Hindi Quote in Microfiction by Hemant Parmar

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आप स्त्री पर कुछ भी लिखिए, ✍️
सब पढ़ेंगे. ☺️
आप प्रेम पर कुछ भी लिखिए,
सब पढ़ेंगे. ☺️

मगर स्त्री और प्रेम को जोड़ता हुआ
अपनी संवेदनाएं और अपनी उम्मीदें
सिर्फ अपने हृदय में रखने वाला
'पुरुष' 😞

उसके हिस्से में कविताएं नहीं आतीं,
उसके हिस्से आते हैं , तो सिर्फ 'आरोप'
आरोप ~ वासना के, आरोप ~ हिंसा के
आरोप ~ कुछ ज़्यादा ही
स्वच्छन्द होने के.

मगर याद रहे, स्त्री और प्रेम अकेले
एक दूसरे के पूरक नहीं हो सकते.

माँ का फटा आँचल सबको दिखता है,
बाप के शॉल की पैबंद
किसी को नहीं दिखती.
बहन की राखी सबको दिखती है,
मगर ... उस राखी के उपहार हेतु
बहाया हुआ भाई का पसीना
किसी को नहीं दिखता.
😢
किसी की प्रेमिका का
किसी और से विवाह
इसमें स्त्री आगे बढ़ जाये, तो वो मजबूर
अगर प्रेमी किसी और से विवाह करे,
और आगे बढ़ जाये, तो वो मतलबी.

जहाँ सच्चा प्रेम है , वहाँ आपको
एक पुरुष मिलेगा ☞ प्रेमी के रूप में
एक पुरुष मिलेगा ☞ पति के रूप में
एक पुरुष मिलेगा ☞ भाई के रूप में
एक पुरुष मिलेगा ☞ पिता के रूप में
एक पुरुष मिलेगा ☞ बेटे के रूप में

जो हर जगह, हर परिस्थिति में
एक स्त्री के साथ खड़ा है.

मगर उस पर ... कोई कुछ नहीं लिखेगा.
क्योंकि स्त्री पर कविता लिखकर
किसी स्त्री को रिझाया जा सकता है,
उस पर तालियाँ बटोरी जा सकतीं हैं.
उसकी पुस्तकें लिख कर
बेची जा सकती हैं.
क्योंकि पुरुष पर कविता
कोई नहीं खरीदेगा.
क्योंकि पुरुष पर कविता
बिकती नहीं है.

Hindi Microfiction by Hemant Parmar : 111961879
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गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर
गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर

सुबह की पहली किरण जैसे ही खेतों पर पड़ती, पूरा गांव सुनहरी रोशनी से जगमगा उठता। पक्षियों की मधुर चहचहाहट, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और ठंडी हवा मन को एक अलग ही शांति देती थी।

शहर में रहने वाली अनन्या कई साल बाद अपने दादा-दादी के गांव आई थी। शहर की भागदौड़, ट्रैफिक और मोबाइल की दुनिया में वह खुद को थका हुआ महसूस करती थी। गांव पहुंचते ही उसने देखा—हर चेहरे पर मुस्कान थी, हर घर का दरवाज़ा खुला था और हर इंसान एक-दूसरे का हाल पूछ रहा था।

एक सुबह दादाजी उसे खेतों में ले गए। हरी-भरी फसलें हवा के साथ झूम रही थीं। किसान मेहनत कर रहे थे, लेकिन उनके चेहरों पर संतोष साफ दिखाई दे रहा था।

अनन्या ने पूछा, "दादाजी, यहां लोगों के पास शहर जैसी सुविधाएं तो नहीं हैं, फिर भी ये इतने खुश कैसे हैं?"

दादाजी मुस्कुराए और बोले, "बेटी, खुशी बड़ी-बड़ी इमारतों में नहीं, बल्कि संतोष, अपनापन और प्रकृति के साथ जीने में होती है।"

उस दिन अनन्या ने बच्चों के साथ मिट्टी में खेला, पेड़ों की छांव में बैठकर कहानियां सुनीं, तालाब किनारे सूर्यास्त देखा और रात को खुले आसमान में अनगिनत तारों को निहारा।

जब वापस शहर लौटने का समय आया, तो उसके दिल में एक नई सोच जन्म ले चुकी थी। उसने समझ लिया कि जीवन का असली सुख केवल पैसा कमाने में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए गए पलों और प्रकृति के करीब रहने में है।

उसने तय किया कि चाहे वह शहर में रहे, लेकिन गांव की सादगी, प्रेम और शांति को हमेशा अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखेगी।

सीख:
"सच्ची खुशी वहीं मिलती है, जहां मन को शांति, रिश्तों में अपनापन और प्रकृति का साथ मिलता है। गांव की सादगी ही जीवन की सबसे बड़ी दौलत है।" 🌿🌾

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