“समुंदर ….”
समुंदर की गहराई सबने देखी,
किसी ने नहीं देखा समुंदर को।
समुंदर का खुद को छुपाना,
दुनिया से अपना सच छुपाना।
सबने देखा लहराता पानी,
किसी ने नहीं सुनी उसकी अनकही कहानी।
सबने गिनी उसकी लहरें,
किसी ने नहीं गिने उसके ज़ख्म।
कभी सोचा है,
समुंदर ने खुद को खाली क्यों नहीं रखा?
हमेशा क्यों ओढ़े रखा पानी की चादर को ?
क्योंकि समुंदर नहीं चाहता था
सरल भाव से दिखना सबको।
वो चाहता था कुछ सिखाना।
कि वो अकेला नहीं है,
उससे कई नदियाँ जुड़ी हैं।
वो सबको अपने में समा लेता है,
पर खुद कहीं नहीं समाता।
अगर नदी उसकी गहराई देख ले,
तो सहम जाएगी मासूम बच्चे सी।
फिर कभी नहीं मुड़ेगी समुंदर की तरफ।
बेशक समुंदर अपने भीतर
कई तूफान लिए फिरता है।
शोर बाहर करता है,
ताकि अंदर का सन्नाटा कोई न सुन ले।
अगर नन्हे बादलों ने तूफान देख लिए होते,
तो कभी न आते वो समुंदर से उसके आँसू लेने।
न गिरती फिर कोई बूंद जमीन पर,
न खिलता फिर कोई पौधा कहीं पर।
न बहती कोई नदी,
न जीता कोई इंसान।
इसीलिए समुंदर चुप है,
इसीलिए दुनिया ज़िंदा है।
क्योंकि कुछ गहराइयाँ दिखाई नहीं जातीं,
जि जाती हैं।
प्राची गुर्जर …..