“वो जो आया ही नहीं…..”
इंतज़ार करते-करते अब आदत हो गई है,
दर्द भी अब इबादत हो गई है।
सुबह उठते ही दरवाज़ा देख लेते हैं,
शाम ढले फिर खिड़की ताक लेते हैं।
कोई पूछे किसका इंतज़ार है,
हम हँस के बात टाल देते हैं।
चिट्ठियाँ अब भी आती हैं,
पर नाम उसका नहीं होता।
कदमों की आहट सुनाई देती है,
पर चेहरा वो ही नहीं होता।
लोग कहते हैं भूल जा,
हम कहते हैं क्या भूलें?
जो आया ही नहीं कभी,
उसको कैसे दिल से निकालें?
अब तो हाल ये है अपना,
इंतज़ार से ही इश्क़ हो गया।
जिसके आने की थी उम्मीद,
ना आने से ही सब्र हो गया।
प्राची गुर्जर……