वो अल्हड़ पुरवाई जैसी
कविता
वो अल्हड़ पुरवाई जैसी है
बेरियां उसके पांव में कैसे भाऐगे
उसके फितरत कुछ ऐसी है
वह हर जंजीर तोड़कर उड़ जाएंगे
वह हवा के झोका
आसमान में ऊंची उड़ने वाला परिंदा
बस जमीन को अपनी दुनिया कैसे बनाएंगे
उड़ान बिना पंछी खुद ही मर जाएंगे
उसकी ऊर्जा ही उड़ाना है
उसका जीना ही बेहना है
फिर वह कैसे रुक जाएंगे
50 100 गज जमीन पर दो कमरे के
बंधे हुए घर में
कैसे वो रह पाएंगे
कैसे दरवाजा वह लागे ना
कैसे ठेहेर जाए
खुद को अंदर से मार के
वह अल्हड़ पुरवाई जैसे बहेने वाली
उसकी पावं बंद कमरे में
जंजीर में बंध कर कैसे रह जाएंगे