अब तो तुम आदत हो खाकी।
मेरी हर नब्ज में घुली हो खून की तरह।
तुम ही तो जज्बात हो खाकी।
मेरी हर विजयमें शामिल हो गर्वकी तरह।
तुम शान हो मेरी खाकी।
मेरी हर धड़कनमें दौड़ती हो सांसोंकी तरह।
अक्सर शामिल होती है आदतें जीवन में
पर तुम शामिल हो जीवन की आदतों में।
में कैसे कहूं खाकी की तुम आदत हो ,
और कैसे कहूं की बिना आदत का जीवन हो तुम।
सच कहूं ख़ाखी !
अब तुम वो आदत हो जिससे जीवन है।
धूप हो या छांव दिन हो या रात ,
इन रंगबिरंगे जहां में एक ही रंग हो तुम।
जो भाया मुझे, जो दे छाया मुझे ।
जिसने निर्भिक बनाया मुझे ।
जिसने सिखाया मुझे बेतरतीब को तरतीब में लाना,
आंखों से आंखे मिलाना,
और तेवर से ही औकात दिखाना ।
ऐसे ही कहां मिली हो तुम ।
धूल मिट्टी पसीने से सिली हो तुम।
गिरेबान में झांके वे जो बन रहे बेलगाम हैं।
ऐसे ही घोड़ों पर करते हम सवार हैं।
खाकी है हम आश बस इतना ही काफी है।
खाकी है हम काफी है हम।
"कवि आश" महेश गढ़वी