Hindi Quote in Poem by Vijay Erry

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Mother's Day — माँ के नाम
माँ

— १ —
जब भी थकान ने आँखें मूँद लीं,
माँ की लोरी ने नींद सजाई थी।
अँधेरे में जो दीप जलाया था,
वो माँ की ही उँगली थी, वो माँ की ही रोशनाई थी।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— २ —
आँचल में जो सुकून मिला करता था,
वो दुनिया के किसी कोने में नहीं मिलता।
झुलसती धूप में छाँव बनी रही,
माँ का प्रेम हर मौसम में खिलता।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ३ —
जब पाँव लड़खड़ाए राहों में,
माँ की दुआ ने थामा हर बार।
गिरने से पहले हाथ थे तेरे,
माँ, तू ही मेरा हर आधार।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ४ —
रोटी में तेरे हाथों की महक थी,
भोजन नहीं, वो प्रेम का भोग था।
दुनिया के हर स्वाद से ऊपर,
माँ के हाथों का अपना ही योग था।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ५ —
जब रोया मैं चुपके-चुपके रात को,
तू बिन बोले पास आ जाती थी।
आँसू पोंछने को शब्द नहीं चाहिए,
माँ की नज़र सब कुछ जान जाती थी।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ६ —
तूने कभी शिकायत न की ज़िन्दगी से,
हर तकलीफ़ को मुस्कान में ढाला।
त्याग को तूने नाम नहीं दिया,
बस चुपचाप हर पल को सँभाला।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ७ —
तेरी झुर्रियाँ मेरी कहानी हैं माँ,
हर लकीर में मेरा बचपन छुपा है।
तेरे सफ़ेद बालों में देखता हूँ,
मेरे लिए जो तूने सब कुछ चुका है।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ८ —
देव मंदिरों में ढूँढा ईश्वर को,
पर वो तो घर में ही मिलता रहा।
माँ के चरणों की धूल जो है,
हर तीर्थ से वो पावन निकला।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ९ —
दूर हूँ आज, पर दिल में है तू,
हर साँस में तेरी दुआ बसी है।
जहाँ भी जाऊँ, जो भी पाऊँ,
माँ, तेरी ममता मेरे साथ चली है।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— १० —
शब्द कम पड़ते हैं तुझे कहने को,
सागर भी कलम बने तो कम होगा।
माँ, बस इतना जान ले —
तेरे बिना यह जीवन सूना, अधूरा, धुंधला होगा।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— कवि
Vijay Sharma Erry
विजय शर्मा 'एरी'
Mother's Day — 2026 🌸

Hindi Poem by Vijay Erry : 112024542
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गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर
गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर

सुबह की पहली किरण जैसे ही खेतों पर पड़ती, पूरा गांव सुनहरी रोशनी से जगमगा उठता। पक्षियों की मधुर चहचहाहट, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और ठंडी हवा मन को एक अलग ही शांति देती थी।

शहर में रहने वाली अनन्या कई साल बाद अपने दादा-दादी के गांव आई थी। शहर की भागदौड़, ट्रैफिक और मोबाइल की दुनिया में वह खुद को थका हुआ महसूस करती थी। गांव पहुंचते ही उसने देखा—हर चेहरे पर मुस्कान थी, हर घर का दरवाज़ा खुला था और हर इंसान एक-दूसरे का हाल पूछ रहा था।

एक सुबह दादाजी उसे खेतों में ले गए। हरी-भरी फसलें हवा के साथ झूम रही थीं। किसान मेहनत कर रहे थे, लेकिन उनके चेहरों पर संतोष साफ दिखाई दे रहा था।

अनन्या ने पूछा, "दादाजी, यहां लोगों के पास शहर जैसी सुविधाएं तो नहीं हैं, फिर भी ये इतने खुश कैसे हैं?"

दादाजी मुस्कुराए और बोले, "बेटी, खुशी बड़ी-बड़ी इमारतों में नहीं, बल्कि संतोष, अपनापन और प्रकृति के साथ जीने में होती है।"

उस दिन अनन्या ने बच्चों के साथ मिट्टी में खेला, पेड़ों की छांव में बैठकर कहानियां सुनीं, तालाब किनारे सूर्यास्त देखा और रात को खुले आसमान में अनगिनत तारों को निहारा।

जब वापस शहर लौटने का समय आया, तो उसके दिल में एक नई सोच जन्म ले चुकी थी। उसने समझ लिया कि जीवन का असली सुख केवल पैसा कमाने में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए गए पलों और प्रकृति के करीब रहने में है।

उसने तय किया कि चाहे वह शहर में रहे, लेकिन गांव की सादगी, प्रेम और शांति को हमेशा अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखेगी।

सीख:
"सच्ची खुशी वहीं मिलती है, जहां मन को शांति, रिश्तों में अपनापन और प्रकृति का साथ मिलता है। गांव की सादगी ही जीवन की सबसे बड़ी दौलत है।" 🌿🌾

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