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AbhiNisha

AbhiNisha

@abhinisha
(14)

कविता रोने की आजादी है

जब रोने का जी करें
तो रो लो
ठहरे हुए आंसू आंखों में रहकर
जहर बन जाएंगे
इससे पहले रो लो
जी भर रो लो


इससे पहले की तुम्हारा जी किसी को मारने के करें
रो लो
जब रोने का जी करे तो रो लो


इससे पहले की तुम्हें
जग के साथ-साथ खुद से नफरत हो जाए
रो लो


तुम्हारा दर्द तुम्हें खो दे
इससे पहले तुम रो लो
जी भर रो लो



दुनिया भर के गम लेकर
तुम लाचार हो यह भरम लेकर
तुम खुद के नशे काटो
इससे पहले रो लो


रोने से शायद तुम हल्का महसूस करोगी
इसलिए रो लो
जी भर रो लो
चिक चिक कर रो लो



हां तुम रो लो



सायद रोने से मन में बिछे नफरत काम हो जाए
इसलिए रो लो


शायद रोने के बाद जीने का इच्छा करें
इसलिए रो लो



शायद रोने के बाद जीने की कोई उम्मीद मिल जाए
इसलिए रो लो
जी भर तुम रो लो



सारे थकान खत्म हो जाएंगे
इसलिए रो लो
तुम रो लो जी भर रो लो

जिंदा रहने के लिए
घुट घुट कर कब तलक जिओगे
जो जहर है दिल के अंदर वह बाहर निकालो
खुद से ही बोलो


अगर कोई नहीं है सुनने वाला
खुद के जख्मी दिल को डटोलो
और जी में जो आए बोलो
तुम रो लो


खुद को तुम प्यार से सहलाओ
खुद को तुम खुद ही गले लगाओ
और खुद को और रोने दो
दर्द थोड़ी कम होंगे


और तुम फिर से मुस्कुराने के लिए नज़रें उठा होगी
शायद और ज्यादा मुस्कुराओगी



हां तुम रो लो
जब तक जी चाहे रो लो
किसी चीज की आजादी हो या ना हो
तुम्हें रोने की आजादी है
तुम रो लो
जी भर रो लो



और फिर आओ उठो
और खुद को संभालो
रहा लंबी है दर्द गेहरा है
फिर भी चलना है
डगमगाते कदम लेकर
कापते बदन लेकर

रोते हुए तुम्हें खुद को संभालना है
हां तुम रो लो
पर खुद को संभालो
रोने की आजादी है
तुम रो लो
जी भर रो लो




आगर ऐ कविता अच्छी लगे तो आगे पढ़ते रहिए
मैं आपके प्रिय लेखक अभिनिशा❤️🦋💯

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सोचा मैं तितली हूं


थकावट के बाद भी मैं ने थोड़ा काम किया
और फिर दोस्तों के साथ गई और सांस लिया
और फिर आई थोड़ा काम किया


जीने का जी नहीं था फिर भी जीने की सूची


नल से निकलते ठंडा पानी सर पर डाला और गहरी सांस लिया
और फिर शगुन से बाल धोया
और नहाया


और फिर अपनी पसंदीदा कपड़े पहने
जो कंफर्टेबल था


और फिर आईने के सामने खड़ी रहकर खुद को दिखा और
वो चेहरा जो मैंने देखा
वह मेरी ही था


ना वह खूबसूरत था
ना सुखा
बस था शिकायतों से भरा


कुछ देर उस चेहरे को निहारता हुआ सोचा
इसमें नूर नहीं है
तो मुस्कुराई


शिकायत की हजारों लव्ज थे
चेहरे के साथ होठों पर भी
फिर भी मुस्कुराई




और फिर उल्टे कदम लौट कर
घर की छोटी सी अलमारी के पास आए
अलमारी खोली


और हाथ डालकर डोटोलते हुए
उस से बालों की पिन निकाला
और छोटी सी झुमका भी
और पिन बालों में डाला


और झुमका कानों में डालते हुए
फिर मैं आईने के पास आई
और झुमका कानों डालते हुए
मैं आईने में खुद को दिखा
और मैं फिर से मुस्कुराए



और फिर से बालों के पिन
बालों से निकलते हुए होटो के बीच में दवाई
और फिर बालों को अपने हाथों से सावरा
और फिर उन में पिन लगाया


और फिर अपनी बेबी हेयर को अपने हाथों से
आगे करते हुए मुस्कुराई

और सोचा मैं तितली हूं
कितने दिनों के बाद खुद को आईना में देखा
और सबरी हूं

हां मैं तितली हूं
इतराने के लिए ही बनी हूं


और यह बगिया मेरी है
और सोचा ही नहीं कि इस बगिया में माली भी है
और सोचा ही नहीं की माली मेरा दुश्मन भी हो सकता है



हां मैंने सोचा मैं तितली हूं
इतराने के लिए ही बनी हूं
पर सोचा ही नहीं की
तितली किसी मनचले के हाथों के बीच आकर मिसला जाऐगे


हां मैंने सोचा ही नहीं की
आसमान की तरफ देखना मेरी नसीब है
ऊरना नहीं





अगर कविता अच्छी लगे तो
आगे पढ़ते रहिए
मैं आपके प्रिय लेखक अभिनिशा ❤️🦋💯

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जिंदगी क्यों दूसरा किनारा


एक सपना

जिंदगी के पार जिंदगी
कहते हैं जिंदगी एक रहस्य से भरा हुआ है
एक पजल की तरह
जिंदगी की हर मोड़ हर रास्ता है
जिसे सुलझाना आसान नहीं
और जिंदगी की कहानी एक पजल है


हमें नहीं पता कि किन्हे जिंदगी सौगात में क्या देता है

पर जिंदगी सौगात मै एक चीज देती है
जो शगुन से भरी होती है
एक लंबी नींद एक लंबा सपना


पर सपना क्या है
और उसके रहस्य क्या है ज
दुनिया में आप तरह तरह की सवाल है
कहते हैं सपना अपने दिमाग की उलझन से पैदा होते हैं
और दिमाग तो उलझने के लिए ही होते हैं ना

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