...बहता हुआ दरिया ...
मेरी कमी क्या होगी किसी को,
मैं ठहरा एक बहता हुआ दरिया,
जो बहाव की जद में बस बहता गया।
कुछ लौटते हैं मुसाफिर शहर में,
पर मैं तो बस राहों का होकर रह गया।
कौन ढूंढेगा मुझको उस गुज़रे हुए वक्त में,
मैं यादों के दरमियां बस सिमट सा गया।
ना कोई साहिल मिला, ना कोई मंज़िल मिली,
मैं तो बस दो किनारों के बीच बंट कर रह गया।
-MASHAALLHA