हाय मोटापा
व्यंग्य कविता
कैसे कहूँ, ये दर्द ना जाने कोई
बिना कुछ खाए ही मोटापा बढ़ता जाए
बिन बुलाया मेहमान ये, बड़ा ढीठ है
द्वार से ना जाए,
हाय घर से ना जाए
टिक्की, गोलगप्पे को जी भले ललचाए
लगे खाने से इतना डर
गले से ना निगला जाए
जबसे थायराइड ने घेरा है
बढ़ता कमर का घेरा है
पतली-पतली मॉडल देख
हाय शर्म बड़ी आए
अरे किसी की नजर ही लग जाए
बैरी मोटापा कैसे जाए
कर लिए सारे जतन
कड़वे काढ़े पीकर देख लिया
योग करके भी देख लिया
खडूस मोटापा फिर भी ना जाए
आज सब परेशान हैं
इस बैरी मोटापे से
बच्चा, लड़का, बूढ़ा या हो कोई भी
एक ही दर्द सबका आज
हाय मोटापा कैसे जाए
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली