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Sonu Kumar

Sonu Kumar

@sonukumai


#06 विदेशी निवेश में कटौतियां

संवेदनशील क्षेत्रो में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमती दिए जाने के कारण भारत में विदेशियों का नियंत्रण लगातार बढ़ रहा है। यह कानून भारत के संवेदनशील क्षेत्रो में FDI पर रोक लगाकर सिर्फ सम्पूर्ण रूप से भारतीय नागरिको के स्वामित्व वाली कंपनियों की कारोबार करने की अनुमति देता है। कृपया ध्यान दें कि यह कानून सभी क्षेत्रो में FDI पर प्रतिबन्ध नहीं लगाता, बल्कि सिर्फ संवेदनशील क्षेत्रो में FDI पर निर्वन्धन लगाता है। इस कानून को संसद से साधारण बहुमत द्वारा पारित करके गेजेट में छापा जा सकता है। इस क़ानून का पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें

Tinyurl.com/ReduceFDI

प्रस्तावित विदेशी निवेश में कटौतियां क़ानून के मुख्य बिंदु निचे दिए गए है

कोई भी कंपनी अपने आप को वोइक यानी सम्पूर्ण रूप से भारतीय नागरिको के स्वामित्व वाली कम्पनी (Woic = Wholly Owned by Indian citizens Company) के रूप में पंजीकृत करवा सकती है। वोइक कम्पनी से आशय ऐसी किसी कम्पनी से है जिसके 100% अंश (Share) भरतीय नागरिको या भारतीय सरकार या किसी अन्य बोइक कंपनी के पास हों, और अमुक कम्पनी के कोई भी शेयर विदेशियों के पास न हों। निचे दिए गए क्षेत्रो में सिर्फ बोइक कम्पनियां ही कारोबार करेगी।

1. सिर्फ वोइक कम्पनियां ही संचार एवं मीडिया के क्षेत्र में काम कर सकेगी। संचार एवं मीडिया में सभी पाठ्य, दृश्य, श्रव्य माध्यम जैसे अखबार, मैगजीन, चैनल्स, फ़िल्में, इंटरनेट सेवाएं, सोशल मीडिया एवं टेलिकॉम आदि शामिल है।

2. गैर वोइक कम्पनी को भारत में बैंक एवं बीमा कम्पनी खोलने या ऐसी कोई भी वित्तीय कम्पनी खोलने की अनुमति नहीं होगी जो जमाएं (Deposits) स्वीकार करती है। राष्ट्रियकृत बैंक (Nationalised Bank) सिर्फ बोइक कम्पनी को ही कर्ज दे सकेंगे।

3. सिर्फ वोइक कम्पनियां ही रेलवे, सेटेलाईट एवं रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में कार्य करेगी। रक्षा उत्पादन में हथियार निर्माण एवं सैन्य उपकरण शामिल है।

4. सिर्फ बोइक कम्पनी को ही खनन (Minerals) एवं ऊर्जा (Power) के क्षेत्र में काम करने की अनुमति होगी।

5. सिर्फ वोइक कम्पनियां ही शैक्षिक निकाय, शिक्षा बोर्ड, विद्यालय एवं विश्वविद्यालय खोल सकेगी।

6. गैर बोइक कम्पनी भारत में कोई भी भूमि एवं निर्माण नहीं खरीद सकेगी, और न ही इन्हें 25 साल से अधिक अवधि के लिए किराये पर ले सकेगी।

7. मॉरीशस संधि, फिजी संधि, सिंगापुर संधि एवं इस प्रकार की सभी संधिया जो विदेशी पूँजी पर कम दर से आयकर, या कम दर से पूंजीगत लाभ कर लगाती है, अब से निरस्त की जाती है।

[टिप्पणी : यदि इस खंड की कोई धारा विश्व व्यापार संगठन (WTO) के किसी समझौते का उलंघन करती है तो WTO भारत को समझौते से बाहर कर सकता है, या प्रधानमंत्री भारत को WTO समझौते से अलग करने के लिए आवश्यक अधिसूचना जारी कर सकते है।]

राजवर्ग प्रजा के अधीन रहना चाहिए, वर्ना वो प्रजा को लूट लेगा और राज्य का विनाश होगा - अथर्ववेद

