मैंने चाहा था घर-सा रिश्ता, महल की ख्वाहिश नहीं थी,
जो रूखा-सूखा दे दे कोई, उस पर भी कोई फरमाइश नहीं थी।
हालात उसके अपने जैसे, मैंने अपने मान लिए थे,
उसकी रोटी मेरी रोटी, उसके आँसू अपने जान लिए थे।
पर दिल तो उसका कहीं और था, ये बात छुपाई उसने,
और इल्ज़ाम वफ़ा पर आया, हर कमी गिनाई उसने।
पूछा मुझसे – “तुमने दिया ही क्या?” बड़ी आसानी से,
उसने देखा ही नहीं, मैंने खुद को दे दिया ख़ामोशी से।
जिसका दिल किसी और के पास हो, वो क़दर क्या जाने,
सच्चे प्यार की कीमत अक्सर, झूठे लोग नहीं पहचानें।