दिन की नुमाइश ढल गई, अब उदासी का पहरा है,
ये जो रात का सन्नाटा है, इसमें दर्द ज़रा गहरा है।
जो मुस्कुराहटें दिन भर चेहरे पर टांग रखी थीं,
रात ने आते ही वो सब चुपचाप उतार दीं।
तकिए के कोने में सिमट कर रो लेता है दिल,
गैरों की भीड़ में खुद को खो देता है दिल।
चिराग बुझते ही यादों का कारवां आता है,
जो कह न सके किसी से, वही बात सताता है।
ऐ रात, तू ही बता कैसे ये सिलसिले खत्म होंगे,
क्या सुबह का सूरज आने पर ये ज़ख्म मद्धम होंगे?