जो कुछ लिखा तूने, उसे मिट के मिटा।
जो पास है तेरे, उसे खुद से बचा।
जो बोया है तूने, उसे जड़ से हटा।
जो बोया नहीं तूने, उसे अपना खून पिला।
जो तेरी कमाई है, उसे आग दे लगा।
जो कमाया नहीं तूने, उसे कभी न गँवा।
जो याद में घूमे, उसपे धूल उड़ा।
जो याद ना आए, उसमें जी के दिखा।
जो आंखें भर आएँ, ज़रा हँस के दिखा।
जो हँसाता हो तुझे, उसे मौन बता।
जो कुछ समझा तूने, उसे भूल ही जा।
जो समझ के बाहर है, उसे सर दे झुका।
— आचार्य प्रशांत
(जिस-जिस को यह कविता समझ में आई हो, वो ज़रूर बताएं।
देखते हैं कितने लोग इसके असली अर्थ को पकड़ पाए हैं।..🤔🙂)