कविता - मेरा गम
क्यों मेरे हिस्से में दुःख ही आया
क्यों भीड़ में भी खुद को तन्हा पाया
मेरी जिजीविषा तो देखो, जनाब
हर जहर पीकर खड़ी हो गई
मुश्किलें सहते-सहते बड़ी हो गई
जिंदगी के थपेड़ों ने छीन ली मुस्कान मेरी
कब मेरी राह, मेरी मंजिल से बड़ी हो गई
जब भी सुनाना चाहा हाल-ए-दिल
कोई ना मिला, दुनिया बेगानी हो गई
कि कलम से दोस्ती जब, लिख डाला
दर्द-ए-बयां जिंदगी सब, वाह-वाह
क्या लिखा है, क्या लिखा है
गम भी मेरा शायरी बना डाला
उसे भी जमाने ने कसौटी पर कसा है
आंसुओं की नदियों का हाथ है
मुझे पत्थर बनाने में
सभी दुःख दर्द का धन्यवाद है
मुझे मजबूत बनाने में
सही है इतनी बेरुखी दुनिया की
अब मैं खुश हूँ अपनी तन्हाई में
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली