वक्त की इस नज़र से बच पाना कहाँ आसान है,
यहाँ हर मोड़ पर बदलता इंसान का जहाँ है।
दौड़ती-भागती दुनिया में किसी को फुरसत कहाँ,
सबकी आँखों में यहाँ मतलब का ही जहाँ है।
काँच सी होती हैं उम्मीदें अक्सर टूट जाती हैं,
अपनों की बदली हुई नज़रें अपनों को ही रुलाती हैं।
झूठे चेहरों के पीछे छिपे कई राज़ होते हैं,
यहाँ मतलब के वास्ते ही अक्सर आज़माइश के काग़ज़ होते हैं।
खुद को तन्हाई में संभालना ही पड़ता है यहाँ,
क्योंकि किसी की नज़र का भरोसा अब बाकी कहाँ है।