी धींगरा, अहिंसामूर्ती महात्मा चंद्रशेखर आजाद आदि उधम सिंह जी के ही प्रकार थे, और गोरो द्वारा लोकतंत्र की अवहेलना किये जाने के कारण वे अपने अपने तरीके से विभिन्न परिस्थितियों में गोरो से मुलाक़ात करते रहते थे। . --------- . काम की बात : लोकतान्त्रिक तरीके से पीएम सिर्फ तभी आगे बढ़ पायेगा जब कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग जूरी कोर्ट क़ानून का समर्थन करें। यदि देश के नागरिको को जूरी कोर्ट के क़ानून के बारे में कोई जानकारी नहीं है, और न ही कार्यकर्ताओ में इस क़ानून का समर्थन मौजूद है, तो पीएम को जनता का समर्थन नहीं मिलेगा, और पीएम सुप्रीम कोर्ट जज के आगे टिक नहीं पायेगा। . वजह यह है कि सुप्रीम कोर्ट जज को पेड मीडिया के प्रायोजको का समर्थन प्राप्त है। अत: जब सुप्रीम कोर्ट जज जूरी कोर्ट को ख़ारिज करेगा तो देश के सभी मीडिया हाउस, सभी पेड मीडिया पार्टियाँ एवं उनके नेता, सभी सांसद, सभी पेड बुद्धिजीवी, सभी पेड संविधान विशेषग्य, सभी पेड कलाकार आदि सुप्रीम कोर्ट जज के पक्ष में एवं जूरी कोर्ट केविरोध में खड़े हो जायेंगे। . आम असूचित नागरिक पेड मीडिया द्वारा संचालित इस गिरोह की चपेट में आकर पीएम के कदम का विरोध करना शुरू कर देंगे, या कम से कम पीएम का समर्थन नहीं करेंगे। ऐसी स्थिति में पीएम इस गिरोह से निपट नहीं सकता। पीएम इस गैंग से सिर्फ तब निपट सकता है जब पीएम को कम से कम 8 से 10 लाख ऐसे कार्यकर्ताओ का समर्थन हासिल हो, जो जूरी कोर्ट के ड्राफ्ट के समर्थन में है, और पेड मीडिया की गिरफ्त से बाहर है। . सार यह है कि, जूरी कोर्ट जैसा क़ानून पीएम के चाहने भर से रातों रात देश में लागू नहीं किया जा सकता। इसका सिर्फ एक रूट यह है कि बिना पेड मीडिया की सहायता के भारत में कम से कम 10 लाख कार्यकर्ताओ को जूरी कोर्ट क़ानून का समर्थन करने के लिए तैयार किया जाए। और 10 लाख कार्यकर्ताओं तक पहुँचने के लिए कम से कम 10 करोड़ नागरिको तक जूरी कोर्ट ड्राफ्ट की जानकारी पहुंचानी होगी। वो भी पेड मीडिया के बिना। जाहिर है, यह काफी दुरूह एवं लम्बी प्रक्रिया है। यह काम तब और भी चुनौतीपूर्ण बन जाता है, जब पेड मीडिया के प्रायोजक जूरी ट्रायल के बारे में गलत एवं अधूरी सूचनाएं देकर लोगो को लगातार भ्रमित करते रहने वाले है। . जूरी कोर्ट जैसे क़ानून को गेजेट में छपवाने की प्रक्रिया के बारे में विस्तृत विवरण मैंने इस जवाब में दिया है। इसे पढ़े -- Pawan Kumar Sharma का जवाब - क्या भारत सुपर पावर बन सकता है? कैसे और कब? नागरिकों की क्या भूमिका होनी चाहिए? . मेरा मानना है कि, जूरी ट्रायल मानव जाति द्वारा खोजा गया एक मात्र लंगर है जो सरकार को संविधान एवं इसके सिद्धांतो का पालन करने के लिए सफलतापूर्वक बाध्य कर सकता है - थॉमस जेफरसन ( अमेरिकी स्वतंत्रता के घोषणा पत्र के लेखक ) . -----------
अमेरिका अपना नुकसान की भरपाई भारत को युद्ध में धकेलने से करवा रहा हैं.. भारत के मोदी राहुल केजरीवाल तीनों अमेरिका के सामने घुटने टेक चूके हैं.. जनता के पास बचने का समाधान फिलहाल यही हैं की जितना जल्दी हो सके EVM की जगह चुनाव बैलेट पेपर से होने चाहिए | क्योंकि तीनों की चोटी us uk धनिको के पास हैं क्योंकि पेड मिडिया के स्पोंसर वही हैं.. यदि भारत की जनता अमेरिका जैसे वोटवापसी सिस्टम, जूरी कोर्ट, बैलेट पेपर चुनाव, जनमत संग्रह, हथियारबंद नागरिक समाज क़ानून लागु करवाने के लिए PM, CM पर दबाव बनाने चाहिए | #CancelEVM #VotvapsiPassbook #JuryCourt #TCP #Gunlawreferndum #GunLawIndia #CoorgGunLawReferendum
क्या हम भारत में चीनी उत्पादों से छुटकारा पा सकते हैं? . चीन की सेना भारत की सेना से कई गुना ज्यादा ताकतवर है, अत: हम चीनी उत्पादों से बच नहीं सकते। यदि हम अपनी सेना को चीन से ज्यादा ताकतवर बना ले तो हम चीन के बढ़ते नियंत्रण से छुटकारा पा सकते है। किन्तु तब अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियां हमारी पूरी अर्थव्यवस्था को टेक ओवर कर लेगी। और यदि हमें अमेरिकी-ब्रिटिश से बचना है तो यह जरुरी है कि हमारी सेना अमेरिका के बराबर ताकतवर हो। . इस जवाब में मैंने ज्यादातर चीन के बढ़ते हुए नियंत्रण के बारे में बताया है, इसके समाधान के बारे में मैं फिर किसी जवाब में लिखा जाएगा। . -------- . (0) चीन का नियंत्रण भारत में क्यों बढ़ रहा है ? . (A) चीन के पास बड़े पैमाने पर तकनिकी उत्पादन करने का आधार है, जिसकी वजह से वे ऐसी वस्तुएं बनाते है, जो भारत नहीं बना पाता। और इसीलिए चीन से हमें ये वस्तुएं लेनी पड़ती है। यदि भारत को चीनी उत्पादों से छुटकारा पाना है तो गेजेट में ऐसे क़ानून छापने होंगे जिससे हम भारत में स्वदेशी तकनिकी उत्पादन बढ़ा सके। . अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियां बेहद उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाती है, और भारत के विशाल मध्य वर्ग के लिए यह काफी महंगे है। अत: हम सस्ते और चिल्लर तकनिकी उत्पादो के लिए चीन पर निर्भर होते जा रहे है। या तो खुद बनाओ या चीन से लो। दूसरा कोई रास्ता नहीं है। चीनी वस्तुओ का बहिष्कार करना इतना बकवास रास्ता है कि मैं इस पर बात करके भी अपना टाइम जाया नहीं करना चाहता। . (B) लेकिन सिर्फ तकनिकी उत्पादन करने से भी हम चीनी सामान से छुटकारा नहीं पा सकते। इसके लिए यह जरुरी है कि हमारी सेना चीन का मुकाबला करने में आत्मनिर्भर हो। मतलब यदि चीन के मोबाईल रोकने है तो सिर्फ चीन से बेहतर मोबाईल बनाकर हम उन्हें नहीं रोक सकते। इसके लिए हमें चीन से अच्छे फाइटर प्लेन बनाने होंगे !! हम चीन से बेहतर फाइटर प्लेन बनेंगे तो चीन के मोबाईल रुकेंगे। वर्ना नहीं। . भारत की सेना कमजोर होने के कारण चीन भारत पर उन कानूनों को गेजेट में छापने के लिए दबाव बनाता है जिससे चीन का भारत की अर्थव्यवस्था में नियंत्रण बढे। और इस तरह का दबाव सैन्य ताकत द्वारा बनाया जाता है। अन्तराष्ट्रीय मामलों में कोई कूटनीति वगेरह नहीं होती है। ये परले दर्जे की बकवास है, जिसे पेड मीडिया एवं पेड रक्षा विशेषज्ञों द्वारा नागरिको की आँखों में धुल झोंकने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सारी कूटनीति बातें सीधे लफ्जो में होती है। . उदाहरण के लिए, चीनी आकर सीधे यह कहते है कि हमें भारत के अमुक ट्रेन ट्रेक पर रेल चलाने के ठेके दो, इतने उतने कर मुक्त सेज दो, वर्ना हम अपनी सेना भारत की सीमा में घुसा देंगे। अब यदि भारत उनकी बात मान जाता है तो कूटनीति सफल है, और भारत अपनी अर्थव्यवस्था के क्षेत्र चीनियों के हवाले कर देगा। यदि भारत टालता रहता है तो शी जिनपिंग भारत की सीमा में सेना घुसाना शुरू करेंगे। जैसे ही 5 किलोमीटर सेना अन्दर घुसेगी भारत उनकी मांगे मान लेगा और सेना लौट जाएगी। बस यही विदेश नीति है। . और फिर समाधान की गलत दिशा में धकलने के लिए पेड मीडिया एवं आई टी सेल को चीनी आयटमो का बहिष्कार करने के लिए कैम्पेन चलाने के लिए कह दिया जाता है। कार्यकर्ता इस बात को समझ नहीं पाते कि चीनी भारत सरकार के जरिये घुस रहे है, तो इस तरह के फर्जी बहिस्कार कैम्पेन से चीनियों को रोका नहीं जा सकता। . ——— . निचे कुछ उदाहरण दिए है जिससे आप जान सकते है कि चीनी आयटमो के इस तरह के फर्जी बहिष्कार कैम्पेन किस तरह चीनियों के लिए कवर का काम करते है, और वे सरकार को बाध्य करके किस तरह भारत में तथा भारत की सीमओं पर अपना नियंत्रण बढाते जा रहे है : . (1) इंडस्ट्रियल पार्क एवं सेज : 2014 में मोदी साहेब के पीएम बनने के बाद शी जिनपिंग पहली बार मोदी साहेब से मिलने भारत आये थे। और जब वे भारत आये तो अपनी सेना साथ लेकर आये। जैसे ही शी ने अहमदाबाद में लेंड किया वैसे ही चीन की सेना ने भारत में घुसना शुरू किया। . चीनी दो मोर्चो पर भारत की सीमा में 5 किलोमीटर तक अन्दर घुस आये। भारत ने चीन को 5 इंडस्ट्रियल पार्क, सेज और हाई स्पीड ट्रेन चलाने के ठेके दिए। डील होने के बाद जब शी जिनपिंग भारत से निकल गए तब चीन की सेना ने भारत छोड़ा !!! और जब शी जिनपिंग भारत आये तो इससे पहले उन्होंने अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करने वाले बयान दिए व अरुणाचल प्रदेश को चीन के नक़्शे में भी दिखाया !!! . यह खबर पढ़ें - China's President Talks Trade in India as Troops Face Off at Border . 1.1. और ये इंडस्ट्रियल पार्क एवं सेज क्या है ? . इनका आकार 100 एकड़ से 1000 एकड़ होगा, इन चाइनीज़ पार्को में यातायात, परिवहन, बिजली, पानी आदि के लिए चाइनीज़ नियम लागू होंगे। लेबर लॉ, PF लॉ, LBT , कस्टम, जीएसटी आदि टेक्स इन पर या तो इन पर लागू नही होंगे या फिर इन्हें कई प्रकार की छूटें मिलेगी। इन कम्पनियों को 30% आयकर भी नही देना होगा। हमारी देशी कम्पनियो को ये सब टेक्स चुकाने होंगे और वो लागत बढ़ने से मार्केट से बाहर हो जायेगी। चाइनीज़ हमारे यहाँ का कच्चा माल और सस्ता लेबर उपयोग कर के भारत के बाज़ार में अकल्पनीय माल डंप कर देंगे और उन्हें भारी मुनाफा होगा । . 