मेरे हाथ में एक कटोरा था...
चांदी का सोने का या लोहे का नहीं याद
पर था।
कुछ ख्वाब थे जिन्हें उसमें डाल रखा था मैंने।
हवा तेज होती तो वो ख्वाब उड़ने लगते,
कभी एक गया दूसरा गया , जाता रहा
मैं बस उन ख्वाबों को जाते हुए निहारती रही।
कभी झुक के उस कटोरे की तरफ नहीं देखा।
अंत में जब देखा तो वो खाली था।
कटोरा सोने का था।
पर मेरे बेशकीमती ख्वाब वो संभाल नहीं पाया❤️