उम्मीदें…..
मेरी कई उम्मीदें थीं
दोस्तों से, अपनों से, खुद के सपनों से...
कभी बेफिक्र होकर, बिना सोच-विचार,
मैं उन उम्मीदों के पीछे भागा करती थी।
न परवाह थी लोगों की, न समाज की, न किसी तंज की...
बस इतना मालूम था कि "जो होगा, देखा जाएगा"।
फिर वक़्त ने आँखें खोलीं।
कुछ सपने गिरे, कुछ अपने बिखरे,
कुछ दोस्तों ने रास्ते बदले, कुछ मैंने।
जिन बातों पर हँसा करती थी, उन्हीं बातों ने रुलाया।
जिस "देखा जाएगा" पर ऐतबार था,
उसने ही आईना दिखाया।
और अब जब देखने की बारी आई,
जो हुआ उससे... अब मैं बहुत फ़िक्र करती हूँ।
न जाने, न चाहते हुए भी,
मुझे परवाह रहती है लोगों की, समाज की, और हर एक तंज की।
मुझे अब मालूम है बेपरवाह होने की कीमत
वो हँसी से नहीं, नींदों से चुकाई जाती है।
अब हर कदम से पहले, करती हूँ मैं बहुत सोच-विचार।
न जाने अब उम्मीदें चल पड़ी हैं किसी अलग दिशा में
जो मेरी नज़रों से ओझल है,
और अब मैं उनके पीछे भाग रही हूँ,
थके हुए पैरों से, पर ज़िद्दी हौसलों के साथ।
मैं अब भी भागती हूँ,
बस अब गिरने से डरती हूँ।
पहले उड़ती थी, अब संभल-संभल कर चलती हूँ।
शायद बड़े होना यही है
कि सपने वही रहते हैं,
बस उन तक पहुँचने के रास्ते बदल जाते हैं।
और हम, उन रास्तों पर चलते-चलते,
खुद को थोड़ा-थोड़ा खो कर,
फिर से पा लेते हैं।
और शायद उम्मीदें भागती नहीं,
हमारे साथ बड़ी हो जाती हैं।
बचपन में दौड़ती थीं, अब साथ चलती हैं,
हाथ थामे, धीरे-धीरे... पर रुकती नहीं।
प्राची गुर्जर…..