रात की ख़ामोशी में,
छत पर बैठकर पूछती हूँ तारों से,
क्या अपनों के बीच रहकर भी,
कोई इस कदर अकेला होता है?
दिन भर सबके चेहरे पर,
खुशियाँ बाँटती फिरती हूँ मैं,
पर ढलती शाम को जब आईना देखता है,
तो तड़पकर पूछ बैठता है—
"सबकी परवाह करने वाली,
बता तेरे लिए यहाँ कौन रोता है?"
जवाब में बस,
एक चीखता हुआ सन्नाटा उभरता है,
और उस बेबस ख़ामोशी में,
मेरा गला रुँध जाता है।
एक ही छत के नीचे रहते हैं सब,
मगर दूरियाँ इतनी हैं,
कि पास होकर भी,
पास होने का कोई एहसास नहीं होता।
शायद मैं ही बहुत बेगानी हो गई हूँ,
अपनों के मेले में,
जो भरी दुनिया में भी,
बस तड़पती हूँ अकेले में...
~ A. Singh 🌹