Hindi Quote in Poem by A Singh

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​रात की ख़ामोशी में,
छत पर बैठकर पूछती हूँ तारों से,
क्या अपनों के बीच रहकर भी,
कोई इस कदर अकेला होता है?
​दिन भर सबके चेहरे पर,
खुशियाँ बाँटती फिरती हूँ मैं,
पर ढलती शाम को जब आईना देखता है,
तो तड़पकर पूछ बैठता है—
​"सबकी परवाह करने वाली,
बता तेरे लिए यहाँ कौन रोता है?"
​जवाब में बस,
एक चीखता हुआ सन्नाटा उभरता है,
और उस बेबस ख़ामोशी में,
मेरा गला रुँध जाता है।
​एक ही छत के नीचे रहते हैं सब,
मगर दूरियाँ इतनी हैं,
कि पास होकर भी,
पास होने का कोई एहसास नहीं होता।
​शायद मैं ही बहुत बेगानी हो गई हूँ,
अपनों के मेले में,
जो भरी दुनिया में भी,
बस तड़पती हूँ अकेले में...

​~ A. Singh 🌹

Hindi Poem by A Singh : 112031173
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