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AbhiNisha

AbhiNisha

@abhinisha
(10k)

कविता पार्ट 1
औरत के लिए


शायरी किताबों पर ही अच्छी लगती है
औरत के लिए
मर्द यह करते हैं मर्द वह करते हैं औरत के लिए
फिर औरत क्यों रोती है

रियल लाइफ में देखो
हर कविता बेकार लगती है
औरत के लिए

कोई चांद नहीं कोई शान नहीं
ना सुनहरा जहां
ना कोई सितारा ना खुद का कोई सूरज
बस खाली आसमान


लोग कहते हैं बंजर है
धरती यहां की
जहां औरत रहती है
बस खुद की



तुमने कहा
औरत के लिए मर्द क्या-क्या नहीं करते
पर हर औरत इतनी खुश नसीब नही होती
की कविता से बाहर
उस औरत की जिंदगी कोई मर्द आ कर
उसकी जिंदगी सवार दे


सच यह है कि औरत को मर्द नहीं चाहिए
बस चाहिए एक साथी जो उसके साथ चलते रहे
सच यह है कि
औरत को मर्दों से कुछ नहीं चाहिए
ना धन दौलत ना ना चांद सितारे
ना हीरा मोती
बस औरत को चाहिए उसे समझने वाला एक इंसान

उसे एक ऐसा इंसान चाहिए
जो औरत को कहे
तु औरत नहीं एक इंसान है
और आजादी पर जितना मेरा हक है
उतना ही तुम्हारा भी



औरत इसलिए नहीं खुश होती की
दुनिया की हर कविता
उसे पर लिखी जा रही है


औरत इसलिए रोती है
क्योंकि उस कविता में
औरत पूरी तरह से खुद की नहीं है
कभी कोई कविता औरत को पूरी तरह से शामिल किया ही नहीं है


औरत को कविता से बाहर वह मर्द चाहिए
जो औरत को उसे अपना कर दे
और कहे जी ले
अपनी जिंदगी मैं हूं ना
तेरे साथ

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मैं भी बच्चा बन जाना चाहती हूं
कविता



थक गई हूं बचपन से ही बड़ी होते होते
मैं भी बच्चा बनना चाहती हूं
किसी की बाहों में आकर जी भर रोना चाहती हूं


बचपन से ही समझदार होते होते खो दी है
मैंने अपनी बचपन को
अब उस बचपन को मैं मिस कर रही हूं
कोई आए और लौटा दे मेरे बचपन को


मैं फिर से बच्ची बन जाना चाहती हूं
बिना सोचे बिना परवाह जीना चाहती हूं

मैं बच्चों की तरह बिना सोचे कुछ भी करना चाहती हूं
क्यूरोसिटी में बचपन की हर चीज को छुना चाहती हुं
मैं फिर से बच्ची बन जाना चाहती हूं


थक गई हूं बड़ी बहन होते-होते
थक गई हूं सब कुछ संभालते संभालते
अब छोटी बहन बन जाना चाहती हूं
मैं प्यारी सी बच्ची बन जाना चाहती हूं


जिसके पिता उसे प्यार करें
जिसको मां उसे दुलार करें
मैं वही बच्ची बन जाना चाहती हूं
मुझे गले लगा लो कोई
मैं किसी के बाहों में सो जाना चाहते हैं





हमेशा यह कहकर मुझको ना रुको कि
मैं बड़ी हूं
और मुझे समझदार होना चाहिए
अपनी छोटे भाई बहन के ख्याल रखना चाहिए
और साथ में घर को भी संभालना चाहिए
छोटो की प्रेरणा और बड़ों के सामने आदर्शवादी

मत डालो मुझ पर बहुत सारे बोझ जवाने भर के
मेरे कंधे कमजोर है
इतने सारे भार उठा ना पाएंगे



कभी यह भी कह दो छोड़ दो प्रवाह
छोड़ दो किसी दिन तुम्हारे वजह से बिगड़े हुए कामों को
और बस तुम छोटी सी बच्ची बन जाओ
और वही करो जो एक छोटे बच्चे करती है


मैं सचमुच में थक गई हूं
सबको संभालते हुए
बड़ी और समझदार होने की पहचान लिए
मुझे गले लगाओ मैं सोना चाहती
जी भर के अब रोना चाहती हुं

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अब कोई फर्क नहीं पड़ता
कविता




अब अमीर बनने की ख्वाहिश नहीं
अब मुझे कुछ चाहिए ही नहीं
चाहे कोई कुछ भी कहे
मैं खुद से नहीं कहती
बहुत ज्यादा मेहनत करेंगे
और
बहुत सारे पैसा कमाएंगे
और उन्हें दिखा दूंगी कि मैं क्या हूं


अब कोई फर्क नहीं पड़ता
किसी की बातों से भी
मैं क्या हूं नहीं हूं
बस खुद में खत्म हो गई


समझने वाले कहते हैं
जिंदगी बहुत ही प्यारी है
मत मरने की चाह रखो
ऐसा तो होता ही रहता है
तुम्हें जीना चाहिए


और खुद को बेहतर बनाना चाहिए
इस बात से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता


लिखना गीते गाना अल्फाज कहानी कल्पना मेरी मेरी सांस है
और मुझे अब मेरे सांसों पर भी काम करने का मन नहीं करता



बस लगता है सारी ज़रूरतें खत्म हो चुकी है
अंदर के खालीपन के साथ मैं
अब सारी उम्मीद छोड़ चुकी हूं



अब जिंदगी बोझ लगती है
और हर दिन सांस लेना एक सजा

अब दुनिया देखने की ख्वाहिश नहीं है
अब दिल लगाने से चाहत नहीं है
अब कुछ भी नहीं है
ऐसा जिसे जरूरी समझ कर मैं जीते रहछ
और जिंदगी की बोझ ढोते रहु


I like you life
पर
I don't love you

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और कभी ना लोटु
कविता



रोते हुए को
रोने के लिए अपना कंधा दिया नहीं
और मरने के बाद बात पर
मेरे अपने कहते हैं
तुम्हारा कौन है
हमारे अलावा
हम ही हैं जो तुम्हें तुम्हारे मरने के बाद कंधा देंगे

कभी-कभी हंसी आती है
मुझे इसबात पर

क्या सीरियसली
जब मैं साथ चाहती हूं
अपनों की तो वह मेरे साथ नहीं होतें
जब मैं चाहती हूं कि मैं रो रही हूं
और मुझे कंधा मिले अपनों की तो
वो अहंकार और नफरत में
अपने सर ऊंचा रखता है



जब मैं चाहती हूं मुझे प्यार मिले अपनों की तो
वो ऐ कहे कर दुतकार देता है
कि मैं इस लायकनहीं हूं



मरने के बाद मैं उसके आंसू को क्या करूं
मरने के बाद मैं उसके पछतावे की क्या करूं
मरने के बाद मैं उसे कंधे का क्या करूं
जो मुझे दिया जाएगा
मरने के बाद मेरे लिए रखी गई 13वीं का क्या करूं



मैं चाहूंगी जब मैं यहां मारूं तो
मेरे लिए कोई रोए ना
मुझे कोई कंधा नहीं दे
बस ले जाकर ऐसे ही दफना दे
कोई अंतिम संस्कार की विधि ना हो
कोई अंतिम विदाई नहीं
मेरे लिए कोई तेरहवीं भोज ना करें



जीते जी मैं उनके लिए कोई मान्य नहीं राखी
तो
मरने के बाद कोई दिखावा न करें



और सच तो यह है
मैं चाहूंगी मेरी आखिरी सांस में मैं यहां बिल्कुल ना रहु

एक ऐसे शांत जगह चली जाओ
जहां से मेरे शव तो क्या
चिखे भी वापस न लौटे

मैं चाहूंगी मैं आनंद सागर में समा जाऊं
और कभी ना लौटु
मरने के बाद
मेरे जिस्म की एक टुकड़ा भी नहीं
किसी को कभी मिले


और मैं नहीं चाहूंगी मेरे लिए कोई पूजा पाठ कर
मेरी आत्मा की शांति के लिए
कोई तेरीहवीं रखी जाए


