सोचा आज किसी सोच में डूब जाऊं,
अपनी खामोशी पर कुछ पंक्तियां लिख जाऊं...
करूंगी क्या अच्छाइयों का चादर ओढ़ कर
मिट्टी में मिलने के बाद सबको भूल जाऊंगी...
किरदार मेरा झूठा नहीं था, बस दिखावे से दूर रहने दिया
मालूम चला चंद लम्हों में ही, गुनाहगार के करीब ही खड़ी थी...
बस अब कोई मुझे आवाज न दे...
मैं जैसी भी हूं,आइने की जैसी हूं...
- M K