1.2. और हमें इस मुनाफे के बदले में डॉलर भी चुकाने होंगे !!! तो आप खुद अंदाजा लगा सकते है कि जब सरकार चीनियों को 1000 एकड़ के कर मुक्त प्लाट पकड़ा रही है, ताकि वे यहाँ आकर उत्पादन करे तो आप उन्हें कैसे रोकेंगे !!! ये सेज / इंडस्ट्रियल पार्क उत्पादन इकाइयां नहीं है, बल्कि भारतीय इकाईयों के लिए क़त्ल खाने है। . सेज में एक्सपोर्ट के नाम पर ये टेक्स में छूट ले लेते है, और यह खुली हुयी बात है कि सेज इकाइयां शेल कम्पनियां खोलकर राउंड ट्रिपिंग करती है, और फर्जी एक्सपोर्ट दिखाती है। चीनियों के पास काफी डॉलर है। वे भारत में आने बाद हमारे मंत्रियो को घूस देकर और भी ऐसे क़ानून छपवाएंगे जिससे भारत की स्थानीय इकाइयां और भी बर्बाद हो जायेगी। और समस्या यह है कि भारत के कार्यकर्ता नेताओं के भाषण सुनते है, लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं देते कि उनके नेता गेजेट में क्या क़ानून छाप रहे है !! . 1.3. 2014 में एग्रीमेंट हुआ था, और फिर आगे की प्रक्रिया शुरू हुयी। बीच में भारत की तरफ से काम में रुकावटें डाली जाने लगी तो 2017 में चीन ने फिर से अपनी सेना भारत में भेजकर हमारे दो बंकर नष्ट कर दिए, और मानसरोवर यात्रियों का जत्था रुकवा दिया !! . Face-off between Chinese, Indian troops in Sikkim after PLA 'transgression' - Times of India ► . 1.4. अभी चाइना ने विभिन्न राज्यों में अपने पार्क का इन्फ्रास्त्रक्चर लगाना शुरू किया है, और जल्दी ही ये कार्यशील हो जायेंगे . 2018 की खबर - Chinese investments in special economic zones in India . बीच में यदि रुकावट आई तो फिर से चीन की सेना भारत में घुसेगी !! . ———- . (2) चाइनीज रेलवे : अब चाइना की नजर भारत के हाई स्पीड रेलवे नेटवर्क पर है। चीन भारत में कई हाई स्पीड कोरिडोर्स खरीदना चाहता है, ताकि रेलवे सेक्टर को टेक ओवर कर सके। . India seeks China's help for speeding-up of Bangalore-Chennai train corridor . 2.1. चाइना कुमिंग को कलकत्ता से भी जोड़ना चाहता है। यदि चीन यह रूट हथिया लेता है तो पूर्वोतर राज्यों पर भारत की पकड़ कमजोर हो जायेगी। ट्रेन रूट द्वारा चीन भारत के बाजार को चीनी उत्पादों से पाट देगा। पेड बुद्धिजीवी इस योजना को यात्रियों की संख्या की नजर से अव्यवहारिक बता रहे है। किन्तु चीन की योजना इस रूट से भारत में बड़े पैमान पर माल डंप करने की है। . China wants to build bullet train service with India that connects Kunming and Kolkata . अब यदि आप किसी भी समझदार किस्म के पेड विशेषग्य से पूछेंगे कि, जब शी जिनपिंग भारत आते है तो अपनी सेना भी साथ ले आते है, और फिर उनके सैनिक आकर हमारे बंकर नष्ट कर देते है, तो हम उन्हें भारत में कर मुक्त सेज क्यों दे रहे है ? तो वे बहुत ही राजदाराना लहजे में आपको यह समझायेंगे कि यह कूटनीति है, तुम नहीं समझोगे !!! और फिर वे इसे विकास से भी जोड़ देंगे !! . ——— . (3) चीन का POK पर नियंत्रण : चीन ने POK स्थित झेलम नदी पर 1100 मेगावाट जो की क्षमता में दुनिया का सबसे बड़ा पॉवर प्रोजेक्ट होगा का निर्माण शुरू किया। भारत ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है क्योंकि इससे हमारी सुरक्षा को खतरा है। किन्तु 2015 में चीन ने हमारे विरोध को खारिज कर दिया !! और तो और इस प्रोजेक्ट के लिए पैसा भी उस बैंक (AIIB) से आ रहा है जिसमे हमने बिलियंस ऑफ़ डॉलर्स दे रखें है !! . China firm to build mega dam in PoK despite India's strong opposition . तो जब हमारे सम्बन्ध इतने अच्छे है कि 2014 में हम चीनियों को कर मुक्त सेज देते है, तो चीन बाँध पर भारत के ऐतराज को खारिज क्यों कर देता है ? पेड रक्षा विशेषग्य कर्हेंगे कि यह अन्तराष्ट्रीय कूटनीति है। पर मैं कहूँगा कि चीन की सेना इतनी ताकतवर हो चुकी है कि वह हमारे ऐतराज वगेरह सुनता भी नहीं है, और हमारे नेता भी जब ऐतराज दर्ज करवाते है तो उन्हें पता होता है कि वे एक रस्म पूरी कर रहे है !! . ——— . (4) तिब्बत : चीन ने तिब्बत में दुनिया का सबसे ऊँचे और बड़े बाँध का निर्माण कर लिया है। ब्रह्मपुत्र नदी पर बने इस विशालकाय बाँध से चीन 2.5 बिलियन किलो वॉट बिजली का सालाना उत्पादन करेगा। थोड़ी बहुत बिजली तिब्बत को भी मिलेगी, बाकी चीन को जायेगी। भारत इस परियोजना पर शुरू से ही एतराज जताता आ रहा था, क्योंकि इससे पूर्वोत्तर भारत की पारिस्थितिकी चीन के नियंत्रण में आ जायेगी, और चीन किसी भी समय बाँध के गेट खोलकर पूर्वोत्तर के राज्यों को जल-मग्न कर सकता है। . China operationalises biggest dam on Brahmaputra in Tibet, India worried . ——— . (5) श्रीलंका : श्रीलंका ने अपने तट का १०० हेक्टेयर का इलाका चीन को 99 साल की लिज़ पर दे दिया है। चीन वहाँ पर 1.4 बिलियन डॉलर खर्च करके अपना पोर्ट बना रहा है, और चीन ने वहाँ अपना युद्धपोत और पनडुब्बी भी तैनात की। भारत ने श्रीलंका से इस प्रोजेक्ट को नामंजूर करने को कहा तथा इसे श्रीलंका ने रोक भी दिया था। लेकिन इस प्रोजेक्ट को फिर से मंजूरी मिल गयी और काम शुरू हो गया। मोदी साहेब और अजित डोभाल साहेब ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया, जिसे श्रीलंका सरकार ने खारिज कर दिया है। . India Asked Lanka to Stop Colombo Port City Project, Says Gotabaya . ——— . (6) मालदीव भी : मालदीव ने चीन को मालदीव के टापू खरीदने और उनको विकसित करने के लिए क़ानून बनाकर अनुमति दी। अब चीन भारत और मालदीव के बीच बिखरे इन टापुओं का अधिग्रहण करके और नए टापू भी बना रहा है। इससे भारत और चीन के बीच मालदीव की उपस्थिति लुप्त हो जायेगी और चीन सीधे भारत तक बढ़ आएगा। भारत सरकार ने इस पर चिंता व्यक्त की है, किन्तु चीन और मालदीव ने भारत को "चिंता न करने" को कहा है। . Get Ready: China Could Build New Artificial Islands Near India . ——— . (7) और नेपाल भी : मधेशी नेपाल और भारत के उत्तरी राज्यों की सीमा से लगे नेपाल के तराई क्षेत्र में रहते है, तथा भारत के प्रतीकात्मक प्रतिनिधी माने जाते है। चीन ने नेपाल को चाबी दी जिसके फलस्वरूप नेपाल ने अपने नए संविधान में मधेशीयों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया, और इस वजह से भारत और नेपाल के रिश्ते बिगड़े। . विरोध प्रदर्शन की हिंसा में 50 से ज्यादा मधेशी मारे गए और नेपाल के स्थानीय गैर मधेसी समुदाय में एंटी इंडिया सेंटीमेंट्स पैदा हो गए। चीन ने नए संविधान का स्वागत किया, और चीन ने नेपाल को तेल-गैस आदि की आपूर्ति शुरू कर दी है। पहली बार चीन एवं नेपाल ने साझा युद्धाभ्यास करना शुरू किया। भारत की नाराजगी पर नेपाल के प्रधानमंत्री का कहना है कि भारत उनके निजी मामलो में टांग न अड़ाए तो बेहतर होगा !! . नेपाल को इंटरनेट सेवा अब तक भारत उपलब्ध करवाता था, किन्तु अब चीनी उस पर कब्ज़ा कर रहे है !!! . Nepal to get internet connection from China . चाइना एवं नेपाल को चीन से जोड़ने के लिए अब ट्रेन ट्रेक भी डाल रहा है। ट्रेन रूट से कनेक्ट हो जाने के बाद चीन का नियंत्रण नेपाल पर काफी बढ़ जाएगा। . China's growing footprint in Nepal: Challenges and opportunities for India | ORF . कुल मिलाकर नेपाल में चीन अपने कदम बढ़ा चुका है और जल्दी ही हम श्री लंका, मालदीव की तरह नेपाल भी चीन के हाथों गँवा देंगे !! आखिर नेपाल को भी चीन के तकनिकी उपकरण जैसे मोबाईल फोन, डीवीडी प्लेयर, हथियार आदि चाहिए। भारत तो ये सब खुद चीन से ले रहा है, तो नेपाल को भारत क्या आर्थिक लाभ दे सकेगा !! . Should Rising China-Nepal Military Ties Worry India? . ऊपर दिया गया सारा विस्तार पिछले 6-7 वर्षो के दौरान किया गया है। उपरोक्त ब्यौरों से मैं यह बिंदु स्पष्ट करना चाहता हूँ कि चीन सभी तरफ से भारत की तरफ तेजी से बढ़ रहा है, और उसने अब भारत में भी अपना सेट अप लगाना शुरू कर दिया है। . चीन हमले की स्थिति में है। हमारी सेना परजीवी होने के कारण हम चीन के इस सामरिक-आर्थिक हमले को नहीं रोक सकते। यदि हम आर्थिक रूप से रोकने की कोशिश करेंगे तो चीन सामरिक नुकसान पहुंचाकर भारत में घुसेगा। और यदि हम चीन को रोकने के लिए अमेरिका की शरण लेंगे तो अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत को पूरी तरह से निगल जायेगी !! . यदि बचना है तो सिर्फ एक रास्ता है - हमें अपनी सेना को आत्मनिर्भर बनाना होगा। इतना आत्मनिर्भर कि हम अमेरिका के सामने टिक जाएँ। वर्ना चीन से बचाने की एवज में अमेरिका हमें खा जाएगा। भारत के तमाम नेता और राजनैतिक पार्टियाँ अमेरिका के सामने पूरी तरह से समर्पण कर चुके है और वे भारत को अमेरिकी कम्पनियों के सुपुर्द करने के लिए काम कर रहे है !! . तो कार्यकर्ताओ को यह बात समझ लेनी चाहिए कि , जब भी हम चीनी उत्पादों को रोकने की कोशिस करेंगे तो हमें चीन की सेना से डील करना पड़ेगा। हम चीन की सेना से डील नहीं कर सकते और इसीलिए हमें चीनियों को भारत में घुसने की अनुमति देनी पड़ रही है। और भारत ही क्यों हमारे सभी पडौसी देशो की यही स्थिति है। चीन सभी को बलात रूप से टेक ओवर करता जा रहा है। . ———- . (8) टाइम पास समाधान : चीनी वस्तुओं का बहिष्कार करो। ये समाधान बकवास इसीलिए है क्योंकि पैसा मुफ्त में नहीं आता। व्यक्ति जब कोई वस्तु खरीदता है तो वह चाहता है कि उसे कम पैसे में बेहतर वस्तु मिले। उसे आप राष्ट्रवाद का चकमा देकर घटिया एवं महंगी वस्तु खरीदने के लिए सिर्फ क्षणिक तौर पर ही प्रेरित कर सकते है। वास्तव में नहीं। . ——— . (9) वास्तविक समाधान : सेना को आत्मनिर्भर एवं मजबूत बनाने के लिए हमें नए कानूनों की पूरी सीरिज चाहिए। किसी देश के तकनिकी उत्पादन की गुणवत्ता को तय करने वाले कई तत्व है। इन तत्वों में निम्नलिखित 5 तत्व इसे सबसे अधिक प्रभावित करते है : . (A) अदालतें (B) कर प्रणाली (C) भू प्रबंधन के क़ानून (D) जज-पुलिस-राजनेता का भ्रष्टाचार (E) गणित-विज्ञान की शिक्षा का स्तर . जजों का भ्रष्टाचार इंजीनियरिंग गुणवत्ता को सबसे ज्यादा एवं गणित-विज्ञान की शिक्षा का स्तर सबसे कम प्रभावित करता है। भारत के सभी सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार है, किन्तु भारत के जज तुलनात्मक रूप से सबसे ज्यादा भ्रष्ट है। और इसीलिए भारत तकनिकी उत्पादन में पिछड़ गया है। इनमे से दो तत्वों के बारे में विवरण एवं समाधान मैंने अन्य जवाबो में लिखा है। शेष 3 तत्वों पर मैं फिर किसी जवाब में लिखूंगा। . =========
क्या भारत सुपर पावर बन सकता है ? कैसे ? और नागरिकों की इसमें क्या भूमिका होनी चाहिए ? . [ इस प्रश्न का अंतिम हिस्सा बेहद व्यावहारिक है। अच्छी बात यह है कि प्रश्न इस तरह नहीं पूछा गया कि - भारत को सुपर पॉवर बनाने के लिए हमें कैसे "नेता" की जरूरत है, या सुपर पॉवर बनने के लिए हमें किस नेता को वोट करना चाहिए !!! . पेड मीडिया ( जिसमें सभी प्रकार की फ़िल्में और पाठ्यपुस्तके भी शामिल है ) द्वारा लगातार नागरिको को यह विश्वास दिलाया जाता है कि किसी भी तरह के बदलाव के लिए हमें सबसे पहले "एक नेता कम मसीहा" की जरूरत है। और "नेता की जरूरत" की इस गलतफहमी से बाहर आने में ज्यादातर नागरिको के जीवन का अधिकांश निकल जाता है। फिर कई मसीहाओ से नाउम्मीद होने के बाद वे अपना शेष "कुछ नहीं हो सकता" का मन्त्र दोहराते हुए बिताते है।] . खंड (अ) में संक्षेप में बताया गया है कि भारत को सुपर पॉवर बनाने के लिए किन क़ानून ड्राफ्ट्स की जरुरत है। खंड (ब) में जन आन्दोलन की प्रकृति एवं इसके स्ट्रक्चर के बारे में जानकारी है। खंड (स) में उन कदमो का विवरण है जिन्हें उठाकर आप एक आम नागरिक के तौर पर भारत को सुपर पॉवर बनाने में अपना योगदान दे सकते है। . ———— खंड – (अ) ———— . क्या भारत सुपर पॉवर बन सकता है ? . आज की तारीख में अमेरिका सुपर पॉवर है। मेरा मानना है कि अमेरिका की ताकत की वजह वहां के क़ानून है। उन्होंने गेजेट में ऐसे क़ानून छापे है जिससे वहां के उत्पादक वर्ग को कारोबार करने में सुविधा मिली है, और वे तकनीक जुटा कर बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खड़ी कर पाए। इसमें मुख्य रूप से जूरी सिस्टम एवं वोट वापसी क़ानून शामिल है। . जूरी मंडल ने वहां के छोटे-मझौले कारोबारियों की जज-पुलिस-नेताओं के भ्रष्टाचार से रक्षा की। भारत में जज सिस्टम होने के कारण बड़ी कम्पनियां छोटे कारोबारियों के बाजार से बाहर करने में सफल हो जाती है। यदि हम भारत में करो का ढांचा, अदालतें एवं पुलिस सुधार दें तो भारत की इकाइयां तेजी से तरक्की कर सकती है। . दूसरा मुख्य बिंदु देश की खनिज संपदाओ एवं प्राकृतिक संसाधनों को 90 करोड़ भारतीयों की संपत्ति घोषित करने का है। यदि हम भारत के प्राकृतिक संसाधनों की लूट रोक देते है तो भारत अपने पैरो पर खड़ा हो सकता है। क्योंकि जिस गति से पिछले 270 वर्षो से बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हमारे खनिज लूट रही है, जल्दी ही हम रीते हो जायेंगे। और एक बार यदि हम कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर हो गए, तो पुलिस-अदालतें-कर प्रणाली सुधारने से भी कोई लाभ नहीं होगा। . तो जैसे जैसे हम अपने खनिज गँवा रहे है वैसे वैसे भारत के आत्मनिर्भर एवं मजबूत होने की संभावित संभावनाएं कमजोर होती जा रही है। मैं जूरी सिस्टम, वोट वापसी, वेल्थ टेक्स एवं धन वापसी(*) कानूनों के बारे में अन्य जवाबो में लिखता रहा हूँ, अत: इस जवाब में मैं सिर्फ उन कदमो का वर्णन करूँगा जिन्हें उठाकर देश में ये क़ानून लाये जा सकते है, ताकि भारत को अमेरिका के बराबर शक्तिशाली बनाया जा सके। . ———————— . (*) धन वापसी : खनिजो एवं प्राकृतिक संसाधनों की लूट रोकने के लिए एक प्रस्तावित क़ानून है। इस क़ानून के आने बाद देश की सभी राष्ट्रीय सम्पत्तियों के मालिक 90 करोड़ भारतीय होंगे, भारत सरकार नहीं। भारत सरकार इसकी ट्रस्टी या न्यासी की स्थिति में रहेगी। तब यदि कोई कम्पनी खनिज निकालना चाहती है, तो उसे इसकी खुली नीलामी लगानी होगी, और रोयल्टी से आने वाला पैसा "90 करोड़ भारतीयों का संयुक्त खाते" नाम के एकाउंट में जाएगा। तब जिंदल 107 रूपये प्रति टन के हिसाब से कोयला नहीं खोद सकेगा, और उसे रोयल्टी के रूप में अन्तराष्ट्रीय दरो के हिसाब से प्रति टन 2000 रूपये चुकाने होंगे। जिंदल को 107 रूपये में कोयले की यह खान 2015 में दी गयी थी !!! . Jindal Steel and Power bags Gare Palma coal bloc; stock jumps 25 per cent . जब अंग्रेज भारत से गए थे तो उन्होंने अपने सभी वफादारो को इफरात में जमीने और खाने दी थी। टाटा को 1946 में झारखंड क्षेत्र के माइनिंग राइट्स सिर्फ 1 रुपया प्रति टन में दिए गए थे। हाँ, आपने सही पढ़ा है। यहाँ कोई टाइपिंग मिस्टेक नहीं है। टाटा के पास 1 रूपये प्रति टन के हिसाब से कोयला निकालने के माइनिंग राइट्स है। और टाटा पिछले 70 सालो से 1 रूपये में यह कोयला खोद रहा है !!! . A Tata Coalgate? 999-yr mine lease at 25p a bigha! - Firstpost . अख़बार का नाश्ता एवं टीवी का डिनर करने वाले नागरिको को यह समझना चाहिए कि मीडिया ख़बरें छुपाने का कारोबार है। पेड मीडिया सिर्फ भ्रष्टाचार पर बोलता है, लूट पर नहीं। और जिंदल एवं टाटा तो टोकन के रूप में लूट रहे है। भारत के ज्यादातर खनिज संसाधनों पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का नियन्त्रण है, और यह बढ़ता जा रहा है। वे लगभग मुफ्त में इनका दोहन करते है। लेकिन इन्हें रिपोर्ट नही किया जाता। और चूंकि विदेशी चिल्लर संसाधन नहीं लूटते इसीलिए बजरी और पत्थर कौन कौन लूट रहा है, इस बारे में पेड मीडिया छापता रहता है !! . गोदरेज को देखिये। गोदरेज के पास मुंबई में 15 करोड़ वर्ग फुट जमीन खाली पड़ी है, और यह इस पर एक रूपया भी टेक्स नहीं चुकाता !! और कुछ 10 घरानों ने मुंबई की 20% जमीन पर कब्ज़ा किया हुआ है। और ऐसा नहीं है कि ये जमीन इन्होने बनाई है। ये सरकारी जमीने अंग्रेज इन्हें मुफ्त में देकर चले गए थे !! इन लोगो ने ट्रस्ट बनाकर इन जमीनों को दबाकर रखा हुआ है। . Nine landowners control a fifth of Mumbai's habitable area - Times of India . यदि देश में वेल्थ टेक्स आ जाता है तो अगले दिन ये लोग इन जमीनों पर फ्लेट बनाकर बेचने लगेंगे, और सप्लाई बढ़ने से जमीनों के दाम गिर जायेंगे। और यह स्थिति सिर्फ मुंबई की नहीं बल्कि पूरे देश की है !! तो वोट वापसी एवं जूरी सिस्टम जैसे क़ानून धन वापसी एवं वेल्थ टेक्स जैसे क़ानूनो का आना सुनिश्चित करते है, जो कि अर्थव्यवस्था, उत्पादन एवं तकनिकी विकास की रीढ़ है। . ———————— . देश के अन्य स्वतंत्र कार्यकर्ताओं की तरह मेरा भी मानना है कि जूरी सिस्टम , वोट वापसी, धन वापसी, वेल्थ टेक्स जैसे क़ानून किसी नेता की पूँछ पकड़ कर नहीं लाये जा सकते, बल्कि इसके लिए देश के कार्यकर्ताओ को जन आन्दोलन खड़ा करने के लिए प्रयास करना चाहिए। यदि भारत के कार्यकर्ता जन आन्दोलन खड़ा करने में कामयाब हो जाते है तो इन कानूनों को लाया जा सकता है। इन कानूनों के आने के 3–4 वर्षो के भीतर भारत तेजी से विकास करना शुरू करेगा और 10 वर्षो के भीतर खुद को इतना ताकतवर बना लेगा कि हम अमेरिका का मुकाबला कर सके। . निचे जूरी सिस्टम, वोट वापसी क़ानूनो के सन्दर्भ में एक सामान्य जन आन्दोलन खड़ा करने की प्रक्रिया बतायी गयी है। ये विवरण बताते है कि एक आम भारतीय नागरिक होने के नाते आप इस तरह का जन आन्दोलन खड़ा करने के लिए क्या कदम उठा सकते है। दी गयी प्रक्रिया सभी प्रकार के विषयों पर जन आन्दोलन खड़ा करने के लिए भी वाजिब खाका बताती है। अगले खंड में जन आन्दोलन की बुनियादी प्रकृति के बारे में जानकारी है, और अंतिम खंड इसे खड़ा करने की प्रक्रिया बताता है। . ———— खंड - (ब) ———— . (A) जन आन्दोलन क्या है ? . आन्दोलन एवं जन आन्दोलन में नेतृत्व का अंतर होता है। आन्दोलन के केंद्र में कोई न कोई नेता होता है, लेकिन जन आन्दोलन नेतृत्व विहीन होता है। यदि आन्दोलन में कोई नेता है तो इसे जन आन्दोलन नहीं कहा जा सकता। किन्तु समस्या यह है कि नेता विहीन आन्दोलन खड़ा नहीं किया जा सकता। नेता के अभाव में आन्दोलनकारी दिशा विहीन होकर विघटित हो जायेंगे। हमारा सुझाव है कि कार्यकर्ताओ को क़ानून ड्राफ्ट को अपना नेता बनाना चाहिए। यदि जूरी सिस्टम, वोट वापसी कानूनों के ड्राफ्ट उपलब्ध है तो इन लिखित ड्राफ्ट्स के नेतृत्व में जन आन्दोलन खड़ा करने के लिए काम शुरू किया जा सकता है। . तो पहली आवश्यकता है - जूरी सिस्टम, वोट वापसी कानूनों के ड्राफ्ट, जिसके नेतृत्व में जन आन्दोलन खड़ा किया जाएगा। जो इन क़ानून ड्राफ्ट्स का समर्थन करेगा वह इस आन्दोलन में जुड़ता जायेगा और आन्दोलन आगे बढ़ना शुरू करेगा। यदि आप किसी अन्य मुद्दे पर जन आन्दोलन खड़ा करना चाहते है तो आपकोअमुक विषय के क़ानून ड्राफ्ट की जरूरत होगी। यदि आपने किसी व्यक्ति को नेता बनाकर आन्दोलन खड़ा करने की कोशिश की तो आन्दोलन का ट्रिगर नेता के