"मैं वो आम सी हसरत नहीं जो हर किसी के हिस्से आ जाऊँ"
मैं ख़ास हूँ, कोई आम नहीं
मैं वो आम सी हसरत नहीं,
जो हर किसी के हिस्से आ जाऊँ।
ना वो काग़ज़ का कोई पन्ना हूँ,
जो हर कहानी में सिमट जाऊँ।
मैं तो वो अनसुलझा सा ख़्वाब हूँ,
जो सिर्फ़ किसी की गहरी रातों में ढलता है।
मैं वो दीपक हूँ,
जो हर हवा के झोंके पर नहीं,
सिर्फ़ अपनी ही लौ में जलता है।
लोग कहते हैं झुक जाना ही रीत है,
पर मेरी सादगी में भी एक अलग ग़ुरूर है।
मुझे पा लेना इतना आसान नहीं,
मेरा हर एक लम्हा, मेरा हर एक नशा फ़ितूर है।
मेरी अपनी पहचान
नज़रों से जो नापा जाए,
मैं वो दायरा नहीं।
भीड़ का जो हिस्सा बन जाए,
मैं वो आवारा मुसाफ़िर नहीं।
मेरी अपनी एक दुनिया है: जहाँ मेरी शर्तें चलती हैं, दूसरों के इशारे नहीं।
मेरी अपनी एक आग है: जो मुझे अपनी ही चमक से रौशन रखती है, किसी और के उजाले से नहीं।
जो तरसते हैं मेरी एक झलक को,
उन्हें मेरा सलाम है।
पर जो मुझे हलके में लें,
उनका रास्ते में ही ठहराव है।
मैं वो आम सी हसरत नहीं,
जो हर किसी के ख़्वाबों में ढल जाऊँ।
मैं वो समंदर हूँ,
जो अपनी लहरों की मर्ज़ी से बहता है,
किसी तिनके की तरह राह नहीं बदलता।
अपनी शर्तों पर जीना
मुझे हर किसी की वाह-वाही की चाहत नहीं,
ना मुझे किसी महफ़िल का शृंगार बनना है।
मुझे तो बस अपनी ही नज़रों में,
एक निडर, अडिग और बेबाक़ किरदार बनना है।
जो समझा है मुझे, वही पा सका है मेरी रूह का सुकूँ।
जो सिर्फ़ पाना चाहता था, वो आज भी खाली हाथ खड़ा है।
मैं एक ऐसी पहेली हूँ,
जिसका जवाब हर कोई ढूँढ नहीं सकता।
मैं वो ख़ास एहसास हूँ,
जिसे कोई महज़ बातों से छू नहीं सकता।
अंतिम संदेश
इसलिए ऐ दुनिया,
मुझे अपने तराज़ू में तोलना बंद कर।
मेरी सादगी को मेरी कमज़ोरी समझना बंद कर।
मैं वो आम सी हसरत नहीं जो हर किसी के हिस्से आ जाऊँ,
मैं वो नायाब पन्ना हूँ,
जो सिर्फ़ उसी किताब में सजेगा,
जिसमें मेरी कद्र का पक्का यक़ीन होगा।