" एक पड़ाव के बाद खामोशी , खामोशी से सुनने वाला , खामोशी समझाने वाला... की कद्र समझ आती है इसी पर कुछ व्यक्त करने कोशिश कर रही हु..."
एक साया है जिसे दिन रात सोचती हूँ,
नदी के किनारे डाले सूरज के साथ शाम देखती हु,
दिन भर ये ख्याल मेरे साथ चलता है ।
कोई है है जो मेरे साथ चलता है ।
वो पूछता नहीं कि और बताओ
वो बस देख के कह देता है
तुम बड़ी मासूम हो ..मेरी हताशा एक पल में दूर हो जाती है
मायूसी सी आंखों में मस्ती भर जाती है
और कह उठती है मैं मासूम कैसे...
वो देख कर समझ जाता है और कहता है
मन का तो कुछ नहीं फिर भी मान जाती हो
फिर भी छोटी छोटी बातों आंसू बहाती हो
बच्चों की तरह ढूंढने लगती हु कही छुपने की जगह
न मिले तो खुद की गोद में ही सर झुकती हो
पता नहीं कोई कैसे नजर अंदाज कर सकता है
इस प्यारी बच्ची को ...कोई कैसे भूल सकता है तुम्हारी गायब खिलखिलाती हस्ती को,
कोई कैसे तरकीब न करता है इसे लाने को,
फिर हाथ मेरे सर पर रख कर कहता है
मेरी प्यारी तू बस मुसकुराती रह
जब कुछ भी बिगड़े यहां छुप जाया कर
मैं यही हु तेरे सब्र में
तुझे बेसब्री से पकड़ लूंगा
जब भरेगी तू आहे मैं तेरा सर चूम लूंगा
ये बस बाते नही हर दफ़े ये जरूर करूंगा
भरोसा ढूंढती मेरी नकजे टुकटुक देखते रहती
ओर वो बाहें पकड़ थाम लेता