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*क्यों चुनावो में पार्टी के उम्मीदवारों को ही विजय मिलती है और योग्य होने के बावजूद निर्दलीय प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो जाती है, और कैसे यह व्यवस्था लोकतंत्र का गला दबाकर राजनीति में कुछ परिवारों का दबदबा बनाए रखती है, और कैसे इस समस्या को हल किया जा सकता है ?*
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चुनावो की तारीख घोषित होने से लेकर प्रचार करने और मतदान होने तक की सारी प्रक्रियाएं लगभग एक माह के भीतर पूर्ण हो जाती है। मतदान के लिए सिर्फ एक दिन का वक्त होता है। आपको जो कुछ भी करना है इन कुछ दिनों में ही करना होता है। पार्टियो के पास संगठन होता है, सभी वार्डो, मुहल्लों, गाँवों, तहसीलों आदि में कार्यकर्ता होते है, और खर्च करने के लिए बेतहाशा रुपया होता है। इस तरह से इस तेज गति की दौड़ में बढ़त बना लेने के लिए उनके पास पर्याप्त संसाधन होते है। उन्हें सिर्फ टिकेट लाना होता है। एक बार यदि टिकेट मिल जाए तो पार्टी के ये सभी संसाधन उसके हो जाते है। इस तरह से कोई नामालूम, निकम्मा, कमीना, भ्रष्ट और आपराधिक छवि का व्यक्ति भी अगर टिकेट ले आता है तो वह बिना कुछ किये ही चुनावी जीत का दावेदार हो जाता है।
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जबकि किसी स्वतंत्र उम्मीदवार के पास इतना बड़ा सांगठनिक ढांचा, कार्यकर्ता और चुनाव लड़ने के लिए पैसा नहीं होता। और इतने कम समय में वह कितनी भी मेहनत करके इन्हें जुटा भी नहीं पाता है। इस तरह से संसाधन विहीन स्वतंत्र उम्मीदवार के लिए बराबर के मुकाबले के अवसर समाप्त हो जाते है। गुटबंदी और पैसा देकर प्रत्याशी टिकेट ले आते है और मतदाताओ को बाध्य होकर इन्हें ही चुनना होता है।
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समस्या -- चुनाव प्रचार के लिए समय की कमी होने और मतदान के लिए सिर्फ एक दिन तय होने के कारण पूरी शक्ति प्रचार में झोंकनी होती है। सिर्फ इसी कारण से संसाधन युक्त पार्टी के उम्मीदवार अपनी बढ़त बना लेते है, और योग्य होने के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार पिछड़ जाते है। यदि निर्दलीय उम्मीदवार पार्टी खड़ी करने पर काम करेंगे तो उन्हें दशको लग जाएंगे।
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समाधान :
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१) मतदान अवधि की सीमा बढ़ाना --- यदि मतदान को 365 दिनों और 5 वर्ष के लिए खोल दिया जाए तो स्थिति पलट जायेगी। इससे कम संसाधन होने के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार बिना किसी संगठन के भी धीमे धीमे अपना प्रचार करते रह सकते है। इससे उनके पास मतदाताओ तक पहुँचने के लिए पर्याप्त अवसर रहेगा। जब भी कोई मतदाता किसी उम्मीदवार से सहमत होता है, वह अपनी इच्छा से तब उसे वोट कर सकेगा। इस तरह से चुनाव पार्ट टाइम गतिविधि बन जायेगी और उम्मीदवारों को हड़बड़ी में अपने संसाधन नहीं झोंकने पड़ेंगे।
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२) जिस तरह बैंक अपना काउंटर लेकर रोज हमारे मोहल्ले में आकर नहीं कहता कि आज कि आज अपना पैसा निकालो या जमा कराओ, और फिर अगले 5 वर्ष तक किसी प्रकार का लेनदेन नहीं होगा, उसी तरह से मतदान में भी ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें ऐसी प्रक्रिया लागू करनी चाहिए जिससे जिस व्यक्ति के पास जब समय हो वो उस समय पटवारी कार्यालय या कलेक्ट्री में जाकर अपना वोटर कार्ड दिखाकर अपना वोट दे सके। इस व्यवस्था के आने से चुनाव आयोग को मतदान के लिए अपनी भारी भरकम मशीनरी नहीं लगानी होगी, तथा चुनावो का खर्च बच जाएगा।
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३) वोट वापिस लेने का अधिकार --- कई बार मतदाता धुँवाधार प्रचार की चपेट में आकर गलत उम्मीदवार चुन लेते है। लेकिन उनके पास अपना वोट बदल लेने का कोई मौका नहीं होता। किसी भी समय वोट करने के साथ ही मतदाता को अपना वोट बदलने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए। यदि किसी जनप्रतिनिधि के के मतों में एक निश्चित प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज की जाए व किसी अन्य उम्मीदवार को एक वर्तमान प्रतिनिधि से अधिक मत मिल जाए तो अधिक मत वाला उम्मीदवार पद ग्रहण कर लेगा। इस व्यवस्था से मौजूदा प्रतिनिधियों पर लगातार अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव बना रहेगा।
#वोट_वापसी_पासबुक
#जूरी_कोर्ट
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हमारे आंदोलन से जुड़ने ,आंदोलन के कार्यकर्ता बनने के लिए 98877 42837 पर संपर्क कर सकते हैं l

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#10 राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड

यह कानून शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी की तर्ज पर सनातनी हिन्दुओं के लिए एक धार्मिक ट्रस्ट का गठन करता है। इस ट्रस्ट का नाम राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड (RH.B.) होगा तथा इस ट्रस्ट का अध्यक्ष हिन्दू बोर्ड प्रधान कहलायेगा। राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड की मुख्य कार्यकारिणी में 1 प्रमुख एवं 4 न्यासियो सहित कुल 5 व्यक्ति होंगे। यह क़ानून सरकार द्वारा हथियावे जा चुके सभी देवालयों को भी सरकारी नियन्त्रण से मुक्त करता है। इस क़ानून को संसद से पास करने की जरूरत नही है। प्रधानमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है। इस क़ानून का पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें- Tinyurl.com/HinduBoard

प्रस्तावित राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड क़ानून के मुख्य बिंदु निचे दिए गए है

1. प्रधानमंत्री एक अधिसूचना जारी करके राम जन्म भूमि देवालय, अयोध्या का स्वामित्व हिन्दू बोर्ड को सौंपेंगे। इसके अलावा हिन्दू बोर्ड उन सभी देवालयों का भी प्रबंधन करेगा जिन्हें किसी मंदिर के मालिको ने इसे स्वेच्छा से सौंप दिया है।

2. बोर्ड उन देवालयों का अधिग्रहण / प्रबंधन नहीं करेगा जिनकी देख-रेख देवालय के मालिक RHB से नहीं कराना चाहते। हिन्दू बोर्ड प्रधान और न्यासी अपने नियंत्रण में मौजूद देवालयो को प्राप्त हुए दान को इस तरह खर्च करेंगे कि सनातन संस्कृति का सरंक्षण हो।

