"मालूम है ये मुझको कि... ख़्वाब झूठे हैं और ख़्वाहिशें अधूरी हैं...+
जानकर भी ये अनजान बन जाने में... झूठे को ही सही... हसरतें कुछ नई जगाने में...
मज़ा ही कुछ और है..."
ज़िंदगी का हर ख़्वाब हक़ीक़त नहीं बनता, लेकिन उम्मीदें हमें जीने की वजह ज़रूर दे जाती हैं। कभी-कभी अधूरे सपनों के साथ मुस्कुराना भी एक खूबसूरत सफ़र होता है।
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