कलम आज फिर हुयी
शांत किसी शब्द के
लिखने पर स्याही हुयी
फिर आज ख़तम के
कुछ शब्दों को हमने
मोड़ना चाहा पर
कलम हुयी आज फिर
शांत के मंजर आज
जुबान पर था वो मंजर
जो तड़पाता था हमको
हरपल जिसकी याद
हमको है रुला जाती
गला है हमारा रुंधा
पड़ा हाथ में कम्पन
भरा पड़ा कुछ और
अगर हम याद करे
दिल शीशे सा बिखर गया
के काश हमे तुम मिल जाते
तो ये रात की बेचेनी न होती
के काश तुम जो मिल जाते तो
यूँ हम शायद करवटे न लेते
हाँ तेरी ही यादो ने हमको
बहुत बहुत तडपाया है
हाँ तेरी ही सूरत ने हमको
कितना हमे रुलाया है
आजा के जीवन है छोटा
है दुनिया तेरी भी छोटी
आजा के याद है आती
याद से आँखों में मोती
आशीष जैन (श्रीचंद्रजी)