मैं और मेरे अह्सास
हादसों
पढ़ सको तो पढ़ो एहसास लिखा हैं l
सुख और दु:ख पास पास लिखा हैं ll
मुकम्मल जिंदगी को उतारा उस में l
दुनिया को लगे उपन्यास लिखा हैं ll
सामने था दूर तक फेला समन्दर l
जलजलों के साथ प्यास लिखा हैं ll
घोसलें वीरान कर गया परिंदा सा l
प्यार के दुश्मन को खास लिखा हैं ll
घर छोड़ा अब कोई खौफ़ नहीं है l
हादसों की ज़र्द पे हास लिखा हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह