—मिट कर ही खिलना है—
पत्तों को शाखों से बिछड़ना होगा एक दिन,
राख को मिट्टी में सिमटना होगा एक दिन।
ये धुआं जो बादलों में मिल जाएगा,
फिर बरस कर सूखी जमीं को जगाएगा।
मिट कर ही तो नया रूप खिलता है यहाँ,
कुदरत के इस नियम से गुजरना होगा एक दिन।....
-MASHAALLHA