हया है या गुरूर, जाने क्यों हिजाब रखते हैं,
छुपाते हैं पर्दे में क्यों वो माहताब रखते हैं।
चेहरे पे नक़ाब, हाथ में किताब रखते हैं,
इस अंदाज़ से आशिकों को बेताब रखते हैं।
कितने ज़ख़्मी, कितने हलाक हुए जब आए,
यूँ चले जाते हैं वो, पर कहाँ हिसाब रखते हैं।
बेरुख़ी से तुम तो फूल कुचल कर चल दिए,
आशिक दिल का नाम यहाँ गुलाब रखते हैं।
~ निलेश