3. भारत में निवास करने वाला प्रत्येक हिन्दू इस बोर्ड का वोटिंग मेम्बर बन सकेगा। यहाँ हिन्दू से आशय है - उन सभी समुदायों, पन्थो, सम्प्रदायों के अनुयायी जो स्वयं को हिन्दू या सनातनी या सनातनी हिन्दू कहते है।

4. इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी एवं अन्य धर्म जो भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उत्पन्न हुए है, के अनुयायी स्पष्ट रूप से इस क़ानून के दायरे से बाहर रहेंगे, एवं वे इस बोर्ड के वोटींग मेंबर नहीं बन सकेंगे। सभी प्रकार की मस्जिदे, चर्च, गुरूद्वारे, बौद्ध, जैन तीर्थ स्थल आदि हिन्दू बोर्ड के दायरे से बाहर रहेंगे।

5. यदि आप हिन्दू बोर्ड के सदस्य बनते है तो आपको एक बोट वापसी पासबुक मिलेगी ताकि आप हिन्दू बोर्ड प्रधान को बदलने के लिए स्वीकृति दे सके।

6. यदि हिन्दू बोर्ड प्रधान या उसके स्टाफ के खिलाफ कोई शिकायत आती है तो मामले को सुनने और दंड देने की शक्ति जजों के पास न होकर हिन्दू नागरिको की जूरी के पास रहेगी। प्रत्येक मामले के लिए अलग से जूरी होगी और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी।

वर्तमान हिन्दू मंदिरों में धन के समाज में बांटने सम्बन्धी निर्णय मंदिर प्रमुख या संप्रदाय प्रमुख द्वारा लिए जाते है, तथा इनका ही मंदिरों की संपत्ति के उपयोग पर पूर्ण नियंत्रण होता है। ट्रस्टी का पद उत्तराधिकार तथा गुरु प्रथा द्वारा हस्तांतरित होता है। मतलब आज का गुरु ही अगला गुरु नियुक्त करता है। आजीवन कार्यकाल होने के कारण यहाँ संपत्ति इकठ्ठा करने की ओर झुकाव होता है, तथा इसका उपयोग तड़क-भड़क, दिखावे एवं ऐशो आराम में भी किया जाता है। सिक्खों में अकाल तख्त के ग्रंथी चुन कर आते है, और सीमित कार्यकाल (4 वर्ष) होने के कारण वे फिर से चुन कर आने के लिए गुरुद्वारो में आए दान को परोपकारी कार्यों में खर्च करने पर अधिक भार देते है। हिन्दू बोर्ड क़ानून के आने से हिन्दू मंदिरों में भी इसी तरह का अपेक्षित सुधार आएगा।

राजवर्ग प्रजा के अधीन रहना चाहिए, वर्ना वो प्रजा को लूट लेगा और राज्य का विनाश होगा - अथर्ववेद

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#07 सरकारी जमीन किराया बँटवारा

(सरकारी जमीन का किराया सीधे नागरिको के खातों में भेजने का प्रस्ताव)

इस कानून का उद्देश्य सरकारी स्वामित्व वाले उन सभी भूखंडों को बाजार में लाना है जो सरकार एवं जनता के किसी भी उपयोग में नहीं आ रहे है। निचे इस प्रस्तावित कानून के मुख्य बिंदु दिए गए है। हेश: #SaJaKiBa

(1)

इस कानून के लागू होने पर केंद्र एवं राज्य सरकार के स्वामित्व वाले ऐसे सभी भूखंड जो आज खाली पड़े है, को 5 से 25 वर्ष की अवधि की लीज पर दिया जाएगा। इस भूमि से प्राप्त किराए से इकट्ठा हुयी राशि सभी भारतीयों में बराबर बटेंगी। प्रत्येक भारतीय को यह राशि हर महीने सीधे बैंक खाते में जमा कर दी जायेगी।

> उदाहरण के लिए दिल्ली 1500 करोड़ स्क्वायर फुट में फैली हुई है, और इसमें से 300 करोड़ स्क्वायर फुट जमीन सरकार के पास खाली पड़ी है। और इसी तरह सरकार के पास पूरे भारत में (अहमदाबाद में 50 करोड़ स्क्वायर फुट, जयपुर में 70 करोड़ स्क्वायर फुट) कीमती जमीनें है, जिनका कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा। यह सारी जमीन किराए / लीज पर दे दी जायेगी।

(2)

जमीनों को किराए पर देकर पैसा इकठ्ठा करने वाला राष्ट्रिय किराया अधिकारी वोट वापसी पासबुक के दायरे में होगा। यदि किराया अधिकारी ठीक से काम नहीं कर रहा है तो नागरिक बोट वापसी पासबुक का प्रयोग करके उसे बदलने के लिए अपनी स्वीकृति दे सकेंगे।

> यदि किराया अधिकारी को वोट वापसी पासबुक के दायरे में नहीं लाया गया तो किराया अधिकारी कीमती जमीनों को किराए पर नहीं देगा और कोई न कोई बहाना बताकर उनके दबा कर बैठा रहेगा, ताकि इच्छित क्षेत्र में कीमतें बढ़ने से स्थानीय बिल्डर एवं भू माफिया को फायदा हो। वोट वापसी पासबुक के दायरे में न होने पर वह किराए / लीज़ आदि की बोली लगाने में भी घपले करेगा।

(3)

यदि किराया अधिकारी या उसके स्टाफ के खिलाफ घपले आदि की कोई शिकायत आती है तो सुनवाई करने और दंड देने की शक्ति सरकार के आदमी (जज आदि) के पास न होकर नागरिक समूह (जूरी मंडल) के पास रहेगी। जूरी सिस्टम होने से भू माफिया जजों से गठजोड़ नहीं बना सकेंगे।

इस क़ानून के आने ने निम्नलिखित परिवर्तन आयेंगे :

a) बाजार में आपूर्ति बढ़ने से जमीन के दाम 50% तक कम हो जायेंगे अतः जन सामान्य कम कीमतों पर घर/दूकान हेतु जमीन खरीद सकेगा।

b) जिन व्यक्तियों ने रहने या कारोबार के लिए जमीन किराए पर ले रखी है उन्हें 2000 से 10,000 रू महीना की बचत होगी।

c) सरकारी जमीन के किराए से प्राप्त होने वाली राशि नागरिको को मिलने से नागरिको को प्रति माह 400 से 500 रू की आय होगी।

इस क़ानून का पूरा ड्राफ्ट दिए गए QR कोड़ से डाउनलोड करें या इस लिंक पर जाएं - Tinyurl.com/Khamba2

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#24 वोट वापसी मुख्यमंत्री

यह प्रस्तावित क्रानून मुख्यमंत्री को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाता है। इस कानून को विधानसभा से पास करने की जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है। यह क़ानून आने से प्रत्येक मतदाता को एक बोट वापसी पासबुक मिलेगी। तब यदि आप मुख्यमंत्री के काम से संतुष्ट नहीं है, और उसे बदलना चाहते है तो पटवारी कार्यालय में स्वीकृति के रूप में अपनी हाँ दर्ज करवा सकते है। आप अपनी हाँ SMS, से भी दर्ज करवा सकेंगे। आप किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दे सकते है, या इसे रद्द कर सकते है। यह स्वीकृति आपका बोट नही है। बल्कि एक

सुझाव है। इस कानून का पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें- Tinyurl.com/VvpCm

मुख्यमंत्री को बदलने की प्रक्रिया के मुख्य बिंदु निचे दिए है

(1)

मुख्यमंत्री के लिए आवेदन: 30 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी भारतीय नागरिक यदि मुख्यमंत्री बनना चाहता है तो वह कलेक्टर के सामने ऐफिडेविट प्रस्तुत कर सकता है। कलेक्टर 10,000 रु का शुल्क लेकर उसे मुख्यमंत्री का प्रत्याशी घोषित करेगा, और एफिडेविट को मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर सार्वजनिक करेगा।

(2)

पदासीन मुख्यमंत्री निचे दी गयी दो स्थितियों में से अपनी पसंद के अनुसार उच्च संख्या को चुन सकते है:

नागरिको द्वारा दी गयी स्वीकृतियों की संख्या, अथवा

मुख्यमंत्री का समर्थन करने वाले विधायको को चुनाव में प्राप्त हुए मतों का कुल योग।

(3)

यदि किसी प्रत्याशी की स्वीकृतियों की संख्या पदासीन मुख्यमंत्री की स्वीकृतियों या मुख्यमंत्री का समर्थन करने वाले विधायको को प्राप्त मतों की कुल संख्या से 10 लाख अधिक हो जाती है तो विधायक सबसे अधिक अनुमोदन प्राप्त करने वाले व्यक्ति को नया मुख्यमंत्री नियुक्त सकते है या उन्हें ऐसा करने की जरुरत नहीं है।

स्पष्टीकरण : मान लीजिये कि, 3 करोड़ आबादी एवं 200 विधानसभा सीटो के राज्य में X मौजूदा सीएम है, और उसे विधानसभा में 120 विधायको का समर्थन प्राप्त है। मान लीजिये, इन 120 विधायको को चुनाव में कुल 1 करोड़ मत मिले थे, और X को नागरिको से सीधे प्राप्त होने वाली स्वीकृतियो की संख्या 80 लाख है।

1. मान लीजिये, Y सीएम का एक प्रत्याशी है और उसे 90 लाख नागरिक स्वीकृतियां दे देते है तो भी x सीएम बना रहेगा, क्योंकि X को जिन विधायको का समर्थन प्राप्त है, उनके मतों का योग 1 करोड़ है। किन्तु यदि Y को 1.10 करोड़ स्वीकृतियां मिल जाती है तो x अपना इस्तीफा दे सकता है।

2. अब मान लीजिये, ४ को 1.10 करोड़ स्वीकृतियां मिल जाती है, किन्तु यदि x सीएम के रूप में संतोषप्रद काम कर रहा है, अतः X की स्वीकृतियां बढ़कर यदि 1.15 करोड़ हो जाती है, तो भी X सीएम बना रहेगा।

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क्यों हम साधारण नागरिक रिकालिस्ट्स बन गए?

तो किस प्रेरणा ने हमें रिकालिस्ट्स बना दिया? हमें नहीं पता कि, किस प्रेरणा ने हमें रिकालिस्ट्स बना दिया। न ही हम यह जानते है कि हमारे द्वारा लिखे गए विवरणों को पढ़कर कई कार्यकर्ता क्यों रिकालिस्ट्स बन गए। न ही हमें इस कारण का कोई अंदाजा कि क्यों 1920 में महात्मा चन्द्रशेखर आजाद रिकालिस्ट्स बन गए, और क्यों 1927 में अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह जी रिकालिस्ट बन गए थे। हालांकि इस सम्बन्ध में हमारे पास कोई ठोस कारण नहीं है, कि किस विचार ने हमें रिकालिस्ट्स बनने की प्रेरणा दी। लेकिन जितना हम देख पाते है, हमें इसके दो संभावित कारण नज़र आते है;

1. सहज बोध यानी कॉमन सेन्स (Common sense)

2. अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, पाकिस्तान, सऊदी अरब तथा बांग्लादेश आदि से होने वाले युद्ध का भय।

