मर्यादा और मुक्ति
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पुरुष जब निकला घर की देहरी से,
तो दुनिया ने उसे 'बुद्ध' कह दिया।
मोह-माया का बंधन उसने तोड़ा,
और उसे 'ज्ञान का पथिक' कह दिया।
पर स्त्री जब निकली उन राहों पर,
तो मर्यादाओं का घेरा खींच दिया गया।
उसे अग्निपरीक्षा की बेड़ियों में रखकर,
'सीता' का सतीत्व नाम दे दिया गया।
क्यों नहीं बनी वो बुद्ध की तरह स्वतंत्र?
क्यों उसे त्याग की एक मूर्ति माना गया?
पुरुष की 'खोज' को मिला सम्मान,
स्त्री के 'संघर्ष' को तो केवल कर्त्तव्य माना गया।
इतिहास ने तराजू रखे थे अलग-अलग,
पुरुष के लिए 'वैराग्य' और स्त्री के लिए 'त्याग'।
अक्का महादेवी और मीरा की रूहें कहती हैं,
कि ज्ञान का नहीं होता कोई भी लिंग या राग।
वो सीता नहीं, वो स्वयं में ही बुद्ध है,
जो अपनी शर्तों पर जीना जानती है।
बेड़ियों को तोड़कर जो निकले घर से,
वो तो खुद अपनी ही ज्योति पहचानती है।
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