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{{ वफ़ा का कत्ल }}
मैं अपनी प्यास के सहरा में ख़ुद ही
जलता रहा,
वो जिस के हाथ में खंजर था साथ
चलता रहा,
वो मेरे साथ भी रहा, पर कभी
मेरा न हुआ,
किसी की याद में साँचे की तरह
ढलता रहा,
अजीब ज़ब्त है उसका, अजीब
शिद्दत है,
वो बेवफ़ा था मेरे लिए, पर कहीं
वफ़ा करता रहा,
मेरी शिकस्त पे हँसने की उसे
फुर्सत न मिली,
वो रकीबों के लिए मय-कदे में
मरता रहा,
अरे ये कैसी ज़िल्लत है कि अब मैं
दाद दूँ उसकी.?
जो मेरे लहू से किसी और का
दामन भरता रहा,
वो सगे-कूचा नहीं, वो तो वफ़ा का
मुजरिम है,
जो मेरे सामने रह कर भी, गैरों पे
मरता रहा…🔥
सगे-कूचा= गली का कुत्ता,
╭─❀🥺⊰╯
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#LoVeAaShiQ_SinGh °
⎪⎨➛•ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी°☜⎬⎪
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