(2.1) सहज बोधः पहला कारण सीधा सादा सहज बोध है। सामान्य समझ, जो कि हर मनुष्य में स्वाभाविक तौर पर मौजूद होती है। सबसे पहले हम आपसे एक सवाल करना चाहेंगे। यदि आप इस सवाल का जवाब देने से इंकार करते है, तो हम आपको अपनी बात नहीं समझा पाएंगे। इसलिए हमारा आग्रह है कि आप इस सवाल का अपने विवेक से जवाब दें। इसके उपरान्त ही आगे पढ़े।

मान लीजिये कि आप एक कारखाने के मालिक है, जिसमे 1000 कर्मचारी और प्रबंधक वगेरह कार्य करते है। और अचानक सरकार निम्नांकित क़ानून लागू कर देती है:

1. आप किसी भी प्रबंधक को 60 वर्ष की आयु पूर्ण करने से पहले, तथा किसी भी कर्मचारी को 5 वर्ष से पहले नौकरी से नहीं

निकाल सकेंगे।

2. आपको सभी कर्मचारियों को अगले 5 वर्ष के लिए और प्रबंधको को उनकी 35 वर्षीय सेवाकाल के लिए देय वेतन हेतु अग्रिम भुगतान के चेक देने होंगे।

3. यहां तक कि यदि कोई आपके कारखाने से सामान की चोरी कर रहा है तो, किसी न्यायधीश की अनुमति बिना, न तो आप उसे निकाल सकेंगे न ही दंड दे सकेंगे, न ही उसे आपके कारखाने में आने से रोक सकेंगे।

हमारा आपसे सवाल है कि ऐसी स्थिति में 'अगले 3 महीनो में आपके कारखाने में अनुशासन का स्तर सुधरेगा या बिगड़ेगा'?

कृपया इस सवाल का जवाब देने के बाद ही आप आगे पढ़े। हम अपना प्रश्न फिर से दोहराते है: 'क्या इन कानूनो के आने के बाद, अगले 3 महीनो में आपके कारखाने में कर्मचारियों और प्रबंधको के अनुशासन का स्तर सुधरेगा या बिगड़ेगा'?

दूसरे शब्दों में, यदि हम नागरिको के पास जजो, सांसदों, विधायको, मंत्रियो, प्रशासनिक अधिकारियों आदि को नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं हुआ तो, ये सभी पदाधिकारी भ्रष्ट और अनुशासनहीन हो जाएंगे। इसीलिए महात्मा चंद्रशेखर आजाद ने 1925 में कहा था कि वोट वापसी कानूनो के अभाव में लोकतंत्र एक मजाक बन कर रह जाएगा'। ठीक यही बात महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के छठे अध्याय के प्रथम पृष्ठ में कही थी कि -

यदि राजा प्रजा के अधीन नहीं हुआ तो, वह प्रजा को लूट लेगा और राज्य का विनाश होगा।

जूरी प्रक्रियाएं ग्रीस में 600 ईसा पूर्व लागू हुयी थी। जिसके परिणामस्वरूप ग्रीस अपने आप को इतना ताकतवर बना पाया कि उन्होंने सिर्फ 1 लाख सैनिको की मदद से अपने साम्राज्य का विस्तार तुर्की से लेकर यमुना नदी के किनारे तक कर लिया था। अमेरिका में 1750 ईस्वी में बोट वापसी एवं जूरी प्रक्रियाएं लागू हुई, और यह मुख्य कारण था जिससे अमेरिका इराक़, सऊदी अरब, पाकिस्तान और लीबिया को कब्जे में कर पाया। अमेरिका की सूची में अगले नाम ईरान और भारत है। लेकिन किसी सामान्य समझ के व्यक्ति को वोट वापसी एवं जूरी प्रक्रियाओं की उपयोगिता समझने के लिए इतिहास की किताबो के पन्ने पलटने या अमेरिका के उदाहरण देखने की जरुरत नहीं है - क्योंकि बोट वापसी एवं जूरी प्रक्रियाओ का महत्त्व समझने के लिए जिस चीज की आवश्यकता है, वह 'कॉमन सेन्स' है।

हमारे देश से जुडी नागरिक समस्याएं किसी भी प्रकार से उस कारखाने की स्थिति से अलग नहीं है, जहां कारखाने के मालिक को अपने कर्मचारियों और प्रबंधको को 5-35 वर्ष तक नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं दिया गया है। हमारे देश की समस्याओ का समाधान भी वही है, जो कि अमुक कारखाने की समस्याओ का समाधान है 'भ्रष्ट जजो, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियो को नौकरी से निकालने का अधिकार नागरिको के बहुमत को दे दिया जाए'। यह पुस्तक जूरी प्रक्रियाओ एवं बोट वापसी कानूनो के बारे में है, जिनकी सहायता से भारत के नागरिक "बहुमत का प्रदर्शन" करके भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओ को नौकरी से निकाल सकेंगे। पुस्तक में वे विवरण भी दर्ज किये गए है, जिनका पालन करके इन प्रक्रियाओ को जन साधारण देश में लागू करवा सकेंते है ।

*The Greatest Revolutionary Book in the history of mankind " VOTEVAPSI DHANVAPASI " describing root cause of every problem our society/ Country is facing as a whole & most importantly permanent solutions to end the same* 🇮🇳 🔥

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सूचना : *वोटवापसी जूरी खंबा आंदोलन(राईट टू रिकॉल पार्टी इसका एक हिस्सा है)का राष्ट्रिय घोषणा पत्र* अब अमेजन, फ्लिपकार्ट एवं नोशन प्रेस पर पेपर बेक संस्करण में उपलब्ध है :
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पुस्तक का नाम - " *वोट वापसी धन वापसी* "
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भाग - 1 ; 192 पृष्ठ , भाग - 2 ; 200 पृष्ठ
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(1) Notion press store :
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Discount coupon code : RECALLIST
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वोट वापसी धन वापसी भाग -1
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https://notionpress.com/read/vote-vapsi-dhan-vapasi-part-1
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वोट वापसी धन वापसी भाग - 2
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https://notionpress.com/read/vote-vapasi-dhan-vapasi-part-2
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पीडीऍफ़ डाउनलोड - tinyurl.com/SolutionRTR
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रिकालिस्ट्स ...

हम अपने आप को इसी नाम से पुकारते है- रिकालिस्ट्स। हम रिकालिस्ट्स है।

हम रिकालिस्ट्स भारत के वे साधारण नागरिक है जो यह मानते है कि, नागरिको को प्रधानमन्त्री एवं मुख्यमंत्री को पोस्टकार्ड एवं ट्विट भेजकर यह आदेश भेजना चाहिए कि भारत में वोट वापसी प्रक्रियाएं लागू करने के लिए जूरी कोर्ट एवं अन्य आवश्यक क़ानून ड्राफ्ट प्रकाशित किये जाए प्रकाशित किये जाए, ताकि भारत के नागरिक जरूरत पड़ने पर प्रधानमन्त्री, सुप्रीम कोर्ट जज, रिजर्व बैंक गवर्नर, लोकपाल आदि को नौकरी से निकालने के लिए अपनी स्वीकृति दर्ज कर सके। भारत में हम रिकालिस्ट्स 1925 से यह मांग कर रहे है।

अहिंसामूर्ती महात्मा चन्द्रशेखर आजाद एवं अहिंसामूर्ती महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल ने 1925 में अपनी संस्था 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोशिएसन' के घोषणा पत्र में कहा था कि -

हम जिस गणराज्य की स्थापना करना चाहते है, उसमे नागरिको के पास वोट वापिस लेने का अधिकार होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो लोकतंत्र एक मजाक बन कर रह जाएगा।

(Reference: tinyurl.com/HsraManifesto)

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सूचना : *वोटवापसी जूरी खंबा आंदोलन(राईट टू रिकॉल पार्टी इसका एक हिस्सा है)का राष्ट्रिय घोषणा पत्र* अब अमेजन, फ्लिपकार्ट एवं नोशन प्रेस पर पेपर बेक संस्करण में उपलब्ध है :
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पुस्तक का नाम - " *वोट वापसी धन वापसी* "
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भाग - 1 ; 192 पृष्ठ , भाग - 2 ; 200 पृष्ठ
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(1) Notion press store :
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Discount coupon code : RECALLIST
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वोट वापसी धन वापसी भाग -1
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https://notionpress.com/read/vote-vapsi-dhan-vapasi-part-1
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वोट वापसी धन वापसी भाग - 2
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https://notionpress.com/read/vote-vapasi-dhan-vapasi-part-2
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भाग -1 : https://www.amazon.in/dp/B09NM3L3MG/ref=cm_sw_r_apan_glt_i_XGRT0J3BJ68G2XJTVWD0?fbclid=IwAR3I-AoOMea5Ox891B4UMOUuDvnkcCZfA91LJeoVJS_2CMfOw_HTWu4GpF8
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भाग - 2 : https://www.amazon.in/dp/B09NM6MK6J/ref=cm_sw_r_apan_glt_i_7XC3G3J5BJCGS472Z1FX?fbclid=IwAR1WwF5er71QB7X1BGSIKiO6aP_u2j3UtbdqHwC_81XNN_5XTiGNVc2fxDs
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फ्लिपकार्ट :
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भाग 1 : https://dl.flipkart.com/s/WKEjIiNNNN
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भाग 2 : https://dl.flipkart.com/s/lMwrEpuuuN
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पीडीऍफ़ डाउनलोड - tinyurl.com/SolutionRTR
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इस पुस्तक के बारे में: भारत में पिछले 21 वर्षों से "अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी से प्रेरणा लेने वाले कार्यकर्ता" जूरी कोर्ट, वोट वापसी पासबुक, रिक्त भूमि कर एवं धनवापसी पासबुक क़ानून ड्राफ्ट्स के नेतृत्व में जन आन्दोलन खड़ा करने के लिए प्रयासरत है। राईट टू रिकॉल पार्टी इसी जन आन्दोलन का एक हिस्सा है। इस पुस्तक में मुख्य रूप से निम्न तरह की जानकारियां दी गयी हैः

1. वे इबारते दी गयी है जिन्हें गेजेट में छापकर गरीबी, भ्रस्टाचार आदि समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

2. भारत की पुलिस एवं अदालतो में इतना भ्रष्टाचार क्यों है, और कौनसे क़ानून गेजेट में छापकर हम इसे ठीक कर सकते है।

3. किन कानूनों की वजह से अमेरिका-ब्रिटेन जैसे देश तकनिकी उत्पादन में दुनिया के अन्य देशो से बहुत आगे निकल गए 4. कौनसे कानून गेजेट में छापकर भारत स्वदेशी हथियारों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।

5. कैसे पेड मीडिया के प्रायोजक भारत के राज नेताओं को नियंत्रित करके भारत की जमीन एवं संसाधनों का इस्तेमाल चीन के खिलाफ युद्ध में करना चाहते है।

6. भारत में निरंतर बढ़ रहे हिन्दू मुस्लिम तनाव का कारण, और कैसे हिन्दू धर्म को इतना मजबूत बनाया जा सकता है कि भारत में मिशनरीज के विस्तार एवं इस्लाम के बढ़ते हुए गलत प्रभाव को रोका जा सके