हाथ में आ जायेगा, बाद में आन्दोलन को नष्ट करने के लिए नेता या तो बिक जायेगा, या दबा दिया जाएगा, या मार दिया जाएगा। उदाहरण - राष्ट्रबंधु राजिव भाई दीक्षित . (B) ड्राफ्ट के नेता, यानी कि जूरी सिस्टम-वोट वापसी के ड्राफ्ट को जन जन तक पहुँचाना, ताकि नागरिक क़ानून ड्राफ्ट का समर्थन करना शुरू करें . ड्राफ्ट को करोड़ो नागरिको तक पहुँचाने के दो रास्ते है - (1) पेड मीडिया , (2) स्वयंसेवी स्वतंत्र कार्यकर्ता। यदि आप जूरी सिस्टम, वोट वापसी जैसे कानूनो पर जन आन्दोलन खड़ा करना चाहते है तो पेड मीडिया आपका समर्थन नहीं करेगा। बल्कि आपकी मुख्य प्रतिद्वंदी पेड मीडिया ही रहेगा। अत: पेड मीडिया का रास्ता यहाँ बंद हो जाता है। यदि आपके पास पेड मीडिया नहीं है तो आपको आम नागरिको में से छोटे छोटे लाखों कार्यकर्ताओ(*) की जरूरत होगी, जो इस ड्राफ्ट की जानकारी जन जन तक पहुंचा कर आन्दोलन को आगे बढ़ाएंगे। . ———————— . (*) कार्यकर्ता या एक्टिविस्ट कौन है ? और भारत में कितने कार्यकर्ता है ? . एक कार्यकर्ता वह व्यक्ति है जो भारत को मजबूत बनाने के लिए निस्वार्थ भाव से अपने धन और समय का एक अंश व्यय करने के लिए प्रतिबद्ध है , तथा बदले में उसका प्राथमिक लक्ष्य कोई ख्याति, धन , पद आदि प्राप्त करना नहीं है। मेरे अनुमान में भारत में कई लाख कार्यकर्ता है, लेकिन उनमे से सभी राईट टू रिकॉल, जूरी सिस्टम कानूनो का प्रचार नहीं करेंगे। लेकिन यदि कुछ 2 लाख कार्यकर्ता भी प्रति सप्ताह 4 घंटे का समय इन कानूनो के प्रचार में देते है, तो कुछ ही सप्ताह में पहला चरण पूरा हो जाएगा। . बहुधा ये कार्यकर्ता राजनैतिक ख़बरों को फॉलो करते है, और देश को सुधारने के लिए अपने स्तर पर छोटे छोटे कदम उठाने के लिए तत्पर रहते है। ये कार्यकर्ता किसी राजनैतिक दल से सम्बद्ध भी हो सकते है, या स्वतंत्र भी हो सकते है। अमूमन सच्चे कार्यकर्ता स्वतंत्र होते है, और किसी नेता वगेरह के नियंत्रण में काम नही करते। हालांकि भारत के अधिकांश कार्यकर्ता ब्रांडेड नेताओं पर निर्भर बने हुए है। . कार्यकर्ताओ को यह बात समझ लेनी चाहिए कि, आम नागरिको का जन आन्दोलन के शुरूआती चरणों में न्यूनतम सहयोग रहेगा। जैसे जैसे कार्यकर्ता बढ़ेंगे वैसे वैसे नागरिक इन क़ानून ड्राफ्ट्स का समर्थन करेंगे। और अंतिम चरण में वे आन्दोलन में अपनी भूमिका निभायेंगे। मतलब नागरिक इस आन्दोलन को आगे बढाने के लिए अपने श्रम, धन आदि से कोई सहयोग नहीं करेंगे। इसे आगे बढाने का काम कार्यकर्ताओ को ही करना होगा। किसी भी देश में लगभग 98% नागरिक ही होते है, और इनसे कार्यकर्ताओ को बेहद कम उम्मीद रखनी चाहिए। किन्तु ये 2 लाख कार्यकर्ता भारत के 90 करोड़ नागरिको में बिखरे हुए है, अत: इन्हें ढूँढने के लिए कार्यकर्ताओ को सभी 90 करोड़ नागरिको तक पहुंचना होगा। . ———————— . तो दूसरी आवश्यकता है - ऐसे लाखों कार्यकर्ता जो जूरी सिस्टम-वोट वापसी क़ानून ड्राफ्ट के नेतृत्व में आन्दोलन खड़ा करने के लिए प्रयास करने को तैयार हो। . (C) जन आन्दोलन खड़ा करने के लिए तीसरी जरूरत प्रेरणा की है। इसके लिए हमारा सुझाव है कि यदि कार्यकर्ता जूरी सिस्टम, वोट वापसी, धन वापसी और वेल्थ टेक्स आदि कानूनों को लाने के लिए जन आन्दोलन खड़ा करना चाहते है तो उन्हें अनिवार्य रूप से अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी(*) को अपना प्रेरणा स्त्रोत बनाना चाहिए। इस तरह के क़ानून उधम सिंह जी की सहयोग बिना किसी भी तरह से नहीं लाये जा सकते। . महात्मा उधम सिंह जी लोकतंत्र के रक्षक है। जन आन्दोलन का औचित्य सिर्फ तब पूरा होता है जब कुल नागरिको के 51% नागरिक इस आन्दोलन का समर्थन करे। यदि जन आन्दोलन जूरी सिस्टम, वोट वापसी कानूनों के पक्ष में बहुमत सिद्ध कर देता है, तो आन्दोलन की बाधाओं को दूर करने के लिए अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी सक्रीय हो जायेंगे। यदि आन्दोलन बहुमत साबित नही कर पाता है तो उधम सिंह जी सक्रीय नही होंगे और आन्दोलन असफल हो जाएगा। . ———————— . (*) अंहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी से क्या आशय है ? . उधम सिंह जी लोकतंत्र के रक्षक है। जब जब सत्ता बहुमत की अवहेलना करती है, तब तब उधम सिंह जी सक्रीय होकर जनता के प्रतिनिधि बनकर सत्ताधीशो से मुलाकात करके उन्हें जनता की इच्छा से अवगत कराते है। उधम सिंह जी सही-गलत में नहीं मानते। वे सिर्फ बहुमत में मानते है। अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह जी, अहिंसा मूर्ती राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस आदि उधम सिंह जी के ही अंश है। उधम सिंह जी का अंश किसी भी व्यक्ति में हो सकता है। यदि जनता का बहुमत सत्ता से कोई मांग करता है, किन्तु सत्ता स्पष्ट रूप से इसकी अवहेलना करती है, तो कार्यकर्ताओ में मौजूद उधम सिंह जी का अंश सक्रीय हो जाता है। . ———————— . तो तीसरी और आखिरी जरूरत यह है कि - आन्दोलनकारी कार्यकर्ता अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी से प्रेरणा ले। . पाठक कृपया इस बात को नोट करे कि एक जन आन्दोलन खड़ा होने में दशको एवं सदियाँ भी लग सकती है। ब्रिटिश 1050 में जूरी सिस्टम से इंट्रोड्यूस हुए और वहां के कार्यकर्ताओ को जूरी सिस्टम गेजेट में छपवाने ( मैग्नाकार्टा ) में 200 वर्ष लगे। इसी तरह अमेरिका में जूरी सिस्टम एवं स्वतंत्रता आन्दोलन ने खड़े होने में 3 दशक लिए। आचार्य चाणक्य में निर्देशन में चलाये जाने वाले आन्दोलन को जन आन्दोलन की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। क्योंकि आचार्य इसे लीड कर रहे थे। यदि चाणक्य आन्दोलन से बाहर हो जाते तो ज्यादातर सम्भावना थी कि धनानंद का तख्ता नहीं पलटा जा सकता था। . मोहन के नेतृत्व में चलाया गया फ्रीडम मूवमेंट न तो आन्दोलन था, और न ही जन आन्दोलन। यह एक ड्रामा था। आन्दोलन का स्विच मोहन के हाथ में था। वे जब चाहते तब आन्दोलन को ट्रिगर करते थे और जब चाहते आन्दोलन को वापिस ले लेते थे !! द अन्ना के नेतृत्व में चलाया गया जनलोकपाल का हाईटेक ड्रामा भी जन आन्दोलन नहीं था। पेड मीडिया का इस पर पूरी तरह से नियंत्रण था। 1857 के विद्रोह की शुरुआत महात्मा मंगल पांडे ने की थी, लेकिन बाद में इस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रह गया था। हालांकि नागरिको के बहुमत का इसे समर्थन हासिल था, लेकिन यह समर्थन निष्क्रिय श्रेणी का था। दरअसल यह आन्दोलन न होकर एक क्रान्ति थी। टेलीग्राम का अविष्कार हो जाने एवं क्रांतिकारियों के कारतूस समाप्त होने जाने के कारण यह असफल रहा। . 1977 में जन आन्दोलन के कारण ही श्रीमति इंदिरा गांधी जी को इमरजेंसी समाप्त करनी पड़ी थी। उन्होंने यह ताड़ लिया था कि जनता का बहुमत आपातकाल को हटाये जाने के पक्ष में है, और यदि उन्होंने चुनाव नहीं करवाए तो किसी भी समय अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी सक्रीय होकर संजय गाँधी से मुलाक़ात कर सकते है !! बहरहाल, उनका चुनाव कराने का उनका फैसला सही था और नतीजो में यह बात साबित भी हुयी कि बहुमत उनके साथ नहीं था। . ———— खंड - (स) ———— . इस खंड में वे चरण दिए गए है जिन्हें उठाकर " जूरी सिस्टम, वोट वापसी, धन वापसी आदि क़ानून ड्राफ्ट्स के नेतृत्व में अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह केन्द्रित, कार्यकर्ता निर्देशित जन आन्दोलन "खड़ा किया जा सकता है। . देश के सभी स्वतंत्र कार्यकर्ताओं — भारत को अमेरिका जितना शक्तिशाली बनाने के लिए आपको कौनसे कार्यो को सफलता पूर्वक करना होगा, और इन कार्यो को पूरा करने के दौरान आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा ? और किस तरह से भारत के कार्यकर्ता इन विहंगम कार्यो को पूरा करने के लिए पर्याप्त नागरिक / कार्यकर्ता / इंजीनियर्स और पर्याप्त धन जुटा सकते है ? . अध्याय, और किये जाने वाले कार्यो कि सूची : . 00. परिचय . 01. पहला काम : कम से कम 543 एक्टिविस्ट्स को लोकसभा, 5000 एक्टिविस्ट्स को विधानसभा और लगभग 200,000 एक्टिविस्ट्स को स्थानीय निकायो के चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना। . 02. दूसरा काम : 75 करोड़ नागरिको को ज्यूरी सिस्टम, धन वापसी, वोट वापसी आदि क़ानून ड्राफ्ट के बारे में "सूचित" करना ; कृपया इस बात पर विशेष ध्यान दें कि यह जानकारी अनिवार्य रूप से कार्यकर्ताओं द्वारा ही पहुंचाई जानी चाहिए, पेड मिडिया द्वारा नही। यदि यह जानकारी पेड मीडिया के माध्यम से दी जाती है तो वे आन्दोलन में किसी न किसी नेता को खड़ा कर देंगे, और फिर नेता को गिरा कर आन्दोलन भी गिरा देंगे। . 03. तीसरा काम : 45 करोड़ नागरिको को राजी करना कि वे प्रधानमंत्री को चिट्ठी भेजकर इन कानूनों को गेजेट में छापने का आदेश दें। . 04. चौथा काम : 45 करोड़ नागरिको के संज्ञान में यह बात लेकर आना कि (a) 45 करोड़ नागरिक अपने प्रधानमंत्री को चिट्ठी भेज चुके है , (b) तथा 45 करोड़ नागरिकों को यह भी जानकारी होना कि 45 करोड़ नागरिको द्वारा चिट्ठी भेजी जा चुकी है , (c) दुसरे शब्दों में, वोट वापसी, धन वापसी, जूरी सिस्टम कानून ड्राफ्ट्स और चिट्ठी भेजे जाने कि जानकारी "कॉमन नॉलेज" में लेकर आना !! . 05. पांचवा काम : ( पहले से चौथे तक चरण पूरे होने के बावजूद यदि सांसद और प्रधानमंत्री राईट टू रिकॉल जूरी सिस्टम कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने से मना कर दे तो ) -- 45 करोड़ नागरिको को तैयार करना कि वे अपने सांसदों को इस्तीफा देने का आदेश देने के लिए चिट्ठी भेजे। . 06. छठा काम : 45 करोड़ नागरिको को उन उम्मीदवारों को वोट देने के लिए तैयार करना जिन्होंने जूरी सिस्टम, धन वापसी के क़ानून ड्राफ्ट को अपने एजेंडे में शामिल किया है। . 07. सातवाँ काम : उस परिस्थिति का सामना करना जब जूरी सिस्टम, वोट वापसी ड्राफ्ट के मुद्दों पर जीतकर जाने वाले सांसद इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने से मना कर दे। . 08. आठवां काम : सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश द्वारा इन कानूनो को खारिज कर दिए जाने के हालात का सामना करना। . 09. नवां काम : उस स्थिति से निपटना, जब प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस अधिकारी , रिजर्व बैंक अधिकारी, सार्वजनिक उपक्रमों के अधिकारी आदि जूरी सिस्टम, वोट वापसी का विरोध करें और इन्हे रोकने के लिए लिए गड़बड़ी फैलाये। . 10. दसंवा अतिरिक्त काम : अमेरिका / चीन द्वारा खुले / छिपे हुए सशस्त्र हमलो, आर्थिक और मौद्रिक प्रतिरोधों का सामना करना। . 11. ग्यारवाँ काम : इन कार्यों को पूरा करने के लिए किस तरह हम लाखों-करोड़ो कार्यकर्ता, नागरिक, इंजीनियर्स और जरुरी कौशल, प्रशिक्षण और योग्यता जुटा सकते है ? और किस तरह हम इन कार्यो को पूरा करने के लिए धन जुटा सकते है। . 12. बारहवां काम : क्यों जहां तक हो सके इनमे से ज्यादातर कार्यो को समानांतर रूप से एक साथ किया जाना चाहिए, न कि क्रमिक रूप से। . 13. तेरहवां काम : क्या भारत को ताकतवर बनाने का अन्य कोई शार्ट कट है ? जिससे इस भारी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया से बचा जान सके ? . 14. सारांश . ================== . 00. परिचय . कई कार्यकर्ता हम रिकालिस्ट्स से पूछते है की -- भारत को अमेरिका जितना ताकतवर बनाने के लिए हमें कौन से कार्य करने होंगे ? इस जवाब में उन सभी कार्यो और चरणो को सूचीबद्ध किया गया है, जिनका पालन भारत के कार्यकर्ता कर सकते है। . 01. पहला काम : कम से कम 543 एक्टिविस्ट्स को लोकसभा, 5000 एक्टिविस्ट्स को विधानसभा और लगभग 200,000 एक्टिविस्ट्स को स्थानीय निकायो के चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना। . हम एक जन आंदोलन खड़ा करने पर काम कर रहे है , ताकि वर्तमान या नए सांसदों को जूरी सिस्टम, धन वापसी कानूनो को लागू करने के लिए बाध्य किया जा सके। इसीलिए हमें 543 लोकसभा और 5000 विधानसभा उम्मीदवारों की आवश्यकता होगी, जो चुनावो में भाग ले सके। तो चुनाव लड़ना क्यों जरुरी है ? आखिर क्यों रिकालिस्ट्स चुनावो में भाग लिए बिना इन कानूनो को लागू करवाने में असफल रहेंगे ? (a) मान लीजिये कि रिकालिस्ट्स देश के सभी एक्टिविस्ट्स को इन कानूनो के बारे में जानकारियाँ देते है, और 2 लाख एक्टिविस्ट्स को रिकालिस्ट्स में बदल देते है। (b) मान लीजिये कि ये लाखों एक्टिविस्ट्स 70 करोड़ नागरिको को इन कानूनो के बारे में जानकारी दे देते है। (c) और मान लीजिये कि उनमे से 45 करोड़ नागरिक अपने सांसदों एवं प्रधानमंत्री को चिट्ठी द्वारा आदेश भेज देते है कि इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित किया जाए। (d) और 70 करोड़ नागरिको को भी यह जानकारी हो जाती है कि चिट्ठी द्वारा आदेश भेजे जा चुके है। (e) और मान लीजिये कि सांसद इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने से इंकार कर देते है। तो ऐसी स्थिति में क्या अहिंसा मूर्ती महात्मा ऊधम सिंह जी सांसदों से मुलाक़ात करेंगे ? नही। क्योंकि मतदाताओ ने सांसदों को इस्तीफा देने के लिए चिट्ठी नही भेजी है, और सभी सांसदों ने चुनावों से पहले ही इन कानूनो को लागू करने से इंकार कर दिया था। अत: उन पर इन कानूनो को लागू करने और इस्तीफा देने की कोई नैतिक बाध्यता नही है, और इसीलिए ऊधम सिंह जी सांसदों से मुलाक़ात नही करेंगे !! (f) अब मान लीजिये कि 45 करोड़ मतदाता अपने सांसदों को 'इस्तीफा' देने के लिए चिट्ठी भेजते है। (g) और यदि वोट वापसी कार्यकर्ता यह साफ़ कर देते है कि वे चुनावो में 'भाग' नही लेने वाले है। मैं इसे फिर से दोहराता हूँ - यदि रिकालिस्ट्स यह घोषणा करते है कि वे 'चुनावी प्रक्रियाओ में हिस्सा "नही" लेने वाले है'। तब अहिंसा मूर्ती महात्मा ऊधम सिंह जी यह निष्कर्ष निकालेंगे कि — सांसदों से मेरी मुलाक़ात का देश को क्या लाभ होगा ? क्योंकि यदि फिर से चुनाव हो भी जाते है, तो भी फिर से वही उम्मीदवार संसद में पहुँच जायेंगे जो इन कानूनो के खिलाफ है, क्योंकि इन कानूनो के समर्थक रिकालिस्ट्स ने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है । अत: ऊधम सिंह जी सांसदों से न मिलने का फैसला करेंगे !! . तो इस स्थिति में सांसद यही सोचेंगे कि ऊधम सिंह जी उनसे मिलने नही आने वाले है। वे यह भी सोचेंगे कि एक तो ऊधम सिंह जी हमसे मिलने आने वाले नही है , और दूसरे, कोई भी कार्यकर्ता चुनाव लड़ने को भी तैयार नही है , इसीलिए राईट टू रिकॉल कानूनो को गैजेट में प्रकाशित न करने से हमे कोई नुकसान नही होने वाला, लेकिन यदि हम इन कानूनो को लागू कर देते है तो हमारे प्रायोजक और धनिक वर्ग हमसे नाराज हो जाएगा। इसीलिए इन कानूनो का विरोध करने में ही मेरा फायदा है। और नुकसान तो कोई है ही नही। . और इसका मतदाताओ पर भी उल्टा असर होगा। मान लीजिये कि 45 करोड़ नागरिक इन कानूनो को लागू करने के लिए चिट्ठी द्वारा आदेश भेज चुके है, लेकिन सांसदों ने इन कानूनो को लागू करने से मना कर दिया है। तब मतदाता इस असमंजस का शिकार हो जाएगा कि, — क्या मुझे सांसद को इस्तीफा देने के लिए चिट्ठी भेजनी चाहिए कि नही ? चूंकि जूरी सिस्टम का कोई भी कार्यकर्ता चुनाव लड़ने को तैयार नही है, अत: मौजूदा सांसद से इस्तीफा मांगने में कोई लाभ नही है। क्योंकि कोई भी कार्यकर्ता इन मुद्दो पर चुनाव लड़ने को तैयार नही है, अत: यदि सभी सांसद इस्तीफा दे भी देते है, और फिर से चुनाव होते है तो भी फिर से वे ही उम्मीदवार संसद में पहुंचेंगे जो वोट वापसी कानूनो का विरोध कर रहे है। अत: बेहतर यही है कि मौजूदा सांसदों को इस्तीफा देने के लिए आदेश न भेजा जाए !! . और इस कारण शायद कुछ मतदाता ( कुछ, न कि सभी ) सांसद को इन कानूनो को लागू करवाने का आदेश न भेजने का भी फैसला ले सकते है !!! कई मतदाता यह सोच सकते है कि, मौजूदा सांसदों ने चुनावो से पहले ही यह बात स्पष्ट कर दी थी कि, वे जूरी सिस्टम कानूनो को लागू करने वाले नही है। और सांसद जानते है कि मैं उन्हें इस्तीफा देने के लिए नही कह सकता, क्योंकि कोई भी रिकालिस्ट जूरी सिस्टम कानूनो के समर्थन में चुनाव लड़ने को तैयार नही है। अत: यदि मैं सांसद को चिट्ठी द्वारा आदेश भेज भी देता हूँ, तो सांसद इन कानूनो को लागू करने से साफ़ इंकार कर देंगे। अत: ये मामला अब यहीं ख़त्म हो चुका है। . तब रिकालिस्ट्स के सामने प्रश्न यह है कि — क्या हमारे पास ऐसे कार्यकर्ता उपलब्ध है जो कि सांसद बन कर वोट वापसी, धन वापसी कानूनों को लागू करने की मंशा रखते हो ? . यदि कार्यकर्ताओ के पास ऐसे उम्मीदवार नहीं है तो जूरी सिस्टम, वोट वापसी क़ानून ड्राफ्ट्स बिना शरीर की आत्मा की तरह होंगे , तथा ऐसे अमूर्त विचार का राजनीति और वास्तविक जीवन में कोई महत्त्व नहीं होगा। . कोई क़ानून ड्राफ्ट सिर्फ तभी अच्छा क़ानून ड्राफ्ट कहा जा सकता है जबकि ऐसा ड्राफ्ट 45 करोड़ नागरिको और 2 लाख कार्यकर्ताओ का समर्थन जुटा सके , और साथ ही यह प्रस्तावित ड्राफ्ट इतना प्रभावी हो कि 543 कार्यकर्ता इन कानूनो को लागू करवाने का उद्देश्य लेकर चुनाव लड़े। ताकि संसद में जाकर इन्हे लागू किया जा सके। अन्यथा ऐसे कानून ड्राफ्ट्स का प्रचार करना सिर्फ समय की बर्बादी है। . इसलिए हमें पूरे देश में चुनाव लड़ने के लिए 543 लोकसभा उम्मीदवारों और 5000 विधानसभा प्रत्याशियों की आवश्यकता होगी। और बाद में हमें लगभग 2 लाख ऐसे कार्यकर्ताओ की भी जरुरत होगी जो कि स्थानीय निकाय के चुनावो में भाग ले सके। . इसीलिए चुनावो में भाग लेना बेहद जरुरी है , और जल्दी से जल्दी रिकालिस्ट्स को इस दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए। . हम चुनाव लड़े बिना आगे नहीं बढ़ सकते। क्योंकि ज्यादातर मतदाता हमारी बात सिर्फ तब ही सुनेंगे जब हमारे पास चुनावो में उतरने के लिए पर्याप्त प्रत्याशी हो। वरना हमें मतदाताओ से यह सुनने को मिलेगा कि — आप लोगो द्वारा प्रस्तावित ड्राफ्ट्स बेशक अच्छे हो सकते है। लेकिन आप के ड्राफ्ट्स यदि 543 कार्यकर्ताओ को भी चुनाव लड़ने और सांसद बनने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते तो इन ड्राफ्ट्स की अच्छाई संदेहास्पद है !!! . तो इस प्रकार 543 रिकालिस्ट्स को लोकसभा और 5000 रिकालिस्ट्स को विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना सबसे पहला काम है। क्योंकि सबसे पहले कार्यकर्ताओ को इन कानूनो पर अपना भरोसा दिखाना होगा , सिर्फ तब ही मतदाता इन क़ानून ड्राफ्ट्स को पढ़ने, समझने और अपने सांसदों एवं पीएम को चिट्ठी, ट्विटर द्वारा आदेश भेजने के लिए राजी होंगे। . चुनाव न लड़ने के फैसले पर टिके रहना हमें सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचायेगा। क्योंकि जब तक बड़ी संख्या में रिकालिस्ट्स चुनाव नही लड़ेंगे, धन वापसी, वोट वापसी कानूनो के समर्थको की संख्या नही बढ़ेगी। जूरी सिस्टम क़ानून ड्राफ्ट्स को अपने एजेंडे में शामिल करके सबसे पहले 2009 में एक रिकालिस्ट ने चुनाव लड़ा था। 2015 तक इस संख्या में कोई इजाफा नहीं हुआ। हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनावों में 15 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा। किन्तु तब भी 545 सीटो के हिसाब से यह संख्या 3% ही है !! कार्यकर्ता इस बात को नोट करें कि उन्हें इसके लिए किसी राजनैतिक पार्टी के भरोसे पर रहने की जरूरत नहीं है। वे निर्दलीय भी चुनाव लड़ सकते है। . =============== . 02. दूसरा काम : 75 करोड़ नागरिको को ज्यूरी सिस्टम, वोट वापसी आदि क़ानून ड्राफ्ट के बारे में ‘सूचित’ करना ; यह जानकारी अनिवार्य रूप से कार्यकर्ताओं द्वारा ही पहुंचाई जानी चाहिए, पेड मिडिया द्वारा नही । . रिकालिस्ट्स को दूसरा काम यह करना होगा कि वे भारत के 70 करोड़ नागरिको को वोट वापसी, ज्यूरी सिस्टम आदि क़ानून ड्राफ्ट्स की जानकारी दें। इसके लिए हमें 70 करोड़ पेम्फ्लेट, करोडो पुस्तिकाएं और करोड़ो डीवीडी तैयार करके उनका वितरण करना होगा !! या हमें नागरिको को इस बात के लिए तैयार करना होगा कि वे इन पुस्तिकाओं और डीवीडी को दुकानो से ख़रीदकर पढ़ें और देखें। पर्चो की छपाई और डीवीडी के वितरण का अनुमानित व्यय प्रति नागरिक लगभग 400 रू के हिसाब से हमें अनुमानित 28 हजार करोड़ रूपयो की आवश्यकता होगी। . अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि - किस तरह एक्टिविस्ट्स 70 करोड़ नागरिको को इन पर्चो को पढ़ने और डीवीडी को सुनने के लिए राजी कर पाएंगे ? . नागरिक इन पर्चो को तब ही पढ़ने में रुचि दिखाएँगे जब ; (a) पेड मिडिया इन कानूनो की प्रशंषा करे (b) कार्यकर्ता अपने परिचित नागरिको को इन्हें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। . पेड मिडिया का विकल्प हमारे लिए हमेशा के बंद है। इसीलिए हमारे पास सिर्फ यही तरीका शेष है कि, कार्यकर्ता अपने परिचित नागरिको से इन कानूनी ड्राफ्ट्स को पढ़ने का आग्रह करे। एक कार्यकर्ता लगभग 1000 नागरिको को ड्राफ्ट्स पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकता है, अत: हमें कम से कम 70 करोड़ / 10 / 1000 = 70 हजार कार्यकर्ताओ को आवश्यकता होगी। चूंकि कई नागरिक एक से अधिक कार्यकर्ताओ के संपर्क में आयेंगे और सूचनाओ का दोहराव होगा, अत: आकलन में सटीकता बनाये रखने के लिए हमें तीन गुना अधिक कार्यकर्ताओ की गणना करनी चाहिए। इस हिसाब से 70 करोड़ नागरिको को इन कानूनी ड्राफ्ट्स की सूचना पहुंचाँने के लिए कम से कम 2 लाख कार्यकर्ताओ की आवश्यकता होगी। . क़ानून ड्राफ्ट्स की जानकारी अनिवार्य रूप से कार्यकर्ताओ द्वारा ही पहुंचाई जानी चाहिए, न कि पेड मिडिया द्वारा। क्योंकि पेड मिडिया द्वारा सूचित नागरिक एक दायित्व है न कि एक सम्पति, अत: तब कार्यकर्ताओ को नागरिको से जुड़े रहने के लिए हमेशा पेड मिडिया पर निर्भर रहना पड़ेगा। लेकिन यदि नागरिक कार्यकर्ताओ से जुड़े हुए है तो मिडिया को भुगतान किये बिना भी कार्यकर्ता नागरिको से जुड़े हुए रह सकते है। इसीलिए यह बहुत जरूरी है कि, नागरिक यह सूचनाए पेड मिडिया की जगह कार्यकर्ताओ द्वारा प्राप्त करे। . इस समय कुछ 100-200 कार्यकर्ता है जो कि पूरे देश में फैले हुए है, और इन कानूनो का प्रचार नागरिको में कर रहे है। इसलिए रिकालिस्ट्स को ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओ को रिकालिस्ट्स में बदलने के लिए प्रयास करने चाहिए। तो यदि वोट वापसी कार्यकर्ता 2 लाख कार्यकर्ताओ को रिकालिस्ट्स में बदलने में असफल रहते है तो क्या होगा ? ऐसी स्थिति में, रिकालिस्ट्स खेल से बाहर हो जाएंगे। . कोई यह प्रश्न पूछ सकता है कि - किस आधार पर 2 लाख कार्यकर्ताओ की आवश्यकता बतायी गयी है। असल में यह एक मोटा अनुमान है। मतलब यह है कि, निश्चय ही इसके लिए न तो कुछ हजार कार्यकर्ताओ की आवश्यकता है, न ही करोड़ो कार्यकर्ताओ की। जो बात समझना जरुरी है वह यह है कि - कार्यकर्ताओ की संख्या पर्याप्त रूप से इतनी होनी चाहिए कि, कोई रिकालिस्ट 1% से अधिक रिकालिस्ट्स से परिचित हुए बिना और आपसी संपर्क के अभाव के बावजूद अपना काम जारी रखें और बिना किसी सम्प्रेषण के आंदोलन आगे बढ़ता रहे। . अध्याय - 2 का सार यह है कि : पहला काम यह है कि कार्यकर्ताओ द्वारा 70 करोड़ नागरिको को इन कानून ड्राफ्ट्स के बारे में सूचित किया जाए तथा ऐसा करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रियाओ का पालन किया जाए : (2a) लाखो कार्यकर्ताओ तक अपनी पहुँच बनायी जाए। (2b) लगभग 2 लाख कार्यकर्ताओ को रिकालिस्ट्स में बदला जाए - मतलब कार्यकर्ताओ को इस बात के लिए राजी किया जाए कि वे अपने धन से जूरी सिस्टम, धन वापसी, वोट वापसी आदि कानूनो के पर्चे छपवायें, डीवीडी बनाकर वितरण करें और सभाएं आयोजित करके नागरिको को इन कानूनो के बारे में जानकारी दे। (3c) तथा नागरिको को इन ड्राफ्ट्स को पढ़ने के लिए तैयार क
चुनाव आयोग कितना निष्पक्ष है? . मेरा मानना है कि यदि कोई व्यक्ति भारत के 3 सबसे भ्रष्ट आदमियों की सूची बनाता है तो वह बिना आगे पीछे देखे सीधे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश, चुनाव आयुक्त एवं रिजर्व बैंक गवर्नर का नाम नाम क्रमश: 1, 2, 3 नंबर पर लिख सकता है। पीएम वगेरह जैसे पदों का नाम बहुत बाद में आता है। . केंचुआ का मुख्य टारगेट भारत में EVM को जारी रखना एवं छोटी पार्टियों के रास्ते में पत्थर फेंकना है, ताकि उन्हें आगे बढ़ने से रोका जा सके। इसके लिए केंचुआ ने कितने और किस किस तरह के क़ानून छापे हुए है, ये आपको सिर्फ तब ही पता चलता है, जब आप चुनाव लड़ने जाते हो। फिलहाल मैंने निचे केंचुआ की एक हरकत का ब्यौरा दिया है, जिससे आप अंदाजा लगा सकते हो केंचुआ किस तरह काम करता है। . PMP02* के नेता मोदी साहेब ने 2018 में गेजेट में फाइनेंस बिल का लेबल लगाकर एक इबारत छापी। यह इबारत कहती है कि – कोई भी भारतीय या विदेशी व्यक्ति बैंक में पैसा जमा करके एवज में इलेक्टोरल बांड ले सकता है, और ये बांड किसी भी राजनैतिक पार्टी को दे सकता है। राजनैतिक पार्टी ये बांड अपने बैंक खाते में जमा करेगी और नियत राशि अमुक पार्टी के खाते में जमा हो जाएगी !! . स्पष्टीकरण : मान लीजिये कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी X वालमार्ट या जिंदाल से 50 करोड़ का चंदा लेना चाहती है, और यह भी चाहती है कि वालमार्ट का नाम सामने नहीं आये। तो वालमार्ट बैंक में जाकर 50 करोड़ के इलेक्टोरल बांड खरीदेगा और X को दे देगा। चुनावी बांड प्रोमेसरी नोट की तरह होता है, और इस पर दाता का नाम नहीं लिखा होता। फिर X अपने बैंक को ये बांड देगा और बैंक X के खाते में 50 करोड़ ट्रांसफर कर देगा। . अब X को अपनी लॉग बुक में सिर्फ यह लिखना है कि उसने 50 करोड़ इलेक्टोरल बांड से प्राप्त किये। X को यह नहीं बताना है कि उसे ये बांड किसने दिए थे !! और न ही केंचुआ उससे पूछेगा कि X को ये बांड किसने दिए थे !! Now, foreign poll funding won’t be scrutinised . साफ़ है कि मोदी साहेब एवं संघ के स्वयंसेवको ने इस क़ानून को सिर्फ इसीलिए लागू किया, ताकि बड़ी पार्टियाँ विदेशियों से गुमनाम पैसा ले सके !! और अब वे विदेशियों से पैसा ले भी रहे है। . सबूत ? . माफ़ कीजिये, लेकिन उन्होंने क़ानून ही इस तरह से बनाया है कि इसका कभी कोई सबूत नहीं जुटाया जा सकता !! . मोदी साहेब ने जब यह क़ानून छापा तो PMP01* की नेता सोनिया जी एवं PMP03* के नेता अरविन्द केजरीवाल जी ने भी इस क़ानून का पूरा समर्थन किया था !! यह बिल बिना किसी चर्चा के सीधे पास हुआ। जब यह क़ानून छपा तो पेड मीडिया ने रिपोर्ट किया था कि, इस क़ानून के आने के बाद राजनैतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता आएगी !!! ( PMP01* = में PMP से आशय पेड मीडिया पार्टी है, और 01 कोंग्रेस का कोड है। बीजेपी=संघ का कोड 02 एवं आम आदमी पार्टी का कोड 03 है। पेड मीडिया पार्टी से आशय ऐसी पार्टी से होता है, जो पेड मीडिया के प्रायोजको के एजेंडे के समर्थन में रहती है। पेड मीडिया के प्रायोजको का एजेंडा क्या है, इस बारे में फिर किसी जवाब में। ). पेड मीडिया से फीडिंग लेने वाले किसी भी बुद्धिजीवी या जीनियस से आप इस बारे में पूछेंगे कि फाइनेंस बिल क्या है, तो वह आपको आज भी यही बतायेगा कि इस बिल से चुनावी भ्रष्टाचार कम होगा, और चंदे में पारदर्शिता आएगी !! पारदर्शिता कैसे आएगी, इस बारे में ये बुद्धिजीवी आपको कुछ नहीं बताएँगे। क्योंकि पेड मीडिया ने भी इन्हें इस बारे में कुछ नहीं बताया है। पेड मीडिया ने इन्हें सिर्फ इतना ही बताया है कि, इससे पारदर्शिता आती है !! बस !! . कांग्रेस एवं बीजेपी को 2010 में हाई कोर्ट ने विदेशियों से चंदा लेने का दोषी ठहराया था। तब से इस मामले पर कार्यवाही लंबित थी। अत: मोदी साहेब ने इस क़ानून को भूतलक्षी प्रभाव ( Retrospectively ) के साथ छापा। यदि मोदी साहेब इस क़ानून को 10 साल पीछे जाकर यानी 2008 से भी लागू करते तो कांग्रेस एवं बीजेपी दोनों ही इस भ्रष्टाचार की चपेट में आने से बच जाते। किन्तु कांग्रेस को उनके अन्य पुराने पापो से बचाने के लिए मोदी साहेब और भी पीछे गए !! . कितना पीछे ? . मोदी साहेब ने इस बिल को 42 साल पीछे जाकर यानी 1976 से लागू किया !! मतलब 2010 में कांग्रेस-बीजेपी ने जो अपराध किया था और जो मामला अभी चल रहा है , वह अपराध अब गैर कानूनी नहीं रह गया है , बल्कि कानूनी हो गया है !! और 1976 के बाद में किये गए ऐसे सभी अपराध भी अब अपराध नहीं रहे !! बताइये !! . जब मोदी साहेब ने यह क़ानून छापा था तो राईट टू रिकॉल पार्टी ने इस क़ानून का विरोध किया था और उनके कार्यकर्ताओ ने पीएम को ट्विट भेजे थे कि इस बकवास क़ानून को तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाए। किन्तु उन्होंने इस क़ानून को जारी रखा। . —————— . अब 2020 में केंचुआ एवं पेड मीडिया की हरकत देखिये : . आज से 4 दिन पहले यानी 10 फरवरी 2020 को पेड नेशनल हेराल्ड एवं Paid The Print ने यह खबर लगाईं कि – चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में इलेक्टोरल बांड से पैसा जुटाने वाली जिन पार्टियों की सूची का एफिडेविट दिया है उनमे राईट टू रिकॉल पार्टी का नाम भी है !! Unrecognised parties receive funds via electoral bond scheme . These parties don't have a fixed symbol but still got cash through electoral bonds . They include Sabse Badi Party, Rashtriya Peace Party, Hindustan Action Party, Nagarik Ekta Party, Bharat Ki Lok Jimmedar Party, Vikas India Party and Right to Recall Party, according to a submission made by the Election Commission (EC) in the Supreme Court this week. A registered but unrecognised political party cannot contest elections on a fixed symbol of its own. It chooses from a list of symbols the Election Commission provides. This makes it difficult to track the electoral history of such parties. सुप्रीम कोर्ट में केंचुआ (EC) द्वारा प्रस्तुत एफिडेविट के अनुसार, इसमें सबसे बड़ी पार्टी, राष्ट्रीय शांति पार्टी, हिंदुस्तान एक्शन पार्टी, नगरिक एकता पार्टी, भारत की लोक जिम्मेदार पार्टी, विकास इंडिया पार्टी और राइट टू रिकॉल पार्टी शामिल है। . पेड नेशनल हेरल्ड एवं पेड द प्रिंट ने हवाला दिया है कि, केंचुआ ने सुप्रीम कोर्ट में यह हलफनामा दाखिल किया है। अब या तो केंचुआ का यह शपथपत्र पूरी तरह से झूठा है, या फिर पेड नेशनल हेरल्ड एवं पेड द प्रिंट को झूठी खबर लगाने के लिए भुगतान किया गया है। . सबूत ? . क्योंकि राईट टू रिकॉल पार्टी के पास कोई बैंक खाता नहीं है। और पार्टी के पास पहले भी कोई खाता नहीं रहा है। RRP ने आज तक कभी भी कोई बैंक एकाउंट नहीं खुलवाया। यह पार्टी पैसो का कोई लेनदेन करती ही नहीं है। जब से पार्टी बनी है, तब से पार्टी के पास शून्य रूपये है। कोई बैंक खाता नहीं, कोई एनजीओ नहीं, कोई ट्रस्ट नही, कोई चंदा नहीं , कोई कैश नहीं। राईट टू रिकॉल पार्टी ने आज तक कभी किसी भी रूप में कोई चंदा भी नहीं लिया है !! . और यह बात केंचुआ को भी मालूम है कि, राईट टू रिकॉल पार्टी के पास न तो कोई खाता है, और न ही इनके पास पैसा है। कैसे ? . यदि पार्टी किसी चुनाव में अपना उम्मीदवार उतारती है तो उन्हें ऑडिट करके चुनावी खर्चे का हिसाब केंचुआ को भेजना पड़ता है। तो हर विधानसभा में चुनाव में RRP पार्टी के उम्मीदवार चुनाव लड़ते है, और फिर केंचुआ को हिसाब भी भेजा जाता है। अभी तक जितनी भी बार उन्हें हिसाब भेजा गया है, उसमे राईट टू रिकॉल पार्टी की सभी एंट्रियाँ शून्य, शून्य, शून्य या Nil, Nil Nil होती है। और हिसाब की लॉग बुक में लिखा जाता है कि – कोई बैंक खाता नहीं, कोई अनुदान नहीं, कोई चंदा नहीं, कोई नकदी नहीं !! . और RRP अभी तक इस तरह 4 चुनावों का हिसाब भेज चुकी है। RRP के उम्मीदवारों को चुनाव खुद के खर्चे पर लड़ना होता है, और उन्होंने जितना खर्चा किया उसका हिसाब एक उम्मीदवार के रूप में वे सीधे केंचुआ को भेजते है। . इलेक्टोरल बांड को भुनाने के लिए इसे एकाउंट में जमा करना होता है। जब पार्टी के पास बैंक खाता ही नहीं है तो फिर पार्टी इलेक्टोरल बांड को कहाँ जमा करेगी, और कहाँ से पैसा लेगी !! बताइये !!! . यह खबर क्यों लगवायी गयी ? . इसके पीछे 2 वजहें है : 1. छवि ख़राब करना : कुछ 40 से 50 लाख पाठको तक उन्होंने यह जानकारी पहुंचा दी है कि इन लोगो को गुमनाम पैसा मिल रहा है। और पाठको की खोपड़ी में यह कील भी ठोक दी है कि, बड़ी पार्टियों को इलेक्टोरल बांड से पैसा मिले तो कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि उन्हें तो ट्रेक किया जा सकता है। पर जिन पार्टियों को परमानेंट सिम्बल नहीं मिला है उन्हें ट्रेक नहीं किया जा सकता, अत: यदि छोटी पार्टियों को इलेक्टोरल बांड से पैसा मिले तो यह खतरनाक है !! . खबर को फिर से पढ़ें कि इसे किस तरह ड्राफ्ट किया गया है -- A registered but unrecognised political party cannot contest elections on a fixed symbol of its own. It chooses from a list of symbols the Election Commission provides. This makes it difficult to track the electoral history of such parties. एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल अपने स्वयं के निर्धारित प्रतीक पर चुनाव नहीं लड़ सकता है। यह केंचुआ द्वारा प्रदान किए गए प्रतीकों की एक सूची चिन्ह चुनता है। इससे ऐसी पार्टियों के चुनावी इतिहास को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। . ( स्थायी चुनाव चिन्ह हासिल करने के लिए किसी राज्य या लोकसभा चुनाव में कुल मतों के 5% वोट लाने होते है !! ) . मतलब, न्यूज पाठक के दिमाग में यह बात डालती है कि यदि मान्यता प्राप्त पार्टी को इलेक्टोरल बांड से पैसा मिलता है तो कोई भ्रष्टाचार नहीं होता है, किन्तु छोटी पार्टियों को यदि बांड से पैसा मिले तो यह दुरूपयोग है !! क्यों ? क्योंकि स्थायी चिन्ह नहीं होने के कारण इनके इतिहास को ट्रेक नहीं किया जा सकता !! मतलब क्या है इस बात का !! . सभी रजिस्टर्ड पार्टियों की पूरी कुंडली केंचुआ के पास रहती है। 800 पेज का एप्लीकेशन जमा करना पड़ता है, तब जाकर वे साल भर में पार्टी को रजिस्टर्ड करते है। कौन पार्टी कितने उम्मीदवार उतार रही है, कहाँ से उतार रही है, सब की सूचना देनी होती है। हर उम्मीदवार को 28 पेज का एफिडेविट देना पड़ता है। चुनाव के दौरान दिन में 2 बार केंचुए को रिपोर्ट करना पड़ता है। . क्या पेम्पलेट छपवा रहे हो, किधर प्रचार कर रहे हो इत्यादि प्रकार की सभी सूचनाएं देनी होती है। इन सब से वो ट्रेक नहीं कर सकते !! लेकिन स्थायी सिम्बल मिलने के बाद वे ट्रेक कर लेंगे !! तो ठीक है, 5% वोट लाने का क़ानून निकाल दो और रजिस्टर्ड पार्टियों को परमानेंट सिम्बल दे दो, ताकि छोटी पार्टियों को भी ट्रेक कर सको। पर ऐसा तो उनने करना नहीं है !! क्योंकि इससे बड़ी पार्टियों की ताकत कम हो जायेगी। . और PMP02 एवं PMP01 के पास तो परमानेंट सिम्बल है न, तो बताओ PMP02 को पिछले साल जो 950 करोड़ और PMP01 को जो 150 करोड़ का चंदा इलेक्टोरल बांड से मिला है, उसका सोर्स क्या है ? कौनसा अखबार या केंचुआ बतायेगा कि PMP01 एवं PMP02 ये 1100 करोड़ किधर से लेकर आई है !! ट्रेक करो और बता दो !! है हिम्मत ? . 2. टाइम ख़राब करना : अभी एक लेटर केंचुआ को लिखना पड़ेगा और एक-एक लेटर पेड नेशनल हेरल्ड एवं Paid The Print को भी लिखना पड़ेगा। मतलब 12 से 14 घंटें तो इसमें ही फुंक जायेंगे। केंचुआ की यह सबसे मुख्य नीति है, छोटी पार्टियों के प्राण पीने की। वो हर महीने किसी न किसी टाइप का एक पटाका फेंकता रहता है, ताकि टाइम चूसा जा सके। वे जानते है कि, छोटी पार्टियों के पास स्टाफ वगेरह नहीं होता, तो वे उन्हें इस तरह के क्लर्की वर्क में उलझाकर रखते है। अब केंचुआ तो इस तरह के पुरजो का कोई जवाब भेजता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट जायेंगे तो वहां इनके भी बाप बैठे हुए है। . इसके बाद राईट टू रिकॉल पार्टी के कार्यकर्ताओं को आगे भी हमेशा के लिए यह स्पष्टीकरण देते रहना पड़ेगा कि, RRP को इलेक्टोरल बांड से कोई पैसा नहीं मिला। लेकिन ज्यादातर लोग RRP की बात का विश्वास नहीं करेंगे। वे केंचुआ, नेशनल हेरल्ड की बात को ही विश्वसनीय मानेंगे। तो RRP के कार्यकर्ताओ को अब आने वाले कई सालों तक भी लगातार यह स्पष्टीकरण देते रहना पड़ेगा !! और इसमें RRP के कार्यकर्ताओ के लाखों घंटे बर्बाद होते रहने वाले है !! . बुद्धिजीवी यह तर्क देंगे कि आप लोग केंचुआ एवं मीडिया हाउस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट क्यों नही गए, मानहानि का दावा क्यों नहीं किया आदि। पर बुद्धिजीवियों को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि सुप्रीम कोर्ट में पाँव रखने में भी 25 हजार का खर्चा हो जाता है, जो कि छोटी पार्टियों के लिए एक बड़ी राशि होती है। . —————- . भारत में 3 संस्थाएं ऐसी है जो 1950 से ही अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के कंट्रोल में रही। 