अगर अंतिम संस्कार की पूजा रखना जरूरी है
आत्मा की शांति के लिए
तो
मैं चाहूंगी मैं उसे हाल में रहूं
की जीते जी मैं
अपनी अंतिम संस्कार की विधि खुद कर लु




किसी और पर अपनी मौत की अपनी शव की
भाड़ डालने से अच्छा है
मैं खुद की पिंडदान खुद कर लूं



मैं नहीं चाहती कि ऐसे लोग मेरे शव को भी छुए
जिसके पास रहकर
मुझे जीते जी प्यार और अपनापन महसूस ना है


सच यह है
मैं आंखों में सितारा भर के मरना चाहती हूं
बिना पछतावे की
गमों को गले लगा कर मारना चाहती हूं
मैं नहीं चाहती कि मरने के वक्त मुझे कोई दुख हो



इसलिए मैं चाहती हूं
ऐसे लोगों से जिससे मेरी कोई परवाह ही नहीं
मैं मौत के वक्त दूर ही रहना

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कविता
तुम मिलो मुझसे



दिल के दर्द संभाल नहीं पा रही हूं
मिलो तुम आकर मुझसे
अभी की अभी

मैं जिंदगी से दूर मौत की बहुत ही करीब हूं
अगर तुम मुझे अभी मिलते हो तो
शायद मैं सोचूं फिर से जी उठने की




जिंदगी से कोई उम्मीद नहीं
मैं रुकी हुई घड़ी की सुई की तरह
कब तलक रुकूंगी पता नहीं
मिलो तुम मुझसे अभी की अभी


शायद तुम्हारे साथ चल परू टूट कर वही विखरने की जगह





यह दुनिया दुनिया मेरे किसी काम की नहीं
मेरा यहां कोई भी अपना नहीं है

बस उम्मीद है मोत मिले
और उम्मीद है मौत से पहले तुम मिलो मुझसे



कहानी हमारी कभी शुरू हुई ही नहीं
पर मैं चाहती हूं
तुम मिलो मुझसे
और इस कहानी को अंत दो


यह अजीब बात है
जो कहानी कभी शुरू हुई ही नहीं
उस कहानी को अंत देना




पर मेरी कल्पनाओं की दुनिया एक कहानी है
जिसमें तुम हो हकीकत की तरह
और मैं चाहती हूं
हकीकत बन तुम कर लौट
आओ तुम मेरे पास मेरे अंतिम समय में ही


मुझे डर नहीं कि मेरे साथ क्या होगा
पर अफसोस है कि कहीं मैं सारी कहानियां
अधूरा छोड़कर ना मर जाऊं




कौन कैसा है
किस लिए हर दिन मैं मर से जाती हूं
जीते जी शायद इस बात का पछतावा
मुझे अंतिम दिन ना हो
पर इस बात का पछतावा होगा
तुम और मेरी कहानी दोनों अधूरी रह गई

इस पल में
मैं सचमुच में मर जाना चाहती हूं
बिना कोई अफसोस के खुद की जान लेना चाहती हूं
पर उससे पहले मैं चाहती हूं
तुम आकर मिलो मुझसे

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कविता
बस देख रही हूं



मुझे किसी से शिकायत नहीं
बस मुझे रोना आ रहा है
मैं जानती हूं कि मेरी जुबान कर्वी है


मैं किसी की कोई काम की नहीं
मैं डायरेक्ट सुनती नहीं
मैं सुनने के साथ सवाल भी करती हूं

यही बात किसी को पसंद नहीं

लोगों को और पेरेंट्स को
वह लोग वह बच्चे पसंद आते हैं
जो बिना सवाल कि उनकी बातें बस सुनता रहें
जो वो कहे वही करता रहे


पर मैं वह नहीं हूं
इसलिए अनदेखा की जा रही हूं
इसीलिए प्यार से दूर हूं


यहां हर चीज में सौदावाजी है
आप अगर उनकी सुनते हैं
तभी आप प्यार की हकदार हैं
तभी आप स्नेह और देखभाल की हकदार हैं



मैं लोगों के लिए किसी काम की नहीं रही
इसीलिए मैं लोगों के दिलों में अपनेपन की हकदार नहीं रखती



क्योंकि मैं एक गुड़िया बिल्कुल नहीं


बड़ी दिलचस्प बात है
खुद को इंसान कहना ही भूल गई
लोगों की बदलती हुई व्यवहार को देखकर




मुझे शिकायत नहीं है
ना ही अफसोस है
लोगों के बदलने पर
या खुद को बचाने की कोशिश करने पर


बस तकलीफ हो रही है
सब कुछ जानकार भी
लगता है काश अनजान राहते


मैं औरों की तरह ही
एक कठपुतली बनी रहती

जो चाहे जैसे ना चाहता
थोड़ा स्नेह तो दिखता





बस मैं देख पा रही हूं
अपनों के बीच में बेगैरत खुद को
कुछ नहीं कहे रही
नहीं सवाल कर रही हूं
नहीं जवाब मांग रही हूं

मैं जानती हूं कोई फायदा नहीं
मेरे चिकने और चिल्लाने से

सब अपने कानों में रूई लगा ली है
मेरी आवाज सुनने से डरे हुए हैं


सब अपने-अपने काम में लगा हुआ है
उनके लिए उनके काम के लोग हैं
उनके अपने हैं
मैं भला बेगैरत मेरी बात कौन सुनता है
अच्छा है की इग्नोर करता फिरें
मेरे दर्द कौन समझता है


सच्चाई मेरी जुबान से भी ज्यादा कर्वी है
और इस सच्चाई को स्वीकार करना दर्दनाक है

और सच्चाई के साथ जीना
घायल दिल पर पत्थर रख देना जैसा है

और अंजान बनने की कोशिश करना
इस पत्थर नुमाऐ भार को और भी बढ़ा देना है






सच्चाई सचमुच में बहुत ही कड़वी होती है
जिसे हम कभी-कभी स्वीकार तो कर लेते हैं
पर
उसके साथ जीना बहुत ही भारी है

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वे गमों के दोनों
कविता गीत


हु। ,

खोई नहीं मैं इस रंग रलियों में
फसा नहीं मैं इश्क की तंग गलियों में

हवा जैसी बेहती ईत्र जैसे महकी
गुलाब जैसे मशहूर थी


फिर भी उम्र कटी तनहा है मैंने
अकेलेपन में खोया रहा
अपनी ही दर्द में सोया रहा

वक्ति ही नहीं निकाल पाया हमने चाहत की



खुद की गमों में मशगुल थी इस तरह की
थी किसकी नजर पाखी
देखा ही नहीं कभी



सोई नहीं मैं महबूब के पल्को तले
जागी भी नहीं मैं किसी के इन आंखों में ख्वाबों को लेकर


धड़कता दिल खुद थम सा गया
मेरे इन आंखों में मेरे लिए ही है दया


खोई नहीं मैं इस रंग रलियों मे
फसा नहीं मैं इश्क की तंग गलियों मे



मेरे इन आंखों में मेरी यादें हैं
चंचल मन खुद को खुद में संभाले
खुशियां आधे हैं


वे गमों के दिनों
वे रास्ते बिन आसरे की
यादें मेरी थके ख्वाबों की



बस सोच है बिना लालसे की
घड़ीया बिती उम्र बिता इश्क के दिनों की
बस रह गई मैं मेरे दर्द के साथ
बिते यादों के लिए
बिना आसरे की खुद को संभालते हुए

मैं यहां मेरे गम मेरे दर्द के साथ
मेरे बेचैन धड़कन अब है शांत





गजल

धड़कन अब भी है सीने में
और वह धड़कता भी है
पहले की तरह वह अब भी अपने ही दर्दों की सोर से भरा हुआ है