संस्थापनाः राईट टू रिकॉल ग्रुप की शुरुआत श्री राहुल चिमनभाई मेहता ने 1999 में की थी। उन्होंने 1990 में IIT Delhi से कम्प्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग और 1992 में अमेरिका की रटगर्स यूनिवर्सिटी से Master of Science की डिग्री हासिल की।

1990 से 1999 तक अमेरिका में अपने प्रवास के दौरान उन्होंने यह अनुसन्धान किया कि पुलिस, अदालतों एवं टेक्स के बेहतर कानूनों की वजह से अमेरिका-ब्रिटेन जैसे देश भारत एवं शेष देशो से तकनिकी उत्पादन के क्षेत्र में आगे, बहुत आगे निकल गए।

1999 में भारत लौटने के बाद उन्होंने जूरी कोर्ट, बोट वापसी, रिक्त भूमि कर एवं धन वापसी पासबुक आदि कानून ड्राफ्ट्स के बारे में नागरिको को सूचित करना शुरू किया।

मेहता जी ने 2010 में पार्टी के मेनिफेस्टो का पहला संस्करण प्रकाशित किया था, जिसे आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते है - Rahulmehta.com/301.h.htm

पुस्तक का नाम - " *वोट वापसी धन वापसी* "
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भाग - 1 ; 192 पृष्ठ , भाग - 2 ; 200 पृष्ठ
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(1) Notion press store :
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Discount coupon code : RECALLIST
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वोट वापसी धन वापसी भाग -1
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https://notionpress.com/read/vote-vapsi-dhan-vapasi-part-1
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वोट वापसी धन वापसी भाग - 2
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https://notionpress.com/read/vote-vapasi-dhan-vapasi-part-2
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(2) अमेजन :
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भाग -1 : https://www.amazon.in/dp/B09NM3L3MG/ref=cm_sw_r_apan_glt_i_XGRT0J3BJ68G2XJTVWD0?fbclid=IwAR3I-AoOMea5Ox891B4UMOUuDvnkcCZfA91LJeoVJS_2CMfOw_HTWu4GpF8
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भाग - 2 : https://www.amazon.in/dp/B09NM6MK6J/ref=cm_sw_r_apan_glt_i_7XC3G3J5BJCGS472Z1FX?fbclid=IwAR1WwF5er71QB7X1BGSIKiO6aP_u2j3UtbdqHwC_81XNN_5XTiGNVc2fxDs
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फ्लिपकार्ट :
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भाग 1 : https://dl.flipkart.com/s/WKEjIiNNNN
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भाग 2 : https://dl.flipkart.com/s/lMwrEpuuuN
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पीडीऍफ़ डाउनलोड - tinyurl.com/SolutionRTR
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(01) वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति मादुरो ने EVM के साथ VVPAT का इस्तेमाल किया। VVPAT में मतदाता के हाथ में एक काग़ज़ी पर्ची दी जाती है और मतदाता को वह पर्ची बॉक्स में डालनी होती है।
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(02) लेकिन पूरे वेनेज़ुएला में एक भी VVPAT की गिनती नहीं की गई। EVM ने परिणामों को एक सुरक्षित नेटवर्क के ज़रिए सीधे केंद्रीय कक्ष (सेंट्रल रूम) में इलेक्ट्रॉनिक रूप से भेज दिया।
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(03) केंद्रीय कक्ष ने यह घोषित कर दिया कि मादुरो को 52% वोट मिले हैं !!!
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(04) जो लोग EVM के ख़िलाफ़ थे, उन सभी को “USA के एजेंट” कहकर बदनाम किया गया और फिर पुलिस द्वारा पीटा गया !!
क्या यह कुछ जाना-पहचाना नहीं लगता?
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(05) वेनेज़ुएला के कार्यकर्ताओं को मेरा प्रस्तावित समाधान यह है —
वैकल्पिक OPEN VOTE (खुले मतदान) के लिए जनमत-संग्रह (Referendum) कराया जाए और यह तथ्य व्यापक रूप से प्रचारित किया जाए कि
1792 से 1882 के बीच, पूरे अमेरिका में राष्ट्रपति, लोकसभा (Congress), विधानसभा, गवर्नर, जज और शेरिफ — सभी का चुनाव केवल खुले मतदान (Open Vote) से ही होता था।
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(06) और केवल पेपर बैलेट का उपयोग किया जाए, साथ में स्पष्ट और कड़े Ballot Access Laws हों।
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(07) मादुरो ने, ठीक मार्क्स और लेनिन की तरह, तेल के मुनाफ़े को सीधे नागरिकों के खातों में बाँटने का विरोध किया।
तेल से होने वाला पूरा मुनाफ़ा उन सरकारी योजनाओं में लगाया गया जिन्हें वह स्वयं पसंद करता था।
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(08) भारत (भारत/भारतवर्ष) में भी मार्क्सवादी और दक्षिणपंथी (Rightist) बुद्धिजीवी, दोनों ही खनिज और तेल के मुनाफ़े को सीधे जनता में बाँटने का विरोध करते हैं।
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(09) मेरा प्रस्तावित समाधान यह है —
भारत और वेनेज़ुएला दोनों में खनिज और पेट्रोलियम मंत्रियों के लिए OPEN VOTE आधारित चुनावी Recall (रिकॉल) व्यवस्था लागू की जाए।
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(10) इससे यह सुनिश्चित होगा कि कच्चे तेल और खनिज संसाधनों से होने वाला मुनाफ़ा सीधे जनता में वितरित किया जाए।
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ताइवान क्यों तरक्की कर रहा है और भारत क्यों पीछे है?
कारण देश नहीं, नागरिक अधिकार हैं
आज जब हम ताइवान जैसे छोटे से देश को देखते हैं, तो सवाल उठता है कि ना उसके पास अधिक तेल है, ना अधिक लोहे की खान है, ना बड़ी जमीन है, ना विशाल सेना है —
फिर भी वह तकनीक, उद्योग, शिक्षा और लोकतंत्र में आगे कैसे है?
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इसका जवाब बहुत सीधा है:
क्योंकि ताइवान के नागरिकों के हाथ में असली कानूनी ताकत है। नीचे ताइवान और भारत के नागरिक अधिकारों की तुलना समझिए।

1. राइट टू रिकॉल (नेता को हटाने का अधिकार)
ताइवान में अगर कोई राष्ट्रपति, सांसद, विधायक, मेयर या जनप्रतिनिधि भ्रष्टाचार करता है, काम नहीं करता या जनता के खिलाफ जाता है, तो जनता उसके अगले चुनाव का इंतजार नहीं करती।
वह:
हस्ताक्षर इकट्ठा करती है, रिकॉल वोट कराती है
और उसी कार्यकाल में नेता को हटा देती है
इसके बाद जनता नया चुनाव कराकर नया प्रतिनिधि चुनती है।

भारत में:
5 साल तक नेता चाहे कुछ भी करे
जनता उसे हटा नहीं सकती है, जनता केवल दर्शक बनी रहती है, जहाँ जनता मालिक होती है, वहाँ नेता डरते हैं।
जहाँ जनता बेबस होती है, वहाँ नेता बेलगाम हो जाते हैं।
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2. रेफरेंडम (जनता द्वारा कानून तय करने का अधिकार)

ताइवान में:
जनता किसी कानून, नीति या सरकारी फैसले से असहमत हो
तो हस्ताक्षर जुटाकर पूरे देश में जनमत संग्रह (Referendum) करा सकती है
सरकार उस फैसले को मानने के लिए बाध्य होती है।

भारत में:
कानून जनता नहीं बनाती है, जनता से कभी नहीं पूछा जाता
संसद जो चाहे, वही कानून बनता है।
ताइवान में कानून जनता के लिए हैं,
भारत में जनता कानूनों के लिए है।
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3. जूरी सिस्टम जैसा नागरिक न्याय (Lay Judge System) ताइवान में गंभीर आपराधिक मामलों में:
केवल जज ही नहीं
बल्कि आम नागरिक भी अदालत में बैठकर फैसला करते हैं
यानी न्याय व्यवस्था सिर्फ जजों की नहीं, जनता की भागीदारी वाली है।

भारत में:
न्याय पूरी तरह जजों के हाथ में होता है, आम नागरिक की कोई भागीदारी नहीं, इसलिए न्याय आम आदमी से दूर होता चला गया है।
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4. बैलेट पेपर से चुनाव (Paper Ballot Elections)
ताइवान में:
आज भी कागज के बैलेट पेपर से मतदान होता है, वोट की गिनती सबके सामने हाथ से होती है, कोई EVM नहीं, कोई EVM मशीन आधारित रहस्य नहीं

भारत में:
EVM आधारित चुनाव, सीमित जांच, जनता के मन में लगातार अविश्वास।
जिस लोकतंत्र पर भरोसा न हो, वह लोकतंत्र कमजोर होता है।
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5. नतीजा क्या निकला?
ताइवान में:
नेता जवाबदेह हैं, सिस्टम पारदर्शी है, जनता सशक्त है
इसलिए देश आगे बढ़ रहा है।

भारत में:
नेता सुरक्षित हैं, जनता असहाय है
सिस्टम केवल प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, जज, और जिले के सरकारी अधिकारियों के पास है!!
इसलिए समस्याएं बढ़ती जा रही हैं।
गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अपराध — ये किसी देश की किस्मत नहीं होते, ये खराब कानूनों का परिणाम होते हैं।
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6. अब सवाल यह है: भारत में यह अधिकार क्यों नहीं?
क्योंकि:
जनता को कभी बताया ही नहीं गया!!
कि, कानून लागू किया जा सकता है।
कि, कानून जनता के दबाव से बनते हैं।
कि, जनआंदोलन से अधिकार छीने जाते हैं।

ताइवान ने यह अधिकार भीख में नहीं पाए, उन्होंने जन आंदोलन से हासिल किए!!
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7. भारत को भी यही रास्ता अपनाना होगा
अगर हम चाहते हैं:
नेता ईमानदार हों, सस्ता और तेज न्याय हों, पारदर्शी चुनाव हों, और सशक्त नागरिक हों।

तो हमें भी:
वोट वापसी पासबुक कानून।
रेफरेंडम कानून।
जूरी कोर्ट कानून।
बैलेट पेपर चुनाव कानून, जैसे कानूनों को लागू करवाने के लिए संगठित होना पड़ेगा।
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8. यह लड़ाई किसी पार्टी की नहीं, नागरिक अधिकारों की है
यह आंदोलन:
सरकार बदलने के लिए नहीं है, बल्कि सिस्टम बदलने के लिए है।

अगर आप भी चाहते हैं कि:
भारत में नागरिक मालिक बनें
नेता नौकर हों और कानून जनता के हाथ में हों।
तो इस विचार को आगे बढ़ाइए,

लोगों को कानूनों की जानकारी दीजिए।
और हमारे इस नागरिक अधिकार जनआंदोलन से जुड़िए।
देश बदलता है जब कानून बदलते हैं,
और कानून बदलते हैं जब नागरिक अच्छे कानूनों की मांग करते हैं।

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हमारे आंदोलन से जुड़ने के लिए संपर्क करें:
88106-40928

RRPindia.in , EvmHatao.co

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