Hindi Quote in Thought by ArUu

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एक अंधेरे कमरे में खड़ी थी।
बहुत अंधेरा...इतना कि
रोशनी की कोई गुंजाइश नहीं थी।
मैं थी और मेरी एक उम्मीद थी।
मैं उस उम्मीद के साथ उस अंधेरे कमरे में सांस ले पा रही थी।
कभी कभी किसी खिड़की से कोई रोशनी आती तो
मैं मजबूती से उस खिड़की को बंद कर देती।
संभवतः अब मुझे अंधेरा पसंद आने लगा था
सब कुछ ठीक था।
फिर एक दिन कुछ हुआ
बाहर शायद
तूफान था या अतिवृष्टि
मेरी उम्मीद को अपने साथ बहा ले गया।
अब मुझे वहां घुटन हो रही थी।
बहुत घुटन...
मैं खड़ी ये सोच रही थी कि इस सब का जिम्मेदार कौन था?
वो लोग जिन्होंने मुझे उस अंधेरे कमरे में धकेला
या फिर वो मैं खुद
जो सब कुछ जानते हुए खुद के साथ छल करती रही।
पर जो भी हो
सबसे ज्यादा आहत और छली तो बस
मैं ही गई थी

Hindi Thought by ArUu : 112023303
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