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मैं हुं यहां
कविता


मैं हूं यहां
अगर रोना चाहते हो तो मेरे पास आओ
बैठो रोओ
आओ मेरे साथ रोओ


रोना कमजोरी की निशानी नहीं
रोना भावनाओं को बयां करना है

तुम्हें मैं गले से लगा कर रखना चाहती हूं


तेरे साथ रोना चाहती हूं
तेरे साथ ही हंसना चाहती हूं
तेरे साथ जीना चाहती हूं
तेरे ही साथ मरना चाहती हूं
एक तुम ही हो
जिसे मैं अपना कहना चाहती हूं
जिंदगी की पूरे सफर में तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं

जिंदगी की कोई घड़ी ऐसी नहीं है जो
मैं तेरे साथ नहीं चाहती

फिर आंसू आंखों में रोकें क्यों रखा है तूने
आओ मेरे साथ रोले


खुद को बयां कर
और आओ खुद से मैं तुम हम हो ले

खुशी हो या गम
मेरे साथ बैठो मैं हूं ना
तेरे साथ जिंदगी भर के लिए
तुम्हारे गम सुनाने के लिए
तुम्हारे दर्द जाने के लिए

तुम्हारी खुशी को महसूस करने के लिए
मैं हूं ना
तुम्हारे साथ जिंदगी भर के लिए



आओ मेरी बाहों में सो लो
मैं नहीं कहती की दर्द हो रहा है तकलीफ हो रहा है
उसे भूल जाओ

मैं बस ऐ कहती हूं
तुम्हारी दर्द तुम्हारी तकलीफ में
तुम्हारी तन्हाई में
तुम मुझे भी शामिल करो


हमेशा हरदम सांसों की तरह
अपने दर्द को मुझसे साझा करो


मैं उम्मीद की कोई किनारा नहीं हुं
जो कहूं
तुम्हारी जिंदगी में
तुम्हें खुशी दूंगी
तुम्हारी टूटी हुई सांस हूं


मैं बस हूं तुम्हारी साथी
तुम्हारे हर दर्द गमों में तुम्हारे साथ
तुम्हारी खुशी तुम्हारी टूटी हुई सांसों में
जीने की नई उम्मीद लेते हुए


तुमसे बस मैं यह कहूंगी
मुझे तुमसे हिम्मत मिलती है

और मैं चाहती हूं
तुम मिलो मुझसे हर उस वक्त में
जब तुम्हें तकलीफ हो
तुम मिलो मुझसे हर उस वक्त में
जब तुम्हें लगे की दर्द ज्यादा है
पर उसे बयां नहीं कर सकते


क्यों कि उससे भी ज्यादा मर्द होना है
तो मिलो मुझसे
और छोड़ दो मर्दानगी
जो यह कहते हैं की
मर्द रोते नहीं
बस मेरे सामने तुम रो लो
तुम्हारे साथ तुम्हारे गमों में मैं भी रो लूंगी





मैं आपकी प्रिय लेखक अभीनिशा ❤️🦋💯

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कविता
सांसे चल रही है थम थम कर



सांस थम रही है जिंदगी कट रही है
मंजिल अभी बहुत दूर है

कभी-कभी लगता है सांस रोक लु
और आखिरी वक्त को महसूस करु
और उस वक्त मैं सोचूं कि मैं कहां हूं

ऐसा लगता है कि
मैं इस वक्त में भी यही हूं
कहीं-कभी पहुंचा ही नहीं
अभी तन्हा अकेला टूटी हुई
अपनी कमजोरी पैरों पर रोती हुई




तो
कभी-कभी लगता है
मैं आंखें बंद कर लूं
और सो जाओ
और किसी सुनहरी सपनों में खो जाऊं
यही मेरी मंजिल होगी

जिस चीज की मुझे शौक है
वह कहानी है
मेरे सपने भी तो हर एक नियंत्र दिन
एक नई कहानी मेरे सामने लाता है
तो क्यों ना मैं उसे ही देखती रहुं
उसकी ही किरदार बनाकर जीते हुए जिंदगी बिता दु

बिना कोई जोखीम लिए
बस उम्र ही तो बितानी है
बिना कोई खुद की जिम्मेदारी उठाएं
वहां जीते रहो जहां मैं खुश रह सकूं