2002 तक यह नियंत्रण बढ़ता-घटता रहा, किन्तु पेड मीडिया की शक्ति बढ़ने के कारण आज यह निर्णायक स्तर तक बढ़ गया है। इन तीनो संस्थाओ के मुखिया की नियुक्ति अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों यानी कि पेड मीडिया के प्रयोजको से कंसल्ट करने के बाद की जाती है। यदि पीएम इन 3 संस्थाओ को कंट्रोल करने की कोशिश करेगा तो अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों एवं पीएम के बीच तनाव बढ़ जाएगा, और वे पेड मीडिया का इस्तेमाल करके पीएम को गिराने की कार्यवाही करना शुरू कर देंगे। ये तीन संस्थाएं है : सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायधीश चुनाव आयुक्त रिजर्व बैंक गवर्नर इन तीनो संस्थाओ के पास पीएम को डिस्टर्ब करने और यहाँ तक की गिराने की ताकत भी है। . अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने पेड मीडिया के माध्यम से इन तीनो संस्थाओ का ऐसा हव्वा खड़ा किया हुआ है कि न तो इन संस्थाओ के मुखिया पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया जा सकता है, न ही इनके खिलाफ कभी कोई जांच खोली जा सकती है, न ही इन्हें दण्डित किया जा सकता है। . यदि पीएम इनसे पंगा लेने जाता है तो अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों द्वारा नियंत्रित पेड मीडिया इन 3 संस्थाओ के साथ खड़ा हो जायेगा और पूरे देश में इस तरह का ड्रामा स्टेज किया जाएगा कि पीएम इन “निष्पक्ष एवं संवैधानिक” संस्थाओ को दबाने या नियंत्रित करने के प्रयास कर रहा है, और पीएम की यह हरकत लोकतंत्र की हत्या है, असंवैधानिक, है आदि आदि !! . और उन्होंने पेड मीडिया के माध्यम से नागरिको के दिमाग में भी यह बात बहुत अच्छी तरह से डाली हुई है कि ये संवैधानिक संस्थाएं लोकतंत्र एवं संविधान की रक्षक है, इन पर हमला करना मतलब संविधान पर हमला है, आदि आदि, और इसी टाइप की फालतू बातें। तो जब भी पीएम एवं इन संस्थाओं के बीच आपस में टकराव आएगा तो पेड मीडिया द्वारा प्रायोजित सभी बुद्धिजीवी इन संस्थाओ के समर्थन में चले जाते है। केंचुआ एवं भ्रष्ट जजों का इस्तेमाल करके पीएम को गिराने का एक अच्छा उदाहरण आप इस जवाब में पढ़ सकते है – क्या इंदिरा गांधी वाक़ई सबसे ताक़तवर भारतीय प्रधानमंत्री थीं? . केंचुआ किस तरह पीएम एवं अन्य राजनैतिक दलों को कंट्रोल करता है ? . पहली बात तो अकेला केंचुआ अपने बूते पर पीएम का कुछ उखाड़ नहीं सकता। किन्तु पेड मीडिया के प्रायोजक केंचुआ+सुप्रीम कोर्ट+पेड मीडिया की सहायता से पीएम को 3 दिन में जमा कर सकते है। वे ऐसा कैसे करते है और कैसे कर सकते है, इसका जवाब बहुत लम्बा हो जाएगा। अत: निचे मैंने इसे संक्षेप में बताया है। . EVM पर कंट्रोल : पेड मीडिया द्वारा EVM के बारे में नागरिको को काफी अफीम पिलाई गयी है। पेड मीडिया द्वारा इसमें से एक सबसे बड़ा झूठ यह है कि PMP02 पार्टी EVM को हैक करके चुनाव जीतती है !! यह एकदम बकवास आरोप है । . (a) असल में पीएम कभी भी EVM को कंट्रोल नहीं कर सकता। चुनावों की घोषणा होने के बाद पीएम केंचुआ के दफ्तर में न तो कदम रख सकता है, न ही उन्हें कोई निर्देश दे सकता है !! केंचुआ पूरी तरह से पीएम के कंट्रोल से बाहर होता है। निम्नलिखित फैसले सिर्फ केंचुआ लेता है और पीएम का इसमें शून्य दखल होता है : EVM का डिजाइन केंचुआ तय करता है EVM कहाँ बनेगी केंचुआ तय करता है EVM कहाँ स्टोर होगी केंचुआ तय करता है इसके ट्रांसपोर्टेशन का ठेका किस कम्पनी को जाएगा, केंचुआ तय करता है यदि EVM में वोटो की हेराफेरी का कोई आरोप है, तो खुद की जांच भी केंचुआ खुद ही करता है, और खुद को क्लीन चिट भी जारी करता है !! EVM के बारे में पीएम कोई जांच नहीं खोल सकता। यदि पीएम केंचुआ से EVM का डिजाइन मांगे तो केंचुआ नहीं देगा पीएम के पास केंचुआ का सिर्फ यह इलाज है कि, पीएम सुप्रीम कोर्ट के पास जा सकता है। किन्तु यदि सुप्रीम कोर्ट और केंचुआ एक ही पाले में है तो पीएम के हाथ में कुछ नहीं है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट केंचुआ से भी आगे की आयटम है, और पीएम के काबू से बाहर है। कैसे ? सुप्रीम कोर्ट अपनी नियुक्ति खुद ही करता है। और खुद की नियुक्ति खुद करने की इस प्रक्रिया पर आपको आपत्ति है तो इसकी अपील भी खुद सुप्रीम कोर्ट में ही होती है। मतलब वे खुद के मुकदमे खुद ही सुनते है और खुद ही खुद को बरी कर देते है !! यदि पीएम कोई क़ानून छापता है तो सुप्रीम कोर्ट के पास अमुक क़ानून को केंसल करने की संवैधानिक शक्ति है सुप्रीम कोर्ट पीएम के खिलाफ कोई भी जाँच खुलवा सकता है, और पीएम के खिलाफ जांच करने वाली एजेंसी यानी सीबीआई को सीधे अपनी निगरानी में ले सकता है। सुप्रीम कोर्ट पीएम के खिलाफ कोई भी मुकदमा स्वीकार करके पीएम को दोषी ठहरा सकता है, और पीएम को जेल भी भेज सकता है !! सुप्रीम कोर्ट पर कोई आरोप भी नहीं लगाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट पर आरोप लगाना भी गैर कानूनी है !! मतलब वे अवमानना के मामले में आपको जेल में डाल देते है !! सार यह है कि, पीएम केंचुआ से इसीलिए नहीं भिड़ सकता क्योंकि केंचुआ के पीछे एनाकोंडा खड़ा है । और जैसे ही पीएम केंचुआ एवं सुप्रीम कोर्ट से टकराव लेगा वैसे ही पेड मीडिया के प्रायोजको से इशारा मिलने के बाद देश के सभी पेड पत्रकार, पेड संपादक, पेड बुद्धिजीवी, सभी राजनैतिक पार्टियो के नेता पीएम पर आरोप लगाना शुरू कर देंगे, कि पीएम संवैधानिक संस्थाओ को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है !! . दुसरे शब्दों, में पेड मीडिया के प्रायोजक भारत में EVM को जारी रखना चाहते है, ताकि EVM के माध्यम से पीएम एवं अन्य राजनैतिक पार्टियों के नेताओ की घड़ी दबाकर रखी जा सके। केंचुआ एवं सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से वे EVM को कंट्रोल करते है और EVM के माध्यम से नेताओं को। और पेड मीडिया के माध्यम से ही वे आपको यह पुड़िया देते है कि, पीएम EVM को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा है !! जबकि सच यह है कि पीएम तो खुद EVM का विक्टिम है !! . वे अपनी सभी प्रायोजित पार्टियों को समय समय पर साँसे देकर एक संतुलन बनाकर रखते है। यदि PMP02 कंट्रोल से बाहर जाने लगेगी तो वे EVM का इस्तेमाल करके PMP03 का वोट शेयरिंग बढाने लगेंगे, और PMP03 उनके एजंडे से बाहर जायेगी तो फिर से PMP01 का वोटिंग काउंट बढ़ने लगेगा। 2023 तक पेड मीडिया का इस्तेमाल करके वे PMP03 को राष्ट्रिय स्तर पर स्थापित कर देंगे और तब PMP03 2024 के चुनावों में PMP02 के नेताओं के लिए किल स्विच का काम करेगी। . (b) EVM को हैक किया जा सकता है। यह दूसरी बकवास है जिसे पेड मीडिया द्वारा EVM मुद्दे की बैंड बजाने के लिए फैलाया गया है। सच्चाई यह है कि, EVM एक इलेक्ट्रोनिक डिवाइस है, और यह उसी के इशारों पर काम करती है, जिसने इसे प्रोग्राम किया हो। मतलब EVM को प्रोग्राम किया जा सकता है, किन्तु इसे हैक नहीं किया जा सकता . EVM की प्रोग्रामिंग केंचुआ करता है, अत: EVM ठीक उसी तरह से काम करेगी जिस तरह केंचुआ चाहेगा। उन्होंने प्रोग्रामिंग शब्द को साइड में करने के लिए हैकिंग शब्द को इस तरह से फैलाया जिससे लगे कि जिस तरह इंटरनेट में हैकिंग होती है, उसी तरह से EVM भी हैक हो सकती है। जो कि एक झूठी बात है। यह थ्योरी इसीलिए गढ़ी गयी ताकि इस तथ्य को चर्चा से बाहर रखा जा सके कि केंचुआ खुद ही EVM में वोटो की हेरा फेरी करता है, और केंचुआ के अलावा यह हेरा फेरी और कोई कर भी नहीं सकता। . (c) केंचुआ जब बुलाता है तो कोई EVM का कोई हैकर नहीं जाता। . केंचुआ न तो EVM खोलने देता है, और न ही इसका डिजाइन देता है। केंचुआ का स्टेंड रहता है कि EVM में प्रोग्राम मेरा रहेगा और तुम EVM को हैक करके दिखाओ !! चूंकि केंचुआ EVM को खोलने नहीं देता, अत: कोई भी इंजीनियर उसके चेलेंज में नहीं जाता है। और इंजीनियर्स को जादू आता नहीं है !! . इस वीडियो में सोफ्टवेयर इंजीनियर राहुल मेहता जी ने जन्तर मंतर पर पब्लिक डेमो में बताया है कि, EVM में केंचुआ कैसे धांधली करता है। कृपया वीडियो देखें - https://www.youtube.com/watch?v=jnazWH5715Q&fbclid=IwAR3odKoAuVCl7B1-lfSa0pjvMkxO7c5ew8ddS2rNY-wnHO3dxp5WP8YD08o . केंचुआ किस तरह EVM में वोटो की हेराफेरी करता है इस बारे में यह जवाब पढ़ें – Pawan Kumar Sharma का जवाब - ईवीएम मशीन के साथ वीवीपैट क्यों लगाई जाती है? . समाधान ? . (1) पेड मीडिया द्वारा इस तरह की फर्जी ख़बरें छापने एवं केंचुआ द्वारा इस तरह के झूठे एफिडेविट देने जैसी हरकतें रोकने के लिए जूरी कोर्ट की जरूरत है। अभी पेड मीडिया कुछ भी उल्टा पुल्टा छाप सकता है, क्योंकि उन्हें पता है कि कोई सजा तो होने वाली नहीं है। जूरी कोर्ट आने के बाद इस तरह के मामलो की सुनवाई नागरिको की जूरी करने लगेगी, अत: पेड मीडिया एवं केंचुआ इस तरह की हरकत करने का जोखिम नहीं उठाएंगे। . (2) हमें EVM केंसल करके बेलेट पेपर की तरफ लौट आना चाहिए। जब तक भारत में EVM शुरू रहेगी तब तक पीएम एवं सभी राजनैतिक पार्टियाँ पेड मीडिया के एजेंडे को आगे बढाने के लिए बाध्य है। यदि वे पेड मीडिया के एजेंडे को आगे नहीं बढ़ाएंगे तो पेड मीडिया EVM का इस्तेमाल करके उन्हें चुनाव हर देगा। . पेड मीडिया के प्रयोजको का एजेंडा क्या है, और कैसे वो भारत के पीएम को कंट्रोल करते है इस बारे में विस्तृत रूप से मैं फिर किसी जवाब में लिखूंगा। ————-
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