“जलता दीप “
क्या जलता दीप
घोर अँधेरा मिटा सकता है क्या…?
क्या बढ़ते कदम
किसी ग़लत राह से मुड़कर
किसी जाने-पहचाने पथ पर
चल सकते हैं क्या…?
क्या जलता दीप
घोर अँधेरा मिटा सकता है क्या…?
जो रोशनी की किरणें
चमकने से पहले ही
अँधेरे की पीड़ा में दब गई हों,
क्या उन्हें फिर से
सूरज से मिलाया जा सकता है क्या…?
क्या जलता दीप
घोर अँधेरा मिटा सकता है क्या…?
जो हाथ थक गए हों
जीवन का बोझ उठाते-उठाते,
क्या उन हाथों को
कभी सुकून का स्पर्श
मिल सकता है क्या…?
या फिर कुछ अँधेरे
बस साथ चलने के लिए होते हैं…
और दी
सिर्फ़ इतना करता है,
कि हम गिरें नहीं।
प्राची तंवर ……