तो
कभी-कभी लगता है
हां मुझे कहानियों का शौक है
बस देखने की नहीं लिखने की भी

हां मैं जानती हूं कि
मैं अपने सपनों में रचयिता नायक दर्शन दर्शक सब हुं


पर यह क्या काफी है
इस बेकार जिंदगी को बिता देने के लिए
बस सपने हैं
जहां मैं अपने सब कुछ हूं


बहुत सारे सवाल है
खुद को बेकार समझते हुए


कभी-कभी लगता है कि
मैं आलसी हूं
मैं करना ही नहीं चाहती कुछ भी


तो कभी-कभी लगता है
कि मुझसे होता ही नहीं
मैं आलसी नहीं हूं बस थक गई हूं

इस जिंदगी से
हर दिन एक जैसे दिन गुजर से
मैं थक गई हूं

खुद ही से



तो कभी-कभी सोचता हूं कि
मैं कब तक थकी ही रहूंगी
यह थकावट कभी खत्म होगी भी या नहीं
सालों बीत गए हैं इसी हाल में
और एक ही सवाल में



मैं क्या कर रही हूं
क्यों कर रही हूं
मुझे सोते रहना क्यों है

मैं खुद को इस थकावट से
आजाद क्यों नहीं कर पा रही

हालांकि मुझे बहुत सारे सवालों की जवाब भी पता है
फिर भी दर्द हो रहा है
मैं निकल नहीं पा रही दर्दनाक जंजीर से


मुझे बोरिया फिल हो रही है
मुझ में धैर्य नहीं है
फिर भी रोज-रोज एक ही काम कर रही हूं
सो कर उठना
और फिर छोटे-मोटे काम करना
और फिर बेकार जिंदगी गुजारने के बाद
फिर से सो जाना


यह वक्त की बर्बादी और खुद की भी है
मैं दोनों बर्बाद कर रही


कभी-कभी खुद पे गुस्सा आता है
कभी-कभी दया



मैं क्या करूं
मैं चाह कर भी खुद को मेंटेन नहीं कर पा रही
मैं खुद को और अपनी जिंदगी को बेकार जाने से नहीं रोक पा रही



सांसे चल रही है थम थम कर
जी भी रही हूं घुट घुट का
अभी यह आलम है कि
जिंदा होकर भी लाश की तरह महसूस हो रही है

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कविता
काश उन लोगों में मेरे अपने ना होती



मैं लोगों को जानती हूं
इसलिए सवाल नहीं करती कि लोग इतने बुरे क्यों होते हैं
पर कभी-कभी सोचती हूं
काश उन लोगों में मेरे अपने ना होती


पर अफसोस यह सच है
हद से ज्यादा दुख दर्द अपने ही देते हैं



जिसे हम अपना कहते हैं
कभी-कभी वही सबसे ज्यादा कुड़ और निर्णय होते हैं
इतना की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता



चोट लगने के बाद थकने के बाद
हम हमेशा अपनों के छाया ढूंढते रहते हैं
उम्मीद करते रहते हैं
अपनों के सहारे की

पर कभी-कभी वह छाया देने वाले जगह ही
किल और नोकीलि पत्थर से बनी होती है


वह उम्मीद सहारे की मेहेश हमारे मन की कल्पना होते हैं सच्चाई बिल्कुल नहीं

सहारा तो मिलता है
पर उन में
इतनी नफरत इतनी ईर्शा होती है
की
कोई कभी सोच भी नहीं सकता
कि
सचमुच में वह अपने हैं


जिसके पास हम
हमेशा दिल टूटने के बाद दर्द होने के बाद लौटाना चाहते हैं
जैसे हम अपने कहते रहते हैं
क्या वह अपने हैं
जो इतना बुरा भी हो सकता है
और इतनी मतलबी भी


हंसते हुए चेहरे मीठी बातें
चेहरे देखकर बातें सुनकर
लगता नहीं की वह हमारे अपने हैं जिसके अंदर
हमारे लिए इतनी नफरत भरी हुई है



मैं आपकी प्रिय लेखक अभिनिशा❤️🦋💯

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