मैं और मेरे अह्सास
मतलबी संसार
चाहत का इज़हार करते करते रात हो गई है l
ख्यालों में बात करते नींद से मात हो गई है ll
जहां में हर कोई अपनी खिचड़ी पका रहा है l
अब तो मतलबी संसार से ना'त हो गई है ll
चार लोंगों की निगाहों से बचकर आज तो l
आँखों ही आँखों मे चुपके से बात हो गई है ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह