प्रेम हमेशा साथ बैठने का नाम नहीं होता...
कभी कैलाश और हिमालय के बीच की प्रतीक्षा भी प्रेम होती है। कभी वनवास की लंबी राहों में अटूट विश्वास भी प्रेम होता है। कभी वृंदावन और द्वारका की दूरी में जीवित स्मृति भी प्रेम होती है।
महादेव–पार्वती ने धैर्य सिखाया, सीता–राम ने समर्पण, और राधा–कृष्ण ने यह कि हर प्रेम का अंत मिलन नहीं होता, फिर भी वह अधूरा नहीं होता।
सच्चा प्रेम दूरी नहीं गिनता... वह बस मन में एक दीप जलाए रखता है, जो हर अंधेरी रात में कहता है—
"मैं यहीं हूँ।"